कैलारस : राख के नीचे बची हुई आग

कैलारस : राख के नीचे बची हुई आग

रत्ना भदौरिया

ये तस्वीरें जिनकी स्थिति आज जंतर-मंतर जैसी दिख रही है ये कहीं और की नहीं बल्कि हमारे देश की हैं जहां मध्यप्रदेश के कैलारस शहर में बरसों पुराने शक्कर कारखाने को बंद कर दिया गया हजारों मजदूर किसानों को वेंटीलेटर पर पांच किलो राशन का थैला थमाकर डाल दिया गया और सरकार धर्म जाति की कुर्सी पर जा बैठी। जहां मजदूर, किसान, नवजवानों की चीख-पुकार भी न सुनाई दे।
कैलारस की शक्कर मिल आज बंद है। लेकिन बंद होना हमेशा समाप्त हो जाना नहीं होता। कुछ चीजें ताले के पीछे जाकर और अधिक बोलने लगती हैं। इस मिल की जंग खाई मशीनें ऐसी ही भाषा बोलती हैं—बहुत धीमी, लगभग सुनाई न देने वाली; मगर इतनी गहरी कि उसे किसी सरकारी विज्ञप्ति से ढँका नहीं जा सकता। कभी इन्हीं मशीनों की धड़कन में हजारों मजदूरों की सुबह खुलती थी, किसानों की फसल अपना अर्थ पाती थी और कस्बे की अर्थव्यवस्था अपनी छोटी-सी परिधि में घूमती थी। आज मशीनें स्थिर हैं, पर उनके चारों ओर ठहरी हुई हवा में श्रम की अनुपस्थिति दिखाई देती है।
शायद किसी कारखाने के बंद होने का सबसे बड़ा दुख उसकी मशीनों का रुक जाना नहीं, मनुष्य का अपने ही श्रम से बेदखल हो जाना है।
देश में किसान सड़कों पर है। युवा सड़कों पर है। मजदूर कहीं धरने पर बैठा है, कहीं अनशन में अपनी भूख को ही प्रतिरोध की भाषा बना रहा है। ये दृश्य अब इतने हैं कि किसी एक तस्वीर से उनका अर्थ नहीं खुलता। वे मिलकर हमारे समय का एक धुँधला-सा चेहरा बनाते हैं—जिसमें खेत है, मगर आश्वस्ति नहीं; डिग्री है, मगर नियुक्ति नहीं; श्रम है, मगर स्थायित्व नहीं; बाजार है, मगर खरीदने की क्षमता नहीं।
महँगाई केवल वस्तुओं के दाम नहीं बढ़ाती; वह मनुष्य के भीतर से भविष्य का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा काटती रहती है।
ऐसे समय में यदि युवा के हाथ में रोजगार की जगह कोई प्रतीक रख दिया जाए और किसान-मजदूर के हाथ में पाँच किलो अनाज, तो हमें प्रतीकों या अनाज से शिकायत नहीं होनी चाहिए। शिकायत उस बारीक बदलाव से है जिसमें अधिकार धीरे-धीरे राहत में बदल दिए जाते हैं और नागरिक लाभार्थी में।
भूख के सामने राशन जरूरी है। मगर रोटी की स्थायी सुरक्षा केवल बोरी में नहीं, काम में होती है। किसान की गरिमा केवल उसे अन्नदाता कह देने में नहीं, उसकी उपज के अर्थशास्त्र को न्यायपूर्ण बनाने में है। मजदूर की प्रतिष्ठा उसके हाथ पर रखी सहायता में नहीं, उस हाथ को काम मिलने में है। युवा का भविष्य किसी सांत्वना से नहीं, अवसर से बनता है।
कैलारस का बंद कारखाना इसी अंतर को अपनी खामोशी में दर्ज करता है।
वह पूछता नहीं, केवल दिखाता है।
दिखाता है कि एक उद्योग के साथ कितने अदृश्य जीवन चलते हैं। मजदूर की कमाई से बाजार चलता है; बाजार से घर; घर से बच्चों की पढ़ाई; पढ़ाई से अगली पीढ़ी का सपना। मशीन के बंद होने की आवाज इसलिए केवल लोहे के भीतर नहीं होती—वह कई घरों की दिनचर्या में सुनाई देती है, जहाँ अचानक कोई खर्च ‘अगले महीने’ के लिए टल जाता है।
सत्ता जब पिछली सरकारों से सत्तर वर्षों का हिसाब माँगती है, तो इतिहास की एक आदत है—वह प्रश्न को वहीं नहीं रहने देता। वह उसे वापस भेज देता है।
जो बनाया नहीं, उसका दोष गिनाना सरल है;
जो बना हुआ था, उसे बचाना कठिन।
शासन की असली परीक्षा शायद उद्घाटन के क्षण में नहीं, क्षरण के समय होती है। कौन-सी संस्था बचाई गई, कौन-सा उद्योग टूटने से रोका गया, किस मजदूर का काम बचा, किस किसान की अर्थव्यवस्था को सहारा मिला—इनका हिसाब भाषणों में कम मिलता है, बंद पड़े फाटकों पर अधिक।
कैलारस का फाटक इसलिए एक राजनीतिक दृश्य से अधिक एक नैतिक दृश्य है।
उसके बाहर खड़ा मजदूर किसी विचारधारा का पोस्टर नहीं; वह अपने बीते हुए श्रम का जीवित प्रमाण है। उसके पीछे बंद मशीनें किसी विपक्ष की भाषा नहीं; वे उत्पादन की उस स्मृति का अवशेष हैं जिसमें मनुष्य अभी तक मशीन से बड़ा था।
और शायद यही हमारे समय की सबसे सूक्ष्म त्रासदी है—हमने बेरोजगारी को संख्या में बदल दिया, किसान को संबोधन में, मजदूर को लाभार्थी में और युवा को भीड़ में।
संख्या रोती नहीं।
लाभार्थी सवाल नहीं करता।
भीड़ की कोई व्यक्तिगत भूख नहीं होती।
इसलिए मनुष्य को उसकी पूरी मनुष्यता में देखना सत्ता के लिए हमेशा असुविधाजनक रहा है।
कैलारस की मिल उस असुविधा का बंद दरवाजा है।
उसकी जंग पर उँगली फेरिए तो शायद लोहे का चूरा हाथ में आए; मगर थोड़ा ठहरकर देखिए—उस चूरे में मजदूर की उम्र है, किसान की उम्मीद है, बच्चों की फीस है, घर की रोटी है और उस राष्ट्र की वह अधूरी कहानी है जिसमें विकास के बड़े शब्दों के बीच श्रम का छोटा-सा आदमी लगातार पीछे छूटता गया।
देश को वेंटिलेटर पर केवल अस्पताल नहीं रखता। कभी-कभी एक बंद कारखाना भी पूरे इलाके की साँस धीमी कर देता है।
कैलारस की मिल की चिमनी आज धुआँ नहीं छोड़ती।
वह केवल यह देख रही है कि जिस मिट्टी से उसने कभी मिठास निकाली थी, उसी मिट्टी में उसके मजदूरों का भविष्य कितनी चुपचाप दबाया जा रहा है।

रत्ना भदौरिया के फेसबुक वॉल से साभार

चित्र साभार,The बवाल मीडिया

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