स्मृति लेख
हम न मरब मरिहैं संसारा : डॉ. श्रीनारायण तिवारी
बजरंग बिहारी तिवारी
कोई दिन, कोई महीना मनहूस नहीं होता। उस समय घटी घटनाएँ उसे दुखद-सुखद बनाती हैं। हम अपने मनोभावों के वश में रहकर यादों के रजिस्टर में उस वक़्त की वैसी प्रविष्टि कर देते हैं। फिर वह प्रविष्टि चिरस्थायी हो जाती है। 22 मई, 2026 की सुबह मेरे एक भतीजे संतोष कुमार ने ख़बर दी कि गुरु जी श्रीनारायण तिवारी का निधन हो गया है। एकाएक भरोसा नहीं हुआ। बाद में ज्ञात हुआ कि मृत्यु का कारण सर्पदंश है। अभी चार-छः दिन पहले तो उनसे बात हुई थी। जून में मिलना तय हुआ था। पिछली दो यात्राओं में उनसे मुलाक़ात नहीं हो सकी थी। अब इसका मलाल रहेगा। अपने गृह जनपद से जिन लोगों के कारण जुड़ा रहा हूँ उनमें एक गुरु जी भी थे। वे ऐसे शिक्षक थे जिन्होंने मेरे बड़े भाई को भी पढ़ाया था और मेरे बाद वाली कई पीढ़ियों को। लंबे समय तक अध्यापकीय पारी खेलने के बाद वे उसी इंटरमीडिएट कॉलेज के प्रधानाचार्य नियुक्त हुए थे। उनकी नियुक्ति सी.टी. ग्रेड में हुई थी। पहले आठवीं तक पढ़ाते थे। फिर, अपेक्षित अर्हता अर्जित करने के बाद दसवीं-बारहवीं क्लास तक पढ़ाने लगे। वे संस्कृत और हिंदी दोनों भाषाओँ के शिक्षक रहे। उनका बौद्धिक, अकादमिक विकास ठहरा नहीं। मुझे जुलाई ’82 में उस कॉलेज में छठी कक्षा में प्रवेश मिला था। ए, बी, सी तीन सेक्शन चलते थे। वे मेरे सेक्शन को नहीं पढ़ाते थे। बाद में उन्हें दसवीं तक की कक्षाएँ मिलनी लगीं। फिर, वहीं रहते उन्होंने हिंदी के बाद संस्कृत में एम.ए. किया। डॉ. महराजदीन पाण्डेय, संस्कृत विभाग, आचार्य नरेन्द्रदेव किसान स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बभनान, गोण्डा के निर्देशन में उन्होंने पीएच. डी. की। उनके शोधप्रबंध का शीर्षक था- ‘गोण्डा जनपद की विद्वत्परम्परा – एक सर्वेक्षणात्मक अनुशीलन’। बाद में यह शोधप्रबंध पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ। यह कार्य श्रीनारायण जी की कीर्ति का मुख्य आधार है। इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी सारी ऊर्जा लेखन में केन्द्रित हो गई।

अपने शोध निर्देशक डॉ महराजदीन पांडेय के साथ डॉ श्रीनारायण तिवारी जी मेरी किताब दलित साहित्य: एक अंतर्यात्रा का विमोचन करते हुए।
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यशःकाय होने का आशय अमर होना है। आचार्य मम्मट ने ‘यश’ को साहित्य का प्रथम प्रयोजन कहा है। उनके बहुत बाद ब्रिटिश दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल ने लिखा कि दुनिया में आने वाला कोई व्यक्ति मरना नहीं चाहता। अमर होने के लिए मानव जाति ने भाँति-भाँति के प्रयत्न किए हैं। अब तक हुए प्रयत्नों को तीन कोटियों में रखा जा सकता है। अमर होने का सबसे स्थूल तरीका है संतानोत्पत्ति। व्यक्ति के न रहने के बाद वह अपनी संतान के रूप में ज़िंदा रहता है। परम्परा और संस्कृति पितृसत्तात्मक होने के कारण अमर करने वाली संतान के रूप में पुत्र की ही मान्यता है।
