लघु कथा
अभी तो बहुत कुछ करना बाकी है
डॉ रीटा अरोड़ा
“अब तो आप रिटायर हो गए हैं, पापा। आराम कीजिए, आखिर कब तक काम करेंगे?” बेटे ने कहा।
पिता मुस्कुराए, “रिटायर हुआ हूँ बेटा, रुका नहीं हूँ।”
“लेकिन इस उम्र में नया काम शुरू करना आसान नहीं होगा।”
“आसान तो नहीं होगा,” उन्होंने चश्मा ठीक करते हुए कहा, “पर क्या जिंदगी सिर्फ आसान काम करने का नाम है?”
बेटा चुप हो गया।
अगले दिन पिता ने अपनी पुरानी किताबें निकालीं, कुछ नोट्स बनाए और पास के कॉलेज में पढ़ाने का प्रस्ताव भेज दिया।
कुछ महीनों बाद बेटे ने पूछा, “पापा, आप थकते नहीं?”
“थकता हूँ,” पिता हँसे, “लेकिन जब कोई विद्यार्थी कहता है कि आपकी वजह से मुझे कुछ नया समझ आया, तो थकान छोटी लगने लगती है।”
“आपको अब भी कुछ साबित करना है क्या?”
पिता ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “किसी और को नहीं। खुद को यह याद दिलाना है कि उम्र बढ़ सकती है, जिज्ञासा बूढ़ी नहीं होनी चाहिए।
बेटे ने उनका हाथ पकड़ लिया।
पिता कुछ देर चुप रहे। फिर धीरे से बोले,
“रिटायरमेंट के बाद जिंदगी कैसी होनी चाहिए, यह फैसला उम्र करेगी या हम खुद?”
बेटा उनकी ओर देखता रहा।
पिता ने मेज पर रखी अपनी किताब खोली और पढ़ने लगे।
शायद उस दिन बेटे को अपने पिता के सवाल का जवाब मिल गया था… या शायद यह सवाल अब उसके भीतर भी जन्म ले चुका था।
