विश्व पृथ्वी दिवस पर विशेष
राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं
1.
ये कविता,यें पृथ्वी.
विश्वास है, पृथ्वी है, मैं हूं
मैं नहीं रहूँगा,पृथ्वी है,रहेगी पृथ्वी
विश्वास रहा है,रहेगा विश्वास सहित विश्वास
चींटियाँ चाट जाऍंगी मगरमच्छों के दिन
हलवाई और कर्णधार बनाते रहेंगे नीतियाँ
कारख़ाने उगलते रहेंगे ज़हरीले फ़रमान
मैं फिर-फिर रौपता रहूँगा नीम और करॅंज
मैं फिर-फिर लिखता रहूँगा प्रेम और पानी
मैं फिर-फिर उठाता रहूँगा आवाज़ भीड़ में
नक़्क़ारख़ानों में साधारण तूती की तरह
कोई प्रलय की अफ़वाह फैलाएगा
कोई फैलाएगा नश्वरता का प्रलाप
कोई बटोरेगा डॉलर और चाँदी-सोना
सब चुभोऍंगे नश्तर कविता को ही चुभोऍंगे
कोई भी चाहेगा नहीं,कोई भी बचाएगा नहीं
फिर भी रहेगी और बचेगी कि है विश्वास
गहराई से ऊॅंचाई है,पेट में है पानी अपार
चीरते हुए चट्टानी सीना,अतल तक गड़ी है
शायद इसीलिए मनुष्य से कुछ बड़ी है
ये कविता,ये पृथ्वी.
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2
झूठ को सच लिखूँगा नहीं
डरता हूँ तो डरता हूँ ख़ुद से
किसी की भी बंदूक से डरूँगा नहीं
लालच कोई है नहीं, लिप्सा भी है नहीं
सच को सच कहा है सच ही कहूँगा
आज हूँ, कल हूँ हमेशा रहूँगा नहीं
झूठ को सच लिखूँगा नहीं.
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