टूट गए और साकार हो गए सपनों की बातें

बच्चे अपने साथ उन्हें विदेश ले जाना चाहते थे पर वह नहीं गईं, बोलीं कि यहां की तो दीवारों में भी प्रिय की छुवन बसी हुई है

टूट गए और साकार हो गए सपनों की बातें

यश मालवीय

 

हैदराबाद में 91 वर्षीय एक दरख़्त की छांव में बैठने का अवसर मिला, उसकी दुवाएं मिलीं। एक पकी उम्र की गीत संवेदना से सीधा साक्षात्कार हुआ। लगा कि जीवन ऐसे भी जिया जाता है, गीत के हर अन्तरे में साँसें पिरोकर।
मैं बात कर रहा हूँ विनीता शर्मा जी की। उनका गीत संग्रह, स्वांतः सुखाय, मुझे क से कविता के सूत्रधार भाई प्रवीण प्रणव के माध्यम से मिला था। मैं उस पर उनके हस्ताक्षर चाहता था, लेकिन उन्होंने एक शर्त रख दी कि मैं उनके घर जाऊँगा, तभी वो अपने हस्ताक्षर देंगी। सो मुझे प्रणव भाई अपने साथ लेकर उनके घर गए, साथ में कवि चंदन सिंह भी थे। घर क्या था, मन्दिर था, जहां कविता का दिया, बकौल महादेवी जी नीरव जल रहा था।
यादें थीं असमय बिछड़ गए जीवन साथी की। बच्चे अपने साथ उन्हें विदेश ले जाना चाहते थे पर वह नहीं गईं, बोलीं कि यहां की तो दीवारों में भी प्रिय की छुवन बसी हुई है। मैनपुरी के ललित निबंधकार सुबोध दुबे जी ने अपनी इन बुआ जी बारे में पहले से ही बता रखा था। तीन चार घंटे उनके साथ केवल कविता और जीवन की बातें हुई। टूट गए और साकार हो गए सपनों की बातें हुईं और हम उनके साथ एक सपनीला समय जीकर इलाहाबाद लौट आए। आज उनके गीत का एक अंतरा बहुत याद आ रहा है, जिसे उन्हें प्रणाम देते हुए यहाँ दे रहा हूँ /

है वही धड़कन तुम्हारे भी हृदय में
किन्तु मेरा सा तुम्हारा मन नहीं है
शब्द निकले हैं सफ़र पर अर्थ अपना ढूंढ लाने
चल पड़े मंतव्य ले गंतव्य उसका आज़माने
अनकही बातें भी अक्सर शीत कर देतीं शिराएँ
ये जिया एहसास है, अभिव्यक्ति का बंधन नहीं है
और मेरा सा तुम्हारा मन नहीं है।

यश मालवीय के फेसबुक वॉल से साभार

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