मैं नयनतारा सहगल हूं
मैं नयनतारा सहगल हूं। मेरी उम्र 99 वर्ष है और मैं फ़िलहाल जीवित हूं। मैं वही महिला हूं, जिसकी एक तस्वीर को 15 नवंबर 2017 को अमित मालवीय ने मेरे मामा जवाहरलाल नेहरू को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल किया था।

मैं स्वतंत्रता सेनानी रणजीत सीताराम पंडित और विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी हूं। मेरी माँ विजयलक्ष्मी पंडित, जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं।
यह मेरी कहानी है।
मैं बहुत छोटी थी। एक दिन महात्मा गांधी हमारे घर आए। मां ने मुझसे कहा कि मैं उन्हें फूल दूं। मैंने मासूमियत में पूछ लिया—“लेकिन ये इतने गंदे गंदे से बदसूरत क्यों हैं?”
मां मुझे डांट पातीं, उससे पहले गांधीजी मुस्कराए और बोले—“मैं आशा करता हूं कि यह बच्ची हमेशा सच बोलती रहेगी।”
बाद के जीवन में सच बोलने की इस आदत की मुझे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। इसी सच ने मुझे मेरी बेहद प्रिय इंदिरा से भी दूर कर दिया।
1943 में पढ़ाई के लिए मुझे अमेरिका के Wellesley College भेजा गया। उस समय मेरे माता-पिता और मेरे मामा जवाहरलाल नेहरू अंग्रेजों की जेलों में थे।
फिर मेरे पिता की मृत्यु हो गई। जेल और बीमारी ने उनकी सेहत तोड़ दी थी। नेहरू का एक और बेहद करीबी व्यक्ति औपनिवेशिक जेल की यातनाओं की कीमत चुका चुका था।
आज जब कोई कहता है कि नेहरू और दूसरे स्वतंत्रता सेनानी जेल में राजाओं की तरह रहते थे, तो मुझे अपना परिवार और वह दौर याद आता है।
1947 में जब मैं भारत लौटी तो इंदिरा मेरा घर-परिवार थीं। पिता की मृत्यु के बाद मामा नेहरू मेरे लिए पिता जैसे हो गए थे। वे मेरे नायक थे—मेरे तीसरे अभिभावक। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि मैंने कभी उनकी आलोचना नहीं की।
17 यॉर्क रोड के बड़े परिसर में उन दिनों शरणार्थियों के लिए तंबू लगे हुए थे। विभाजन ने देश को लहूलुहान कर दिया था। चारों तरफ बेहद गंभीर और दुखद माहौल था।
मैं तब घर की एक नौजवान लड़की ही थी। मामा नेहरू का खाना लेकर उस दफ्तर तक जाती थी जहां उन दिनों विदेश मंत्रालय काम करता था।
फिर वह भयानक दिन आया।
हमें बताया गया कि गांधीजी को गोली मार दी गई है। हम भागते हुए बिरला हाउस पहुंचे। हम उस कमरे में मौजूद थे जहां गांधीजी ने अंतिम सांस ली।
समय आगे बढ़ा। 1966-67 के आसपास, अपने वैवाहिक जीवन के टूटने के बाद मैंने अपने पैरों पर खड़े होने के लिए लेखन को अपना सहारा बनाया।
मेरी चचेरी बहन इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। मेरी मां विजयलक्ष्मी पंडित थीं। मेरे दिवंगत मामा जवाहरलाल नेहरू थे। मेरे सामने सत्ता और विशेषाधिकार के दरवाजे खुले हो सकते थे।
लेकिन मैंने दूसरा रास्ता चुना—सत्ता से सवाल करने का रास्ता।
1974 में जयप्रकाश नारायण ने हमारे साझा मित्र राशिद शेरवानी के जरिए मुझे संदेश भेजा और सहयोग मांगा। मैंने हामी भर दी। नवंबर 1974 में मैं उनके आग्रह पर बिहार गई ताकि उनके आंदोलन को अपनी आंखों से देख सकूं। अक्टूबर 1974 से मई 1975 के बीच मैंने JP की पत्रिका Everyman’s के लिए 17 लेख लिखे।
मैं केवल लेखिका नहीं रही, एक तरह से आंदोलनकारी बन गई।
आपातकाल के दौर में सिद्धार्थ शंकर रे ने चेतावनी दी कि मुझे MISA के तहत “किसी भी दिन” गिरफ्तार किया जा सकता है। परिवार को डर था कि इंदिरा शायद मुझे छोड़ भी दें, लेकिन संजय गांधी ऐसा न करें।
फिर भी मैं पीछे नहीं हटी।
मैंने इंदिरा का विरोध इसीलिए नहीं छोड़ा कि वे मेरी बहन थीं। रिश्तेदारी सत्ता से सवाल न करने का कारण नहीं हो सकती।
मैंने इंदिरा के शासन में बढ़ते सत्ता-केंद्रित राजनीतिक और आर्थिक गठजोड़ की आलोचना की। मैं संजय गांधी की राजनीति और उस दौर में एक तरफ पूंजीपतियों तथा दूसरी तरफ वामपंथी शक्तियों के एक हिस्से के साथ बनाए गए राजनीतिक संतुलन को भी अपनी नजर से देखती और लिखती रही।
और फिर भी जवाहरलाल नेहरू के बारे में मेरी भावना नहीं बदली। मैंने उन्हें कहा था—“मेरी जिंदगी में मैंने जितने लोगों को जाना, उनमें सबसे महान और उदात्त व्यक्ति।”
वे मेरे प्यारे मामा थे।
लेकिन नेहरू से प्रेम करने का अर्थ यह नहीं था कि उनके परिवार की सत्ता के सामने चुप रहा जाए। इसीलिए मैंने इंदिरा का विरोध किया।
मेरी मां ने मुझे कभी नहीं कहा कि मैं चुप हो जाऊं। वे जानती थीं कि मुझे वही करना होगा जो मेरा विवेक मुझसे कहता है। वे मेरी भावनाओं को समझती थीं।
2017 में अमित मालवीय ने उन्हें भी नहीं बख्शा।
हमारी पीढ़ी के बहुत से लोगों के लिए भारत केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं था। भारत एक विचार था—एक सपना था। मैंने कभी उसे अपनी कल्पना का “चमकता हुआ विचार” कहा था।
इसी विचार के लिए मैंने इंदिरा गांधी की सत्ता का विरोध किया था।
और इसी विचार की रक्षा के लिए मैंने 2015 में अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया।
मेरे लिए सत्ता का नाम बदल जाने से सच नहीं बदलता। जिस तरह मैंने अपने ही परिवार की सरकार से सवाल किए, उसी तरह आज की सत्ता से सवाल करना भी जरूरी है।
राष्ट्रवाद के नाम पर समाज को बांटने वाली राजनीति, नागरिकों को धर्म और पहचान के आधार पर अलग-अलग खानों में रखने की सोच और बहुसंख्यक पहचान को राष्ट्र की पहचान बना देने का आग्रह नया नहीं है। इसकी जड़ें जनसंघ के पुराने दौर तक जाती हैं, जब राजनीति में “हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान” जैसे नारे सुनाई देते थे।
जिस भारत के लिए हमारे परिवारों ने जेलें देखीं, अपनों को खोया और एक लोकतांत्रिक, बहुलतावादी देश का सपना देखा, वह किसी एक धर्म, भाषा या विचारधारा की जागीर नहीं था।
भारत हमारे लिए एक विचार था—एक चमकता हुआ विचार।
उस भारत को बचाइए।
इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।
