कुओं का पानी: जिसे हमने बोतलों में कैद कर दिया

कुओं का पानी: जिसे हमने बोतलों में कैद कर दिया

  •  सुविधाओं की दौड़ में हमने सिर्फ पानी नहीं, रिश्तों की मिठास भी खो दी

डॉ रीटा अरोड़ा

गाँव के बीचों-बीच खड़ा वह पुराना कुआँ अब बूढ़े आदमी जैसा लगता है।

चुप… थका हुआ… और भुला दिया गया।

उसके किनारों पर अब बच्चों की हँसी नहीं गूंजती। रस्सी की “चर्र-चर्र” वाली आवाज़ अब इतिहास बन चुकी है। जहाँ कभी औरतों की बातें, ठहाके और गीत गूंजते थे, बुज़ुर्ग वहीं बैठकर हुक्का पीते थे। वहाँ अब सिर्फ सूखी पत्तियाँ उड़ती हैं और कभी-कभी कोई छिपकली दीवार पर भागती दिखाई दे जाती है।

कुआँ मरता नहीं है। वह बस इंतज़ार करता है। किसी अपने के लौटने का।

लेकिन अब कौन लौटेगा?

अब तो हर घर में आरओ (RO) लगा है, हर हाथ में प्लास्टिक की बोतल है और हर इंसान खुद को “हाइजीनिक” समझकर मिट्टी की खुशबू से भाग रहा है।

दादी उन दिनों को याद करते हुए बताती हैं – मुझे याद है गर्मियों की दोपहरें।

जब सूरज आग उगलता था और खेतों की मिट्टी पैर जला देती थी।

तब एक पीतल की गागर लेकर कुएँ तक जाती थीं। रस्सी फेंकती थीं… बाल्टी “छपाक” से पानी में गिरती थी… और फिर दोनों हाथों से रस्सी खींचती थीं।

वह सिर्फ पानी नहीं निकाल रही होती थीं। वह धरती का दिल बाहर खींच रही होती थीं। उस पानी में ठंडक नहीं, दुआ होती थी। पहला घूंट गले से उतरता नहीं था… आत्मा तक पहुँच जाता था।

आज की बोतल वाला पानी? वह पानी नहीं, प्लास्टिक का घमंड है। उस पर लिखा होगा – “मिनरल वॉटर”, “प्योर”, “हिमालयन”।

कुएँ का पानी इंसान को जोड़ता था। बोतल का पानी इंसान को अकेला कर गया। पहले लोग कुएँ पर मिलते थे। कोई रस्सी पकड़ लेता था, कोई बाल्टी खींच देता था, कोई हालचाल पूछ लेता था। पानी भरते-भरते रिश्ते बन जाते थे। कई प्रेम कहानियाँ वहीं शुरू हुई थीं। कई झगड़े वहीं खत्म हुए थे।

अब?

अब हर कोई अपनी-अपनी बोतल लेकर घूम रहा है जैसे दिल नहीं, “पर्सनल पैकेजिंग” लेकर पैदा हुआ हो। पहले माँ मटके में कुएँ का पानी भरती थीं। उस मटके के ऊपर रखा पीतल का गिलास पूरे घर की प्यास बुझाता था। कोई “माय बोतल”, “योर बोतल” नहीं होता था। आज हर बच्चे के बैग में अलग बोतल है और हर इंसान के दिल में अलग अकेलापन।

कुएँ का पानी सिर्फ शरीर नहीं ठंडा करता था। वह इंसान का दिमाग भी शांत करता था। कुएँ के पास बैठो तो हवा अलग लगती थी। ऐसा लगता था जैसे धरती धीरे-धीरे तुम्हारे सिर पर हाथ फेर रही हो।

अब आरओ (RO) मशीन दीवार पर टंगी रहती है जैसे कोई सरकारी क्लर्क हो। उस मशीन में कोई आत्मा नहीं है। कुएँ में आत्मा थी। कुएँ के पानी में मिट्टी की हल्की-सी खुशबू होती थी।

