हमारी बोलियों में छिपा जीवन-दर्शन
-
बुज़ुर्गों के वे वाक्य जो केवल शब्द नहीं, अनुभव थे
डॉ. रीटा अरोड़ा
“दादी, जब कोई मर जाता है तो लोग क्यों कहते हैं कि वे शांत हो गए?” बच्चे ने मासूमियत से पूछा।
दादी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा – “बेटा, इंसान खत्म नहीं होता, बस उसका शरीर थककर शांत हो जाता है।”
बच्चा चुप हो गया।
शायद उसने पहली बार समझा कि बुज़ुर्गों की भाषा में मृत्यु भी डर नहीं, एक गहरी शांति थी।
भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक खूबी यही है कि यहाँ दर्शन केवल ग्रंथों में नहीं, जीवन की रोज़मर्रा की बातचीत में भी मिलता है। हमारे दादा-दादी, नाना-नानी और गाँव-कस्बों के बुज़ुर्ग ऐसे वाक्य बोलते थे, जिन्हंग हम बचपन में सामान्य समझते थे। लेकिन उम्र बढ़ने पर एहसास होता है कि वे केवल शब्द नहीं थे, अनुभवों से निकला जीवन-दर्शन थे।
वे मृत्यु को सीधे मृत्यु नहीं कहते थे। वे कहते थे – “उनका शरीर शांत हो गया।” इस एक वाक्य में भारतीय चिंतन की पूरी गहराई छिपी है। इसमें व्यक्ति और शरीर को अलग माना गया। शरीर थक सकता है, रुक सकता है, मिट्टी में मिल सकता है, लेकिन व्यक्ति का अस्तित्व केवल शरीर तक सीमित नहीं है। यही भाव गीता और उपनिषदों में भी मिलता है, जहाँ आत्मा को अविनाशी माना गया है।
कई बार बुज़ुर्ग कहते थे – “अब उनकी यात्रा पूरी हो गई।” कितना सुंदर वाक्य है यह। जीवन को यात्रा मानने वाली यह दृष्टि मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक पड़ाव का पूरा होना मानती है। जैसे कोई यात्री अपनी मंज़िल तक पहुँच गया हो। इसमें भय कम है, स्वीकार अधिक है।
कई वृद्ध लोग अपने शरीर के लिए कहते थे – “अब ये कपड़े बहुत पुराने हो गए हैं।” पहली बार सुनने पर लगता है कि वे वस्त्रों की बात कर रहे हैं, लेकिन असल में वे शरीर की बात कर रहे होते थे। भगवद्गीता का प्रसिद्ध भाव है कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है। हमारे बुज़ुर्ग शायद शास्त्र नहीं सुनाते थे, पर जीवन उसी भाव से जीते थे।
पुरानी पीढ़ी जीवन को रेलयात्रा से भी जोड़ती थी। वे कहते थे – “ज़िंदगी की गाड़ी चल रही है, पता नहीं पहले किसे स्टेशन उतरना है।” इस वाक्य में मृत्यु की अनिश्चितता भी है और जीवन की सहज स्वीकृति भी। हर यात्री जानता है कि किसी न किसी स्टेशन पर उतरना है। फर्क केवल इतना है कि किसी का स्टेशन पहले आ जाता है और किसी का बाद में।
कई बार वृद्धावस्था में कोई बुज़ुर्ग धीमे से कह देता था – “अब बुलावा आने वाला है।” मृत्यु को बुलावा कहना कितना अद्भुत है। इसमें मृत्यु को दुर्घटना नहीं, एक निमंत्रण माना गया। मानो कोई शक्ति हमें इस संसार में भेजती है और समय पूरा होने पर वापस बुला लेती है। इस भाव में डर से अधिक विनम्रता है।
हमारे घरों में अक्सर सुना जाता था – “बेटा, हम तो इस दुनिया में मेहमान हैं।” यह वाक्य मनुष्य को अस्थायित्व का बोध कराता है। मेहमान घर की हर चीज़ को अपना स्थायी अधिकार नहीं मानता। वह प्रेम से रहता है, पर जानता है कि एक दिन जाना है। यदि हम सचमुच इस वाक्य को समझ लें, तो अहंकार, लालच और कटुता अपने आप कम हो जाए।
