लघु कथा
विश्वास की दरार
डॉ रीटा अरोड़ा
“कहाँ थीं तुम इतनी देर?” रवि ने दरवाज़ा खोलते ही पूछा।
“ऑफिस से निकलने में देर हो गई। बॉस ने कुछ काम- – -”
“हर बार नई कहानी! फोन क्यों नहीं उठाया?”
“बैग में था, सुन नहीं पाई।”
“सच बोल रही हो?”
नंदिनी कुछ पल उसे देखती रही। “तुम्हें लगता है मैं झूठ बोल रही हूँ?”
“मुझे नहीं पता। लेकिन तुम्हें हर बात का हिसाब देना चाहिए।”
“हिसाब?” उसकी आवाज़ भर्रा गई, “पति-पत्नी हैं हम, पूछताछ करने वाले अधिकारी नहीं।”
“तो क्या मैं सवाल भी न करूँ?”
“सवाल करो, लेकिन हर बार शक मत करो।”
रवि गुस्से में चुप हो गया।
कुछ देर बाद उसने धीमे से पूछा, “नाराज़ हो?”
नंदिनी ने आँखें झुका लीं।
“नहीं… बस अब तुम्हें सफाई देते-देते थक गई हूँ।”
“तो मुझ पर भरोसा नहीं रहा?”
नंदिनी ने उसकी ओर देखा- “भरोसा था… मगर हर बार शक की चोट खाकर वह भी अब डरने लगा है।”