वही खुशबू जो पहली बारिश में आती है और आदमी को बचपन में पहुँचा देती है। आज के फिल्टर उस खुशबू को “इम्प्योरिटी” बोलकर मार देते हैं।

कितनी अजीब बात है। हमने स्वाद को बीमारी मान लिया और केमिकल को शुद्धता।

अब गाँवों में भी लोग कहते हैं – “कुएँ का पानी मत पीना, सेफ नहीं है।” लेकिन वही लोग पिघला हुआ प्लास्टिक मिला पानी पी जाते हैं।

फिर डॉक्टर के पास जाकर पूछते हैं – “पता नहीं शरीर में इतनी गर्मी क्यों बढ़ रही है?”

कुआँ गाँव का व्हाट्सऐप (Whatsapp) था। हर खबर वहीं मिलती थी। किसके घर मेहमान आए, किसकी फसल अच्छी हुई, किसकी बेटी की शादी तय हुई – सब कुछ वहीं पता चलता था।

आज मोबाइल में हजारों कॉन्टैक्ट्स (Contacts) हैं, लेकिन दरवाज़ा खटखटाने वाला एक इंसान नहीं।

हमने सुविधा के चक्कर में जीवन का स्वाद खो दिया।

फ्रिज ठंडा दे सकता है, लेकिन ताज़गी नहीं।

आरओ साफ पानी दे सकता है, लेकिन अपनापन नहीं।

बोतल स्टेटस दे सकती है, लेकिन संतोष नहीं।

और सबसे दुखद बात?

अब कुएँ सिर्फ फिल्मों में दिखते हैं। हीरोइन वहाँ गाना गाती है, लोग फोटो खींचते हैं और फिर वापस मिनरल वॉटर पीने चले जाते हैं। कुएँ को हमने विरासत नहीं रहने दिया। उसे “बैकग्राउंड एस्थेटिक” बना दिया।

जिस कुएँ ने पीढ़ियों की प्यास बुझाई, आज उसी में लोग कूड़ा फेंक देते हैं।

प्लास्टिक की बोतलें… चिप्स के पैकेट… टूटी चप्पलें…

कभी-कभी लगता है, धरती माँ भी थक गई होगी।

वह सोचती होगी – “मैंने इन्हें नदियाँ दीं, कुएँ दिए, बारिश दी… और इन्होंने बदले में मुझे प्लास्टिक लौटा दिया।”

अगली बार जब आप फ्रिज से बोतल निकालकर पानी पिएँ, तो एक पल रुकिएगा।

आँखें बंद करके उस पुराने कुएँ को याद कीजिएगा।

रस्सी की आवाज़… बाल्टी की छपाक… मटके की ठंडक…और दादी के हाथों का वह पीतल का गिलास।

फिर समझ आएगा – *प्यास सिर्फ गले की नहीं थी। प्यास रिश्तों की भी थी। और वह प्यास… बोतलों से कभी नहीं बुझ सकती।*

One thought on “कुओं का पानी: जिसे हमने बोतलों में कैद कर दिया

  1. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    डॉ रीटा अरोड़ा का यह लेख भी बहुत विश्लेषणात्मक, शिक्षाप्रद और उपयोगी है।
    लेकिन “नयी टेक्नोलॉजी” हमारे जीवन को बदल देती है और हम टेक्नोलॉजी को “अनदेखा” भी नहीं कर सकते हैं?
    इसका एक उपाय यह भी हो सकता है कि हम उत्तम मिट्टी से बना हुआ कुम्हार का बनाया घड़ा/मटका खरीदें। उसको अपने RO के नीचे स्थापित करें और RO के पानी से घड़ा भर लें।
    इससे आपका पानी ‘हाइजीनिक’ भी हो जाएगा और आपको उसमें सौंधी मिट्टी की महक, स्वाद, ठंडक तथा लंबी अवधि तक प्यास बुझाने का गुण भी मिलेगा !
    उपरोक्त तीनों गुण फ्रिज के पानी में नहीं मिल सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *