गोवा डायरी 2026- तीसरा दिन
गोवा के रईसों का गांव …आइकॉनिक सड़क
संजय श्रीवास्तव
गोवा में तीसरा दिन. मौसम साफ. सुबह हमने गोवा के उस तट की ओर रुख किया, गोवा के उस तट की ओर रुख किया, जहां पुर्तगालियों ने मांडवी नदी के मुहाने की रक्षा के लिए अगुआड़ा फोर्ट बनवाया था. खाली सिटी बस ने कुछ ही मिनटों में बस ने सिंक्वेरिम बीच के करीब पहुंचा दिया. वहां से सिंक्वेरिम बीच मुश्किल से आधा किलोमीटर दूर. यहां की सुबह और शाम सूरज के साथ अलग अनुभव होती है. रास्ता समुद्र के किनारे बने अगुवाडा फोर्ट के एक सिरे की ओर ले जाता है. वहां से समुद्र करीब पांच मीटर नीचे हिलोरें मारता है. लहरें उछल उछल कर आपके चेहरे की ओर आने की कोशिश में लगी रहती हैं.

हम किले के उस हिस्से से समुद्र की हलचल देखते रहे. लहरों का ऊंचा उछलना-गिरना. बगल में तीन अधेड़ गोवन पुरुष मछली मारने का कांटा नीचे डाले हुए थे. थोड़ी देर बाद किले के ऊपरी सिरे की ओर बढ़ गए. समुद्र का सुदूर बिंदू ऐसा लगने लगा कि मानो एक ऐसा क्षितिज है जहां समुद्र और आसमान एक दूसरे में लीन हो रहे हों.
इसी फोर्ट की दीवारों से छूता हुआ 40 एकड़ में फैला खूबसूरत होटल ताज है. जो 17वीं सदी के पुर्तगाली फोर्ट अगुआड़ा की दीवारों और पहाड़ी पर बना है. ये जब 52 साल पहले बनाया गया तो समुद्र किनारे बना गोवा का पहला लग्जरी रिसोर्ट था. यहां काफी सेलिब्रिटीज आती हैं. शादियां और पार्टियां होती हैं.

इसी इलाके में कुछ पुराने पुर्तगाली अधिकारियों के घर भी थे. अगुवाड़ा फोर्ट में ही 1864 में बनाया गया चार मंजिला लाइटहाउस एशिया के सबसे पुराने लाइटहाउसों में गिना जाता है. ये 1976 तक काम करता रहा. अब सैलानियों का आकर्षण बना रहता है. अगुवाडा फोर्ट 400 सालों से ज्यादा पुराना है. पुर्तगालियों ने ये किला 1612 में डच और मराठा हमलावरों से बचाव के लिए बनाया था. इसके लैटराइट पत्थर कमाल के हैं, मैं तो इन्हें पथरीले स्पंजी पत्थर ज्यादा कहना चाहूंगा. गोवा में ज्यादातर पुराने निर्माणकार्य उसी से हुए. सिंक्वेरिम को उत्तरी गोवा का पहला पर्यटक समुद्र तट माना जाता है. अगुवादो फोर्ट प्रचुर मात्रा में पानी इकट्ठा करने की व्यवस्था थी. जब जहाज लंबे समुद्री सफर के लिए निकलते थे, जो यहीं से पानी भरते थे.
दस बजे तक वापस होटल लौट आए. स्कूटी किराए पर ली. तय किया गया कि अब गोवा में ऐसे अनछुए इलाके की ओर जाएंगे, जहां लोग कम जाते हैं. ऐसा ही एक इलाका है आसगांव, 400 सालों से ज्यादा पुराना इलाका. पुर्तगाली शासन से पहले इस इलाके में स्थानीय गोअन समाज की बस्तियां थीं. पुर्तगाली शासन के बाद यहां धार्मिक और सामाजिक संरचना में बड़े बदलाव आए. पहले अंजुना बीच की ओर गए. ये इलाका अब भी विदेशियों का प्रिय इलाका है, हालांकि बरसात के सीजन में वो यहां नहीं रहते. ज्यादातर अपने देश लौट जाते हैं, अक्टूबर तक वापस आते हैं.
