जातिमुक्त लोकतांत्रिक भारत : बाबासाहब का विज़न

जातिमुक्त लोकतांत्रिक भारत : बाबासाहब का विज़न

  • डॉ. आंबेडकर की 136वीं जयंती पर ‘हम देखेंगे’ : अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान की विचारगोष्ठी

 

बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर की 136वीं जयंती के अवसर पर 14 अप्रैल 2026 को जनपक्षधर संगठनों के साझा मंच ‘हम देखेंगे’: अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान की ओर से वार्षिक आयोजन दलित लेखक संघ (दलेस) की अगुवाई में सुरजीत भवन में सम्पन्न हुआ।

इस कार्यक्रम में दलेस, जनवादी लेखक संघ (जलेस), प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस), जन संस्कृति मंच (जसम), जन नाट्य मंच (जनम), अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच (अभादलम), इप्टा, प्रतिरोध का सिनेमा और न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव (एनएसआई) जैसे कई संगठनों ने भाग लिया।

 

‘डॉ. आंबेडकर की वैचारिकी और दलित, स्त्री व अल्पसंख्यक के हित’ विषय पर गौहर रज़ा, रामायन राम और डॉ. गुलाब को वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे हीरालाल राजस्थानी ने बाबासाहब की जयंती पर सभी को बधाई देते हुए कहा कि बाबासाहब की जयंती पर केवल फूल और अगरबत्ती चढ़ा देने से कुछ नहीं होगा। उनके विचारों को आत्मसात भी करना होगा। उन्होंने कहा, “हम एक अभियान चलाएँ, तभी उन समस्याओं का समाधान मिलेगा, जिनके लिए हम संघर्ष कर रहे हैं।”

 

 

डॉ. गुलाब ने कहा कि सत्ता पक्ष और यथास्थितिवादी व्यवस्था जिस तरह प्रगतिशील विचारों पर लगातार हमला कर रही है, उसके प्रतिरोध के रूप में अगर हमारी सक्रियता नहीं होगी तो हमलावरों के हौसले और बढ़ते रहेंगे, क्योंकि सत्ता पक्ष उनके साथ है। इसलिए प्रतिरोध बहुत जरूरी है और यह निरंतर होते रहना चाहिए। इस मंच की प्रासंगिकता इसी में है।

दलित, स्त्री और अल्पसंख्यक— ये तीनों एक ही विचारधारा से संक्रमित और शोषित हैं। इसलिए हमें विमर्शों में न पड़कर शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ संगठित होकर संघर्ष करना चाहिए। बाबासाहब अपने तीनों पथ-प्रदर्शकों- बुद्ध, कबीर और फुले के आधुनिक रूप हैं। जिस प्रकार बुद्ध ने स्त्री और पिछड़े वर्ग को आवाज दी, कबीर ने भेदभाव का विरोध कर पिछड़ों को अभिव्यक्ति दी और फुले ने स्त्री शिक्षा से लेकर छुआछूत मिटाने का प्रयास किया, ठीक उसी प्रकार बाबासाहब ने आधुनिक युग में उनकी आवाज को हथियार बनाकर संविधान के माध्यम से समानता स्थापित करने का प्रयास किया।

दलित, स्त्री एवं अल्पसंख्यक का सवाल अलग-अलग सवाल नहीं हैं। ये आज के वर्किंग क्लास के साथ मिलकर ही मौजूदा सत्ता को चुनौती दे सकते हैं और समतामूलक समाज की स्थापना कर सकते हैं।”

रामायन राम ने अपने वक्तव्य में कहा, “जैसे-जैसे लोकतंत्र पर संकट और फासीवादी शिकंजा बढ़ रहा है, वैसे ही लोग आंबेडकर को फिर से पढ़ रहे हैं। यथास्थितिवादी भी अब उन्हें अपने पक्ष में तथ्य खोज-खोजकर, काट-छाँटकर प्रस्तुत करने लगे हैं।

बाबासाहब का विजन क्रांतिकारी लोकतंत्र की स्थापना का था। इसमें सबसे बड़ी बाधा थी जाति जैसी विभाजनकारी संस्था, जिसकी नींव सजातीय विवाह परंपरा पर टिकी है। इस संस्था को स्त्री अधिकारों के दमन के द्वारा ही मजबूत बनाया जाता है, जिसके कारण कई कुप्रथाएँ भी विकसित हुईं। आंबेडकर के इन्हीं विचारों को 1991 में इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने ‘ब्राह्मैनिकल पैट्रियार्की’ शब्द दिया था।

आंबेडकर ने कहा था कि जिसे हम सामाजिक समस्या कह रहे हैं, उसे भारत के राष्ट्रवादी हिंदू समाज की समस्या के रूप में नहीं, बल्कि हिंदू परिवार की समस्याओं के रूप में देखा जाना चाहिए। जाति जैसे प्रश्न को ‘बाद का प्रश्न’ कहकर टाल दिया जाता रहा। बाबासाहेब ने इसे जरूरी समझा। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में अपने सवालों के साथ मौजूद रहकर संघर्ष को सम्पूर्णता और वैधता प्रदान की। उन्होंने संविधान को लोकतांत्रिक और जनवादी ढाँचा देने का प्रयास किया और इसे स्थापित करने के लिए राजकीय समाजवाद को आवश्यक बताया।

