कविता
दोनों का साथ : दोनों का विकास
रमेश जोशी
व्यक्ति और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
और राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा
दोनों में निरंतर चलती रहती है एक प्रतियोगिता
गिरने और उठने की ।
जितना व्यक्ति करता जाता है सीमित अपनी अभिव्यक्ति
उतनी ही बढ़ती जाती है अपेक्षा
और एक दिन आपका हँसना ही नहीं
गहरी साँस लेना भी
देश की सुरक्षा के लिए
हो सकता है खतरा ।
वैसे ही जैसे दुख और
दुख सहने की शक्ति का संचार
जितना ही दुखों को सहने की शक्ति
पैदा करता है आदमी
यह सोचकर कि चलो
इसे भी सह लेंगे किसी तरह
तो फिर एक नया दुख आता है
उसकी सहनशक्ति की परीक्षा लेने के लिए ।
अंत में दुख और दुख सहने की शक्ति
दोनों की प्रतिस्पर्धा मृत्यु पर ही समाप्त होती है ।
फिर भी कहाँ समाप्त होते हैं दुख
और दुख सहने की शक्ति ।
फिर भी धर्म कहता है
दुबारा जन्म तो लेना पड़ेगा
आदमी, कुत्ते, चींटी या और कुछ भी
तत्काल या फिर लंबे इंतजार के बाद
आकबत के दिन ।
इसलिए पीछा छुड़ाओ
धर्म से और जोड़ो उसे कर्म फल से
जिससे कुछ तो नियंत्रण रहे तुम्हारे हाथ में
जैसे कानून, अपराध और उसके अनुसार सजा ।
लेकिन जब कानून भी
आँख की पट्टी उतारकर
आपके वस्त्रों, तिलक, दाढ़ी, खतने और जनेऊ
देखकर देने लगे फैसले
तब सोचिए क्या करेंगे ?
कुछ करेंगे भी
या तब भी करेंगे इंतजार
जाली के पिंजरे में बंद मुर्गी की तरह
अपनी बारी का जिबह किए जाने के लिए
क्योंकि जिबह करने वाला भी
निभा रहा है अपना धर्म
मुर्गी काटने का धर्म ।
और धर्म पालन से मिलता है
इस जन्म में आध्यात्मिक आनंद
और परलोक सभी तरह के सुखभोग का अवसर ।
स्वर्ग
जिसे केवल उन्होंने देखा है
वे ही तय करते हैं स्वर्ग की पात्रता, नियम और परिभाषा
राजा से मिलकर
‘धर्म और सत्ता’ दोनों का साथ’
और दोनों का विकास ।