अंजुना में युवा प्रोफेशनल्स के लिए एक से अच्छे एक हास्टल हैं. समुद्र के किनारे कुछ बेहतरीन शेक्स हैं. फेमस कर्लीज नाम का शेक यहां लंबे समय तक पुराने हिप्पी माहौल का प्रतीक रहा. ये विवादित हुआ, इसे तोड़ा भी गया. शायद ये अब फिर बन गया है.
ये खुला इलाका है. इस जगह की कहानी सबसे निराली जरूर है. ये दरअसल गोवा में हिप्पी युग की कहानी कहने वाला असल इलाका है. अंजुना पश्चिमी हिप्पी ट्रेल के सबसे चर्चित पड़ावों में शामिल हो गया. पूरे यूरोप और अमेरिका से हिप्पी यहां आने लगे. अंजुना को कभी – कभी “फ्रीक कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड” कहा जाने लगा. यहां एक खास फ्ली मार्केट है. कहा जाता है कि 1970 के दशक में यहां ठहरे विदेशी यात्री अपनी निजी चीजें बेचने या आपस में बदलने लगे. इसी तरह की छोटी-बड़ी अदला-बदली से आगे चलकर अंजुना का प्रसिद्ध फ्ली मार्केट विकसित हुआ.

यहीं गोवा ट्रांस संगीत का जन्म हुआ. रात भर चलने वाली पार्टियां, नग्न होकर नृत्य, साइकेडेलिक संगीत और समुद्र की लहरों से जुड़ी कई कहानियां आज भी पुराने हिप्पियों की स्मृतियों में दर्ज हैं. इतिहासकार टेरेसा अल्बुकर्क के अनुसार, अंजुना नाम का संबंध अरबी शब्द ‘हंजुमान’ यानी व्यापारी संघ से हो सकता है. माना जाता है कि पुर्तगालियों से पहले भी इस तटीय इलाके का अरब व्यापारियों से संपर्क था.
यहां से हमारी स्कूटी आसगांव की ओर दौड़ पड़ी, जो यहां से करीब 10-12 किलोमीटर है यानि करीब आधे घंटे का रास्ता. रास्ते में बौना पहाड़, नारियल के पेड़ और धान के खेत नजर आने लगे. बीच बीच में कहीं कोई रेस्टोरेंट. हम जब आसगांव में घुसे तो यहां एक भव्य शांति छाई हुई थी. मानो पूरा इलाका ही ध्यान में डूबा हो. साफसुथरा और पुराने समय में गोवा के धनाढ्य लोगों का इलाका. पुराने पुर्तगाली-गोवन शैली गजब की हवेलियां बिना बोले बता देती हैं कि यहां गोवा के रईस और विशिष्ट लोग रहा करते रहे होंगे. पर ज्यादातर समय के थपेड़ों से जूझती हुईं. बंद. जंग लगे गेट. गेटों पर लटके ताले. उग आई लंबी घास और बिनबुलाए पौधे और झाड़ियां.
लोग इस इलाके को हॉलीवुड की प्रसिद्ध बस्ती की तर्ज पर बेवर्ली हिल्स ऑफ गोवा कहते थे. एक जमाने में यहां कई कलाकार, डिजाइनर, उद्यमी और संपन्न लोग आकर बस गए. इसकी पहचान अब भी इसके पुराने पुर्तगाली मकान, फूलों से भरी गलियां और शांत वातावरण हैं. इसी इलाके में एक खुला, अलसाया और वैधव्य सा रेस्टोरेंट नजर आया. भूख लगने लगी थी. कुछ खाने या चाय पीने की इच्छा हो आई. स्कूटी को स्टैंड पर टिका कर एक मेज के तीन ओर विराजे लोगों से मुखातिब हुआ, तो जवाब मिला – “अभी तो कुछ नहीं मिलेगा.”