“जो आया है उसे जाना भी है” – यह वाक्य लगभग हर भारतीय परिवार में सुनने को मिलता है। सरल लगता है, लेकिन इसमें जीवन का सबसे बड़ा सत्य छिपा है। जन्म और मृत्यु एक ही चक्र के दो छोर हैं। यदि आने को स्वीकार किया है, तो जाने को भी स्वीकार करना ही होगा।
ग्रामीण भारत में वृद्ध व्यक्ति के लिए कहा जाता था – “अब तो पत्ता पक गया है।” यह कितना प्रकृति-प्रधान रूपक है। जैसे पका हुआ पत्ता समय आने पर वृक्ष से अलग हो जाता है, वैसे ही वृद्ध शरीर भी एक दिन प्रकृति में लौट जाता है। इसमें दुख नहीं, प्राकृतिक नियम की समझ है।
बुज़ुर्ग अक्सर कहते थे – “अब शरीर जवाब दे रहा है।” ध्यान देने की बात है कि वे यह नहीं कहते थे कि “मैं खत्म हो गया हूँ।” वे कहते थे शरीर जवाब दे रहा है। यानी भीतर का “मैं” अभी भी जीवित है, पर शरीर अब पहले जैसा साथ नहीं दे पा रहा। यह आत्मा और शरीर के अंतर की बहुत सहज अभिव्यक्ति है।
“चार दिन का मेला है” – यह भी बुज़ुर्गों का प्रिय वाक्य था। सचमुच जीवन मेले जैसा ही तो है। लोग आते हैं, मिलते हैं, हँसते हैं, कुछ खरीदते हैं, कुछ खोते हैं और फिर अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। यदि जीवन को मेला समझ लिया जाए, तो हम उससे आनंद लेना सीखते हैं, उसे पकड़कर बैठना नहीं।
“खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाएँगे” – यह वाक्य हमें वैराग्य सिखाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि मेहनत न करें या प्रगति न करें। इसका अर्थ है कि सफलता के साथ अहंकार न जोड़ें। जब अंत में सब यहीं रह जाना है तो फिर द्वेष कैसा, घमंड कैसा और संग्रह की इतनी बेचैनी क्यों?
हमारी बोलियों में “मिट्टी अपनी मिट्टी में मिल गई” जैसा वाक्य भी सुनाई देता है। भारतीय परंपरा शरीर को पंचतत्वों से बना मानती है। मृत्यु के बाद शरीर उन्हीं तत्वों में लौट जाता है। यह वाक्य जीवन और प्रकृति के संबंध को बहुत सरलता से समझा देता है।
आज का आधुनिक समाज मृत्यु को कठोर शब्दों में देखता है, वृद्धावस्था को छिपाना चाहता है और जीवन को स्थायी मानकर जीता है। लेकिन पुरानी पीढ़ी जानती थी कि जीवन की सुंदरता उसकी अस्थिरता में ही है। वे मृत्यु से भागते नहीं थे, उसे जीवन के चक्र का हिस्सा मानते थे।
अंततः सच्चाई यही है कि –
हमारे बुज़ुर्गों की भाषा केवल बोलचाल नहीं थी, वह जीवन की पाठशाला थी। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में गीता, उपनिषद, प्रकृति और अनुभव सब साथ चलते थे। वे हमें सिखाते थे कि जीवन यात्रा है, शरीर वस्त्र है, संसार मेला है और मनुष्य इस धरती पर एक अतिथि।
शायद आज हमें फिर से उन बोलियों की ओर लौटना चाहिए, क्योंकि कई बार जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान किसी किताब में नहीं, बुज़ुर्गों के एक सहज वाक्य में छिपा होता है।