आज उनके विचारों को विरूपित करने और गलत तरीके से व्याख्यायित करने की कोशिश तेज हो गई है। यह प्रधानतः राजनीतिक कारणों से हो रहा है। उन्हें लगता है कि अभी भी दलितों और अल्पसंख्यकों का एक बड़ा राजनीतिक जनमत संघ की विचारधारा और हिंदुत्व के रथ के आगे अड़ा हुआ है इसलिए आंबेडकर के माध्यम से उस पूरे जनसमुदाय के जनसमर्थन को कमजोर किया जाए। हमें इसके खिलाफ वैचारिक तैयारी करनी होगी और मूलभूत विचारों को और अधिक मजबूती से सामने लाना होगा।”

गौहर रज़ा ने अपने वक्तव्य में कहा कि “एक ऐसा समाज जो जाति, धर्म, खान-पान, रहन-सहन आदि हर तरह से बँटा हुआ है, उसमें आजादी की लड़ाई शुरू होती है। ऐसे समाज में दुश्मन सबसे ज्यादा ताकतवर होता है। ऐसे में स्वतंत्रता आंदोलन कैसे खड़ा किया जाए? लोगों को एक कैसे किया जाए? एक मूर्ति कैसे गढ़ी जाए जो इस दमनकारी ढाँचे के खिलाफ खड़ी हो सके? इसके लिए जरूरी था कि इस संघर्ष में सबकी भागीदारी बनी रहे।

यहाँ से शुरू होती है उन लोगों की भूमिका जिन्होंने जाति के खिलाफ खड़े होने को अपना रास्ता बनाया। बिना उनके यह संभव ही नहीं था कि देश की सारी आवाम इस संघर्ष का हिस्सा बन सके। इसमें बाबासाहब की अहम भूमिका है कि उन्होंने इंसान-इंसान के बीच के भेद को मिटाने का कार्य किया।

एक ऐसा समाज जिसमें औरत का दर्जा ‘ताड़न की अधिकारी’ है, मंत्र उच्चारण करने या सुनने पर कान में गर्म शीशा डाल दिया जाता है, इच्छानुसार व्यवसाय करने या संपत्ति रखने का अधिकार नहीं है— वहाँ बराबरी की बात हो रही थी।

बाबासाहब के हाथ से पानी न पीने वाले भी संविधान पर हस्ताक्षर कर देते थे। उन्हें यकीन था कि एक किताब कोई फर्क नहीं ला सकती, लेकिन संविधान में ताकत थी। नई नस्लों ने उसी संविधान के जरिए उस व्यवस्था में दरारें डालनी शुरू कीं, जो पाँच हजार साल से मौजूद थी और जिसका प्रभाव सभी धर्मों पर पड़ा— यहाँ तक कि दलित समाज में भी।

आज दलितों का एक बड़ा समूह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ खड़ा है। उसे लगता है कि इनके साथ होने से आरक्षण खत्म नहीं होगा। लेकिन अगर वे आएंगे तो आरक्षण के साथ बाबासाहब को भी खत्म कर देंगे। इसका सबसे बड़ा कारण है कि हम लोगों ने संवैधानिक अधिकारों के बारे में जागरूकता नहीं फैलाई। इसलिए RSS कामयाब होती जा रही है, जैसे 90 हजार स्कूलों का बंद होना।

आज के दिन सिर्फ RSS, अपर कास्ट और शासक वर्ग को गालियाँ देने से काम नहीं चलेगा। हमें अपनी कमजोरियों पर भी नजर डालनी होगी। संविधान को बचाने के लिए नई सोच कैसे पैदा की जाए, इसे ध्यान में रखकर आगे बढ़ना चाहिए।”

कार्यक्रम में हीरालाल राजस्थानी ने आम्बेडकर को देश के निर्माण में लगाने वाले गांधी की भी चर्चा की। साथ ही कविता ‘तुम नकारना चाहते हो’ का पाठ और डॉ. आंबेडकर के जीवन पर आधारित विजय लक्ष्मी वानखेड़े द्वारा रचित व सुरेश वाडेकर की आवाज़ में एक मराठी गीत की सादर प्रस्तुति हुई।

विशेष उपस्थिति में कवि देवीप्रसाद मिश्र, कवि-आलोचक शेखर पवार, आलोचक रेखा अवस्थी, ग़ज़लकार पदम् प्रतीक, कहानीकार योगेन्द्र आहूजा, कथाकार गजेन्द्र रावत, आलोचक प्रेम तिवारी, मीडिया विशेषज्ञ पंकज श्रीवास्तव, आलोचक अभय कुमार, साहित्य आलोचक सतीश खनगवाल, बलविंदर बलि, ग़ज़लकार भीम भारत भूषण, सामाजिक कार्यकर्ता अशोक भारती, कथाकार टेकचंद, सुमेधा बौद्ध तथा अनेक शोधार्थी और विद्यार्थी।

समापन में बजरंग बिहारी तिवारी ने. बाबासाहब को याद करते हुए सभी का आभार व्यक्त किया और कहा कि सत्ता का दमन चक्र तेज होता जा रहा है। इसका तरोताजा उदाहरण नोएडा मजदूर आंदोलन है।

सौरभ कुमार की रिपोर्ट 

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