जब ‘मैं सही हूं’ बन जाए रिश्तों का दुश्मन

सामाजिक विमर्श

जब ‘मैं सही हूं’ बन जाए रिश्तों का दुश्मन

डॉ रीटा अरोड़ा

अलग परवरिश और बढ़ता अहंकार, क्यों टूट रहे हैं आज के रिश्ते
आज के समय में महानगरों में रहने वाले युवाओं और नवविवाहित जोड़ों के बीच रिश्तों में बढ़ती खटास एक गंभीर सामाजिक चिंता बनती जा रही है। आए दिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़े, मनमुटाव, फिर दूरी और अंततः तलाक जैसे मामलों में बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि समस्या कहीं गहरी है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
सबसे बड़ा कारण है कि आज के युवा यह समझने में असफल हो रहे हैं कि पति-पत्नी दोनों अलग-अलग परिवारों और संस्कृतियों में पले-बढ़े होते हैं। उनकी सोच, आदतें, जीवनशैली और अपेक्षाएं अलग होना स्वाभाविक है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब दोनों में से कोई भी एक-दूसरे को समझने और स्वीकार करने की बजाय यह साबित करने में लग जाता है कि “मैं सही हूं” और “तुम गलत हो”।
पहले के समय में संयुक्त परिवारों का चलन अधिक था। माता-पिता और बुजुर्ग घर में मौजूद रहते थे और वे रिश्तों को संभालने, समझाने और संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। वे अनुभव के आधार पर छोटी-छोटी बातों को बढ़ने नहीं देते थे और समय रहते समाधान निकाल लेते थे। लेकिन आज के समय में अधिकांश युवा अपने माता-पिता से दूर, महानगरों में अकेले रह रहे हैं। ऐसे में जब कोई विवाद होता है, तो उसे सुलझाने वाला कोई नहीं होता, और छोटी बात भी बड़ा रूप ले लेती है।
एक और बड़ी समस्या है अहम (ego) और हावी होने की प्रवृत्ति। आज के कई रिश्तों में यह देखने को मिलता है कि दोनों ही अपने-अपने तरीके से चीजों को चलाना चाहते हैं। कोई झुकना नहीं चाहता, कोई समझौता नहीं करना चाहता। हर दिन किसी न किसी बात पर बहस होना, एक-दूसरे को गलत साबित करने की कोशिश करना, धीरे-धीरे रिश्ते में कड़वाहट घोल देता है। नतीजा यह होता है कि घर में बातचीत कम होती जाती है, सन्नाटा बढ़ता है और अंततः रिश्ते टूटने की कगार पर पहुंच जाते हैं।
रिश्ते कोई प्रतिस्पर्धा (competition) नहीं होते, जहां जीत-हार तय करनी हो। यह एक साझेदारी (partnership) है, जहां दोनों को मिलकर चलना होता है। अगर हर दिन लड़ाई ही “जीवन का हिस्सा” बन जाए, तो वह रिश्ता टिक नहीं सकता।
आज जरूरत इस बात की है कि युवा यह समझें कि रिश्ते समझ और सहयोग से चलते हैं, न कि अहंकार और जिद से। एक-दूसरे की बात सुनना, उनकी भावनाओं को समझना और उनके नजरिए को स्वीकार करना बेहद जरूरी है। हर बात पर प्रतिक्रिया देने की बजाय कई बार चुप रहना और स्थिति को शांत होने देना भी एक समझदारी है।
इसके साथ ही, यह भी जरूरी है कि हम यह स्वीकार करें कि पुरुष और महिला दोनों अलग-अलग सोच रखते हैं। उनकी भावनाएं व्यक्त करने का तरीका अलग होता है। यही बात प्रसिद्ध पुस्तक “Men Are from Mars, Women Are from Venus” भी बताती है कि दोनों के बीच अंतर स्वाभाविक है। इसलिए यह अपेक्षा करना कि सामने वाला व्यक्ति बिल्कुल हमारे जैसा सोचने लगे, न तो सही है और न ही संभव।

समाधान बहुत कठिन नहीं है

सबसे पहले, एक-दूसरे को बदलने की कोशिश बंद करनी होगी।
दूसरा, खुलकर बातचीत को बढ़ावा देना होगा।
तीसरा, छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीखना होगा।
और सबसे महत्वपूर्ण, रिश्ते को “जीतने” की जगह “बचाने” की सोच अपनानी होगी।
अंततः, यह समझना जरूरी है कि विवाह सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है, बल्कि एक-दूसरे को समझने, स्वीकार करने और सहयोग देने का वादा है। अगर आज के युवा इस सच्चाई को समय रहते समझ लें तो रिश्तों में बढ़ती दूरियों को रोका जा सकता है और एक खुशहाल जीवन की ओर बढ़ा जा सकता है।

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