रिश्ते नाते
प्यार का ईंधन – भरोसा
जहाँ विश्वास साँस लेता है, वहीं प्रेम उम्रभर जीवित रहता है
डॉ. रीटा अरोड़ा
“तुम मुझ पर भरोसा करते हो?”
यह प्रश्न शायद दुनिया के सबसे कठिन प्रश्नों में से एक है। इसका उत्तर केवल “हाँ” या “नहीं” में नहीं दिया जा सकता, क्योंकि भरोसा कोई शब्द नहीं, बल्कि एक अनुभव है।
कुछ दिन पहले एक परिचित ने अपने बेटे की नई कार दिखाई। कार बिल्कुल नई थी। मैंने सहज ही पूछा, “चाबी कहाँ है?”
वे मुस्कुराए और बोले, “कार बाहर खड़ी है… चाबी भी उसी में है।”
मैं चौंक गया। “आज के समय में? आपको डर नहीं लगता?”
उन्होंने शांत स्वर में कहा, “डर तो लगता है, लेकिन हर पल डर के साथ जीना उससे भी बड़ा नुकसान है।”
उनकी बात केवल कार की नहीं थी। वे जीवन का एक गहरा सच कह रहे थे।
दरअसल, हमारा पूरा जीवन भरोसे की नींव पर खड़ा है। हम हर सुबह यह विश्वास लेकर उठते हैं कि सूरज फिर निकलेगा, दूधवाला आएगा, बैंक में जमा धन सुरक्षित रहेगा, डॉक्टर अपनी पूरी निष्ठा से इलाज करेगा और जिस विमान में बैठेंगे, उसका पायलट हमें सुरक्षित मंज़िल तक पहुँचा देगा। यदि हर जगह केवल संदेह ही संदेह हो, तो जीवन का कोई भी पहिया आगे नहीं बढ़ सकता।
फिर सोचिए, जिस रिश्ते का दूसरा नाम ही प्रेम है, वह भरोसे के बिना कैसे जीवित रह सकता है?
आज रिश्तों में प्रेम की कमी शायद उतनी नहीं है, जितनी भरोसे की। लोग कहते हैं, “मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ,” लेकिन अगले ही पल पूछ बैठते हैं—”फोन किसका था?”, “इतनी देर कहाँ थे?”, “ऑनलाइन थे तो जवाब क्यों नहीं दिया?”
मोबाइल फोन ने दूरियाँ कम की हैं, लेकिन कई बार मन की दूरियाँ बढ़ा दी हैं। अब लोग एक-दूसरे की आँखों में कम और मोबाइल की स्क्रीन पर ज़्यादा भरोसा करने लगे हैं। ‘लास्ट सीन’, ‘ब्लू टिक’ और सोशल मीडिया की गतिविधियाँ कई बार रिश्तों का पैमाना बन जाती हैं।
एक समय था जब चिट्ठियाँ हफ्तों बाद पहुँचती थीं। महीनों मुलाकात नहीं होती थी, फिर भी रिश्ते बने रहते थे। आज कुछ मिनट का विलंब भी मन में अनगिनत आशंकाएँ पैदा कर देता है।
समस्या तकनीक नहीं है। समस्या यह है कि हमने भरोसे की जगह कल्पनाओं को बैठा दिया है। मन अक्सर वहाँ भी कहानियाँ गढ़ लेता है, जहाँ कोई कहानी होती ही नहीं।
भरोसा अंधविश्वास नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि सामने वाला कभी गलती नहीं करेगा। इसका अर्थ केवल इतना है कि जब तक सत्य सामने न आए, तब तक हम अपने मन को झूठे निष्कर्ष निकालने की अनुमति नहीं देंगे।
रिश्ते अदालत नहीं होते, जहाँ हर दिन सबूत पेश करने पड़ें। रिश्ते तो वह जगह हैं जहाँ कई बार बिना किसी प्रमाण के भी एक-दूसरे का हाथ थाम लिया जाता है।
एक छोटा बच्चा जब अपने पिता की उँगली पकड़कर सड़क पार करता है, तो उसे ट्रैफिक के नियम नहीं मालूम होते। उसे केवल इतना विश्वास होता है कि यह हाथ उसे गिरने नहीं देगा।
यही भरोसा है।
और शायद यही प्रेम भी है।
भरोसा माँगने से नहीं मिलता, कमाना पड़ता है। निभाया गया हर वादा, बोला गया हर सत्य, कठिन समय में दिया गया हर साथ-भरोसे की गुल्लक में जमा होने वाला एक छोटा-सा सिक्का है।
लेकिन यह गुल्लक बड़ी अनोखी होती है। इसे भरने में वर्षों लग जाते हैं और टूटने में केवल एक क्षण।
एक झूठ…
एक छल…
या एक विश्वासघात…
इतना ही काफी होता है।
इसलिए रिश्तों में सबसे मूल्यवान उपहार महँगे तोहफ़े नहीं होते। सबसे बड़ा उपहार यह होता है कि आपकी अनुपस्थिति में भी सामने वाले को आपकी नीयत पर संदेह न हो।
प्रेम का अर्थ किसी को अपने अधिकार में बाँध लेना नहीं है। यदि हर पल निगरानी करनी पड़े, हर बात का हिसाब माँगना पड़े और हर मुस्कान पर प्रश्नचिह्न लगाना पड़े, तो वह रिश्ता प्रेम से अधिक पहरेदारी बन जाता है।
भरोसा किसी रिश्ते की सबसे शांत आवाज़ है। वह शोर नहीं करता, फिर भी उसी के सहारे रिश्ता साँस लेता है।
शायद इसलिए जिन रिश्तों में भरोसा गहरा होता है, वहाँ शब्द कम और सुकून ज़्यादा होता है। वहाँ हर देर का कारण नहीं पूछा जाता, हर चुप्पी का अर्थ नहीं निकाला जाता और हर दूरी को बेवफाई का नाम नहीं दिया जाता। वहाँ यह विश्वास होता है कि यदि सामने वाला मौन है, तो उसके पास कोई वजह होगी; यदि वह दूर है, तो लौटकर आएगा।
रिश्तों को प्रतिदिन नए वादों की नहीं, बल्कि निभाए गए विश्वास की आवश्यकता होती है। प्रेम का वृक्ष भावनाओं से नहीं, भरोसे के जल से हरा-भरा रहता है।
कार पेट्रोल के बिना कुछ दूर तक चल सकती है, लेकिन अंततः रुक जाती है।
रिश्ते भी केवल प्रेम के सहारे कुछ समय तक चल सकते हैं, पर यदि भरोसे का ईंधन समाप्त हो जाए, तो सबसे सुंदर दिखने वाला रिश्ता भी एक दिन बीच रास्ते ठहर जाता है।
इसलिए अगली बार जब कोई आपसे पूछे-“क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?”- तो शायद उससे भी बड़ा प्रश्न यह होगा…
*”क्या तुम मुझ पर भरोसा करते हो?”*
क्योंकि प्रेम की मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता हमेशा भरोसे की सड़क से होकर ही जाता है।
