रिसाल जांगड़ा की एक ग़ज़ल

ग़ज़ल

किसे मौत ने छला नहीं है

रिसाल जांगड़ा

 

सूरज भी क्या ढला नहीं है।

कौन बशर है जिसके दिल पर,

ग़म का खंजर चला नहीं है।

ढूँढ़ो ऐसा फूल चमन में,

काँटों में जो पला नहीं है।

जीना है गर एक कला तो,

मरना भी क्या कला नहीं है।

पेड़-परिन्दो से मुँह मोड़ा,

इस में तेरा भला नहीं है।

राहगुजर में पड़ा कभी भी,

पत्थर खुद ही टला नहीं है।

‘रिसाल’ अभी तक भी क्यों तेरा,

मन का दीपक जला नहीं है।