‘आत्मा वै जायते पुत्रः’ – आत्मा ही पुत्र रूप में जन्मती है। इसके बाद वाला हिस्सा किसी को बोलते न सुना- ‘पुत्रेण दुहिता समा’। तो, पुत्र प्राप्ति अमर होने का सबसे प्रारंभिक, स्थूल उपाय है। दूसरा उपाय है पोखर, बगीचा, कुआँ, सराय, धर्मशाला का निर्माण करवाना। ये निर्माण लंबे समय तक अस्तित्वमान रहते हैं।
जब तक ये स्मारक हैं तब तक उनको बनवाने वाला भी स्मृत होता रहेगा, यशःकाय बना रहेगा। यह अमर होने की किंचित आगे बढ़ी हुई परिष्कृत पद्धति है। अमरता प्राप्ति का तीसरा उपाय साहित्य सृजन है। छः सौ वर्ष पहले के कबीर आज भी हमारे बीच में हैं। उनका ‘बीजक’ जाने कब तक मानव समाज में प्रकाश पुंज की तरह बना रहेगा। ‘हम न मरब मरिहैं संसारा । हमकूँ मिला जियावनहारा।‘ कबीर के राम भले निर्गुण हों लेकिन उनके रचे शब्द तो साकार हैं।
आदिकवि वाल्मीकि के समय कितने राजा, सेनापति, धनकुबेर रहे होंगे। आज कोई उनका नामलेवा नहीं है। वाल्मीकि आज भी हमारे बीच हैं। हम नहीं रहेंगे तब भी वे समाज के मध्य रहकर उसे स्पंदित करते रहेंगे। श्रीनारायण जी ने एक विद्यालय बनवाया। यह दूसरी श्रेणी की अमरता की कामना थी। उन्होंने कई ग्रंथ लिखे। यह संसार में बने रहने का सर्वोत्तम उपाय है। लिखने और प्रकाशित होने का सिलसिला उनका तब शुरू हुआ जब वे सेवानिवृत्त हुए। सन् 2013 में जनता इंटर कॉलेज से मुक्त होने के बाद उनकी लेखनी ऐसे चली जैसे कोई बँधा हुआ पानी फूट निकलता है। उन्होंने अपने जनपद का पग-पग जोह लिया। जब उनसे बात होती वे बताते कि इन दिनों क्या-क्या देख कर आए हैं। जनपद के पृथ्वीनाथ मंदिर के बारे में उन्हीं से जाना।

गाँधी जी 1929 में गोण्डा आए थे। उनके आगमन से जुड़ी बहुत से जानकारियाँ और विवरण श्रीनारायण जी ने संग्रहीत किए थे। जनपद के मंदिरों, तालाबों, नदियों, नालों, मेलों, संगठनों, अख़बारों, पत्रिकाओं, मदरसों, विद्यालयों आदि की बारीक़ से बारीक़ जानकारी उनके पास थी। उन्होंने ‘गोण्डा जनपद और तुलसीदास’ पुस्तक बहुत मन से लिखी थी। तुलसीदास गोण्डा के ही थे, ऐसा उनका दृढ़ मत था। गीता प्रेस की किताबों में बाँदा को गोस्वामी जी के जन्मस्थल होने का श्रेय दिया जाता है। इसे वे नकारते थे। उन्होंने अपनी किताब में ऐसे शब्दों की सूची तैयार करके दी है जो उनके अनुसार गोण्डा में ही व्यवहृत होते हैं। मैं उनके तर्क से बहुत आश्वस्त नहीं हो पाता था। हम दोनों के साझे मित्र और तुलसीदास के जीवन के संबंध में गहन शोध करने वाले गोण्डा के ही विद्वान प्रो. शैलेन्द्रनाथ मिश्र ने जब विस्तार से उस घटना का विवरण दिया कि कैसे बाँदा से आए एक तहसीलदार ने यह सब किया तब जाकर मैं श्रीनारायण जी के दृढ़ मत की कुछ थाह पा सका।

किताब की भूमिका में मेरा नाम भी उन लोगों की सूची में है जो गोण्डा स्थित राजापुर को गोस्वामी जी की जन्मस्थली मानते हैं। इस किताब का लोकार्पण लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय, गोण्डा में हुआ था। मैं भी एक वक्ता था। अवसर मिलने पर मैंने कहा कि गुरु जी के तर्क में दम है। गोण्डा ही तुलसीदास का गृह जनपद होना चाहिए। गोस्वामी जी के अतिरिक्त किसी अन्य महाकवि ने इतने विस्तार से दुर्जन वंदना नहीं की है। अन्य जिलों में सज्जनपुर हैं लेकिन शायद अकेले गोण्डा में दुर्जनपुर नामक जगह है और वह भी एक नहीं, दो-दो दुर्जनपुर! लोकार्पण गोष्ठी के उपरांत किसी सुधी स्रोता ने बताया कि गोण्डा में तीसरा दुर्जनपुर भी है! यह तीसरा दुर्जनपुर कहाँ है, मुझे पता न चला। हो सकता है उन सज्जन ने चुहलबाज़ी की हो। हमारे जिले में ऐसे चुहलबाज़ ‘सज्जन’ बहुतायत में हैं।
मेरे ननिहाल के एक बुजुर्ग तमाम गाँवों की ऐसी उत्पत्ति कथा बताते हैं कि चकित रह जाना पड़ता है। पहले मैं उन्हें बड़ा मौलिक ज्ञानी मानता था लेकिन समय के साथ पता चला कि वे कल्पना शक्ति के धनी व्यक्ति हैं।
उत्साह को वीररस का स्थायी भाव माना गया है। गुरु जी में उत्साह का कतई अभाव न था। मैंने उन्हें हमेशा उत्साह में भरे पाया। कभी यह उत्साह नवयुवकोचित होता था तो कभी प्रौढ़जनोचित। रस विमर्श में वीरों की चार श्रेणियाँ तय की गई हैं- युद्धवीर, दानवीर, धर्मवीर, दयावीर। अगर कोई नई कोटि बने तो मैं गुरु जी को ज्ञानवीर कहना चाहूँगा।
इस बीच मीडिया और राजनीति ने सम्मिलित रूप से शब्दों का बड़ा अवमूल्यन किया है। लोक में अग्निवीर और शिक्षावीर किस अर्थ में लिए जाते हैं, यह बताने की ज़रूरत नहीं। ‘गोण्डा जनपद का इतिहास और उसकी विद्वत्परम्परा’, ;जनपद गोण्डा और तुलसीदास’ इन दो कृतियों के अतिरिक्त श्रीनारायण तिवारी जी की अन्य क़िताबें हैं- ‘अवधी भाषा एवं साहित्य का इतिहास’, ‘संस्कृत वाङ्मय का इतिहास’ (दो खण्डों में), ‘अवधी लोकगीत’, ‘गोनर्दीय पतञ्जलि’, ‘नौटंकी के नौ रंग’, और ‘शोध मंजरी’। उनकी कई किताबें अभी भी अप्रकाशित हैं और कुछ छपने की प्रक्रिया में हैं।
उनकी किताबों के प्रकाशक महेश सिंह जी हैं जो परसपुर निवासी हैं और दिल्ली में रहकर संग्रह टाइम्स पब्लिकेशन्स चलाते हैं। वे अवश्य ही प्राप्त पांडुलिपियों का प्रकाशन करेंगे। एक सावधानी की तरफ़ इशारा करना अनुचित न होगा कि गुरु जी के पास कई योजनाएँ थीं। वे जानते थे कि अगर धीमी गति से काम करेंगे तो बहुत-सी योजनाएँ धरी रह जाएँगी। यह हड़बड़ी कई बार उनके ग्रंथों में दिखाई पड़ती है। कभी-कभी वे मूल स्रोत का उचित हवाला देना भूल जाते हैं। कभी उद्धरण-चिह्न नहीं लगा होता।
