मंजुल भारद्वाज की कविता – आहट

कविता

आहट

मंजुल भारद्वाज

 

प्रतिरोध की आहट

मौत के सन्नाटे को

प्रतिध्वनित कर रही है।

 

कहीं दबे पांव

विद्रोह की चिंगारी

धीरे धीरे सुलग रही है!

 

भीड़ में से चंद भेड़ें

मनुष्य की वेदना

समझ रही हैं

घात की इंतिहा

प्रतिघात में बदल रही हैं !

 

गोबर को चंदन

मूत्र को अमृत समझने का

भ्रम तोड़ चंद चेहरे

नागरिकों जैसे दिख रहे हैं!

 

आस्था की चादर में

लिपटी विश्वासघात की

रामनामी

अब लाशों से उतर रही है!

 

हल्की सी उम्मीद

क्षितिज पर विवेक का

उदय देख रही है

कहीं दृष्टि आंखों का अंधेरा मिटा

गेहूं से घुन अलग कर रही है!