पुनर्निर्माण के लिए आत्मनिरीक्षण का कोई विकल्प नहीं
शंभुनाथ
कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां अपनी ऐतिहासिक महानता से निकलकर इन दिनों बुरी दशा में हैं। हिंदी प्रदेश में जो राजनीतिक ताकतें लंबे– लंबे समय तक कभी परिवर्तन की मुखर आवाजें थीं और उनका लोगों पर बड़ा प्रभाव था, वे हिंदी क्षेत्रों में अब प्रायः हाशिए पर हैं और विवशताओं से घिरी हैं। इनके लोग एक भयंकर बाढ़ में अपनी छोटी–छोटी छतों पर मोबाइल लेकर बैठे व्यक्ति हैं। इस बाढ़ में इनकी जमीनें डूब गई हैं, बल्कि खो गई हैं!
मैंने आपातकाल के बाद भी 1980 तक ऐसे कांग्रेस समर्थकों को देखा है जो कांग्रेस के नेताओं के पतन, उनकी स्वेच्छाचारिताओं के बावजूद कांग्रेस के ऐतिहासिक योगदान के कारण मानसिक रूप से अपने को कांग्रेसी से भिन्न कुछ और मान नहीं सकते थे।
गांधी ने कांग्रेस को छोटे एलीट वर्ग से बाहर निकाल कर जन–जन तक पहुंचाया था और सही अर्थों में इसे एक समावेशी, राष्ट्रीय और जनदरदी मानवतावादी पार्टी बना दिया था। हालांकि आजादी से पहले ही उन्होंने इस अपूर्व सुंदर फल में लगे कीड़े देख लिए थे। लक्षित कर लिया था कि यह पार्टी धीरे–धीरे जनाकांक्षाओं से दूर होती जा रही है और सुविधावादी इसे निजी लाभ के मंच में बदलते जा रहे हैं।
रामविलास शर्मा ने एक बार कहा था कि यदि देश में साम्राज्यवाद और स्वेच्छाचारिताओं का अंत नहीं हुआ तो इसकी सबसे अधिक जिम्मेदारी वामपंथियों की होगी।
आज हमारे देश में सारी बुराइयां चरम पर हैं– झूठ, हिंसा, पाखंड, सामाजिक अन्याय, बौद्धिक आत्मसमर्पण। आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि हिंदी प्रदेशों में इस पतन और विफलता के क्या कारण हैं। वामपंथी हाशिए पर क्यों चले गए कि आज हर तरफ भावावेग की इतनी अधिक प्रधानता है और मूर्खताओं का इतना व्यापक हिंसक उत्सव है।
आखिर कैसा नैतिक दोहरापन था, आखिर वैचारिक प्रतिबद्धता ने कट्टरता और पक्षपात के कैसे रूप धारण कर लिए थे, आखिर अतीत के प्रति दृष्टिकोण में कैसा सांस्कृतिक उच्छेदवाद था, सत्ताभोग और बाजार ने आखिर उन्हें इतना अधिक कैसे प्रभावित कर लिया कि अधिकांश लोग ही अपना क्रांतिकारी चरित्र सुरक्षित न रख पाए और वे विभक्त होते गए, व्यक्तिगत पसंद–नापसंद बढ़ती गई और करोड़ों गरीबों– वंचितों को और साधारण मध्यवर्ग को धर्म, जाति तथा प्रांत के नाम पर विभाजित करने में इतनी बड़ी सफलता मिल गई!
आत्मनिरीक्षण हमेशा कठिन है और निश्चय ही आत्मनिरीक्षण न कर पाना अपने जीवन में क्रांतिकारिता या कहें बौद्धिक गहराई के चरम अभाव का लक्षण है! पर पुनर्निर्माण के लिए आत्मनिरीक्षण का कोई विकल्प नहीं है!
मैं जानता हूं, 2014 से देश की स्वाधीनता की घोषणा करने वाले विमूढ़ व्यक्ति इस पोस्ट को अपनी शाश्वत विजय के रूप में देखेंगे, पर ध्यान में रखना चाहिए कोई झूठ या पाखंड शाश्वत नहीं है! शंभुनाथ के फेसबुक वॉल से साभार
लेखक के अपने विचार हैं।