कभी संदर्भित करने में चूक दिख सकती है। असल में, कोई पांडुलिपि तैयार करना कठिन कार्य होता है। उसमें कई सहयोगियों की आवश्यकता होती है। श्रीनारायण जी अपने शोध निर्देशक पाण्डेय जी से मशविरा किया करते थे। पाण्डेय जी की अपनी व्यस्तताएँ रहती होंगी। पढ़ने-लिखने वाले सहयोगियों की कमी श्रीनारायण जी को महसूस होती थी।
आज़ाद नगर में उन्होंने अपना आवास बनवाया था। घर संभालने में दक्ष गुरुमाता श्रीमती पुष्पादेवी लाइब्रेरी की भी देखभाल करती थीं। गुरु जी ने एक विशाल निजी लाइब्रेरी खड़ी कर दी थी। दिल्ली स्थित प्रगति मैदान में हर वर्ष सर्दियों में विश्व पुस्तक मेला लगता है। पहले श्रीनारायण जी पुस्तक मेले में आ जाते थे। उनके शोध निर्देशक भी साथ होते थे। वे पुस्तकों की खूब ख़रीदारी करते थे। आवास पर बना पुस्तकालय उनके सतत प्रयासों का परिणाम था।
अब चाहिए कि परिवार वाले पुस्तकालय को गुरु जी द्वारा स्थापित विद्यालय परिसर में स्थानान्तरित कर दें। वहाँ पढ़ने वाले विद्यार्थी शोधार्थी आते रहेंगे और इस संचित ज्ञानराशि का सदुपयोग होता रहेगा।
श्रीनारायण जी शारीरिक रूप से एकदम फिट थे। वे बड़ी तेज गति से साइकिल चलाते हुए जनता इंटर कॉलेज, अमदही आते थे। धोती-कुरता उनका स्थायी पहनावा था। मैंने उन्हें किसी अन्य पोशाक में कभी नहीं देखा। उनके कपड़े साफ धुले हुए होते थे। साइकिल हमेशा नई चमकती हुई दिखती थी। उनके साथ उनके पड़ोसी गाँव के शिक्षक वासुदेव तिवारी आते थे। कॉलेज में दोनों शिक्षकों की जोड़ी मशहूर थी।
गुरु जी का पहले छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों में खौफ़ था। वे ग़लती होने पर कभी बच्चों को पीट दिया करते थे। बाद में उन्होंने तरीका बदल लिया। वे धैर्यपूर्वक पढ़ाने और समझाने लगे। कॉलेज में कई बार मेरा व्याख्यान भी कराया। कई बार कक्षा में कुछ पढ़ाने भेज दिया। शिक्षण की अपनी अपनी मातृसंस्था से मेरा भी लगाव था और है। जहाँ पढ़ा था वहाँ पढ़ाकर उऋण होने का भाव पैदा होता है।
श्रीनारायण जी की कद-काठी के अंग्रेजी शिक्षक शेषनारायण सिंह थे। यद्यपि वे मस्तमौला और इसलिए बेडौल-से दिखते थे। वे उनसे पहले स्मृतिशेष हो गए। वासुदेव तिवारी जी भी अब इस दुनिया में नहीं हैं। इंटर कॉलेज के अन्य शिक्षकों में चंद्रभान (सी.बी.) सिंह, शिवबालक सिंह, उमाशंकर सिंह, आर.सी. सिंह, दयानिधि तिवारी, प्रजापति तिवारी, विजयदत्त पाठक, शेषनाथ सिंह और परम आदरणीय शीतला प्रसाद सिंह एक-एक कर सब चले गए। जनता इंटर कॉलेज भी बदल गया।
