रणबीर सिंह दहिया की दो रागनी
रागनी..1
किरण — एक प्रवाशी परिवार के बारे एक रागनी। क्या बताया भला–
बिहार तैं चालकै आये साँ हरियाणा मैं काम बताया रै।।
किरण साथ दो बालक छोटे गरीबी का सिर पै छाया रै।।
1
पाँच छह दिन रहे टेशन पै रहने की जागां पाई ना
बात करी दो चार जागां कई दिन दिहाड़ी थ्याई ना
कई रात नींद जमा आई ना बालकां नै जमा हिलाया रै।।
2
पंचवटी कालोनी मैं एक टूट्या फुटया सा मकान मिल्या
पानी ल्यावां दूर सड़क पर तैं जोड़ जोड़ दोनों का हिल्या
किरण नै खाना बनाने का काम एक कोठी मैं थ्याया रै।।
3
एक दुकान पर तैं रेहड़ी पै सब्जी बेचन का मिल्या काम
दो तीन मोहळ्यां मैं जाना सुबह दोपहरी और शाम
चार सौ पांच सौ की बिकै इसमें कुछ ना बच पाया रै।।
4
चार मिहने पीछै मिस्त्री का दिया काम दिवा ठेकेदार नै
आठ मिहने काम चल्या उड़ै या सांस आई घरबार नै
पेट पालण का इस ढालाँ रणबीर जुगाड़ बिठाया रै।।
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रागनी..2..
आज का माणस
आज का माणस किसा होग्या सारे सुणियो ध्यान लगाकै।।
स्वार्थ का कोए उनमान नहीं देख्या ज़िब नजर घुमाकै।।
1
चाट बिना भैंस हरियाणे की दूध जमा ना देवै देखो
इसका दूध पी हरियाणवी खुबै ए रिश्वत लेवै देखो
भगवान इणनै सेहवै देखो यो बैठया घर मैं आकै।।
स्वार्थ का कोए उनमान नहीं देख्या ज़िब नजर घुमाकै।।
2
और किसे की परवाह कोण्या अपने आप्पे मैं खोया
दूज्यां की खोज खबर ना हमेशा अपना रोना रोया
कमजोर कै ताकू चभोया बैठै ठाड्डे की गोदी जाकै।।
स्वार्थ का कोए उनमान नहीं देख्या ज़िब नजर घुमाकै।।
3
दूसरयाँ नै ख़त्म करकै अपना व्यापर बढ़ावै देखो
चुगली चाटी डांडी मारै सारे हथकण्डे अपनावै देखो
दगाबाज मौज उड़ावै देखो चौड़ै सट्टे की बाजी लाकै।।
4
स्वार्थ का कोए उनमान नहीं देख्या ज़िब नजर घुमाकै।।
मारो खाओ मौज उड़ाओ इस लाइन पै चाल पड़या
हाथ ना आवै जै आवै तो होवै रिश्वत कै तान खड़या
रणबीर सिंह नै छंद घड़या सच्चाई का पाळा पाकै।।
स्वार्थ का कोए उनमान नहीं देख्या ज़िब नजर घुमाकै।।
