दलित चिंतक मोहन मुक्त के हिंदू दर्शन को लेकर कुछ विचार
1.
न्याय की अवधारणा इंसानों के बीच नैसर्गिक बराबरी की स्वीकृति पर टिकी है… ब्राह्मण दर्शन इंसानों के बीच नैसर्गिक गैर बराबरी पर खड़ा है… इसलिए ब्राह्मण दर्शन न्याय नहीं जानता… वो दंड को न्याय कहता है… दंड और न्याय के बीच अंतर वो जानता ही नहीं…
2.
मूल प्रश्न का महत्व-
सुकरात ने पूछा न्याय क्या है, प्लेटो ने जवाब तलाशा, ईसाइयत और इस्लाम के सूफीवाद की जड़ें प्लेटो के दर्शन में हैं ईसाइयत पहले प्लेटो फिर अरस्तू पर खड़ी हुई। इसलिए देकार्त आ पाया और आई आधुनिकता। ब्राह्मण दर्शन में न्याय कभी सवाल ही नहीं था। समझें।
3.
दो हजार साल के इतिहास में हिंदुओं में सबबसे अधिक मानवीय और ईमानदार आदमी हुआ है मोहन दास गांधी और गांधी दलितों के अधिकारों के खिलाफ भूखे मरने को तैयार थे… बात को समझें हिंदू संस्कृति और दर्शन में न्याय बोध नहीं है… न्याय क्या होता है… वे नहीं जानते…