ज्ञानस्थल को धर्मस्थल बनाने की चेष्टाएँ पहले भी होती थी लेकिन अब वे कोशिशें सफल हो गई हैं। जो सूचनाएँ छनकर पहुँचती हैं, उनसे दुःख ही होता है। यह ज़रूरी है कि सभी कक्षाएँ नियमित लगें। शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति हो। नियुक्तियों में कोई धाँधली न हो। योग्य शिक्षक होंगे तो देश को योग्य नागरिक मिलेंगे।
शिक्षक को ग़ैर शैक्षणिक कार्यों में लगाया जाना तत्काल बंद हो। देश के इतने युवा रोज़गार की तलाश में हैं, उन्हें इस काम के लिए रखा जाए। शिक्षक सिर्फ़ अध्ययन-अध्यापन करे। अध्यापन के समय वह निर्भय रहे। शिक्षक की निर्भयता अध्यापन की गुणवत्ता पर निर्णायक असर डालती है। सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता दुष्प्रभावित होगी तो उसका असर दूरगामी होगा।
श्रीनारायण जी उदारचेता व्यक्ति थे। वे मेरे विचारों तथा मेरी प्रतिबद्धताओं से न केवल परिचित थे वरन जब भी कुछ मेरा लिखा पढ़ते, फोन करके अपनी प्रतिक्रिया देते। उत्साहवर्धन करते। मैंने अपनी कई किताबें उन्हें भेंट की थीं। उन्होंने उन किताबों को आलमारी में सजाया नहीं, उन्हें पढ़ा और दूसरों को पढ़वाया भी। मेरा यह दावा हास्यास्पद होगा कि प्रगतिवादी, आंबेडकरवादी साहित्य पढ़कर वे वैसा ही हो गए थे लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उनकी विचारदृष्टि निरंतर अध्ययन से विस्तृत होती गई थी।
सेवानिवृत्ति के बाद उनकी समझ में स्वाध्याय और संगति के बलबूते इतना कुछ जुड़ गया था कि उनके जीवन के पूर्वार्ध से परिचित लोग बाद में उनसे मिलकर अचरज करते। विचारधारा के मामले में श्रीनारायण जी के शोध निर्देशक की यात्रा उल्टी रही। उनकी शुरुआत संस्कृत के प्रगतिशील रचनाकार के रूप में हुई। समय पाकर यह विचारधारा और पुष्ट-प्रखर होनी थी लेकिन वह पश्चगामी हो गयी। एक जनपक्षधर कवि को हिंदुत्ववादी होते देखना बहुत तक़लीफदेह है।
श्रीनारायण तिवारी के स्मृतिशेष होने से एक खालीपन का अहसास हो रहा है। ग्लानि भी है कि समय रहते मिल क्यों न पाया! पिछली जुलाई में वे दिल्ली आए थे। तब मैं शहर से बाहर था। उसके बाद उनसे मिलने की सिर्फ़ योजनाएँ बनती रहीं। किसी ‘शुभचिंतक’ ने जब फेसबुक पर मेरे बारे में कुछ मनगढ़ंत आक्षेप किए तो सूर्यपाल सिंह जी का गोण्डा से फोन आया। वे इस तरह की भाषा और तेवर से दुखी थे।
मैंने उनसे कहा कि जून में आपसे मिलने आऊँगा। उनसे पहले श्रीनारायण तिवारी से मिलने का वायदा कर चुका था। इसकी सूचना कौड़िया बाज़ार निवासी अपने वरिष्ठ साथी प्रख्यात अनुवादक राजेन्द्र तिवारी को दे चुका हूँ। अब अपने जिले जाकर भी गुरु जी से मिल नहीं सकूँगा। उनकी पुस्तकें ही उनकी यशकाया के रूप में उनके आवास पर मिलेंगी। यही कृतियाँ उनकी उज्ज्वल उत्तराधिकारी हैं।

यह स्मृति लेख छापने के लिए प्रतिबिंब मीडिया की संपादकीय टीम को बहुत धन्यवाद।