“क्या मैगी भी नहीं. चाय भी नहीं.”
“नहीं.”
“पानी की बोतल'”
“हां, वो मिल जाएगी.”
किसी जमाने में ये रेस्टोरेंट जरूर चलता रहा होगा लेकिन अब ये अपने खराब दिनों में है. मोपासा से रोज आने वाले एक वृद्ध उसको चलाते हैं. रोज बस से यहां आते हैं, दोपहर बाद वापसी वाली बस से रवाना हो जाते हैं. वहीं बैठे दिनेश इसी इलाके में पैदा हुए. यहीं रहते हैं. हल्का फुल्का कोई काम करते हैं. जीवन काफी रिलैक्स है. वैसे तो आप किसी भी असली गोवन से पूछेंगे तो वो यही कहेगा, लाइफ रिलैक्स है, कोई टंटा फंटा नहीं मांगता. पीसफुल लाइफ और इंजॉय.
48 साल के दिनेश बताने लगते हैं कि वो इसी इलाके में पैदा हुए. बड़े हुए. कैसे ये इलाका पिछले दस सालों में यकायक बहुत बदलने लगा है. बाहर के लोग आ रहे हैं. पुराने घरों को तोड़कर नए आलीशान बंगले बनवा रहे हैं. पुरानी पीढ़ी ने तो जिंदगी यहां गुजारी लेकिन बाद की जेनरेशन विदेश में जाकर सेटल्ड हो गई. रह गईं खाली हवेलियां, जो अब टूट रही हैं. जगह ले रहे हैं नए अपार्टमेंट, आलीशान बंगले और मार्केटिंग कांप्लैक्स.
देखते ही देखते हरियाणा नंबर की एक एसयूवी वहां से कुछ आगे रुकी. उसमें से तीन युवक और एक युवती उतरे, बन रहे किसी बिजनेस स्ट्रक्चर का मुआयना किया. फिर सर्र से निकल गए.
दिनेश कहने लगे, आपने देखा ना कि ये एसयूवी हरियाणा की है, इसी तरह यहां अब मुंबई, दिल्ली और हरियाणा वाले आकर पैसा लगा रहे हैं. घर खरीद रहे हैं. मेरे पास खरीदने वाले आए, मैं नहीं बेचूंगा, आखिर बच्चों के लिए भी कुछ छोड़कर जाना है कि पिताजी ये देकर गए. लेकिन ये पक्का है कि कुछ सालों बाद यहां आइएगा तो ये गोवन गांव की बजाए कुछ और हो चुका होगा.
वापस लौटते समय एक जगह गोवन फिश थाली का बोर्ड नजर आया, तो उसी रेस्टोरेंट पर रुक गया. भूख – प्यास दोनों महसूस होने लगी थी. ये रेस्टोरेंट गोवा में करीब 20 साल पहले ओडिशा से आए प्रताप और उनका छोटा भाई चलाते हैं. हालांकि उनका परिवार अब भी ओडिसा में ही रहता है. पता लगा कि गोवन फिश थाली में तो समय लग जाएगा तो हमने उनसे मिक्स वेज सब्जी और तवा रोटी ली. काउंटर के पीछे शराब और बीयर की बोतलें सजीं हुई थीं. बियर ने मन ललचा दिया. सो छोटी बोतल उसकी भी. बियर खत्म करते – करते खाना हाजिर. सब्जी का स्वाद लाजवाब. ग्रेवी कमाल की. मैने चलते समय पैसा अदा करने के साथ खासतौर पर इसके लिए शेफ की तारीफ की.
अब हम चल पड़े पर्चा की ओर, ये गोवा की वो आयकोनिक जगह है, जहां हर कोई फोटो खिंचवाना चाहता है, ये एक शांत रोड है. जिसके दोनों ओर नारियल के पेड झुकते हुए हर राहगीर को सलामी देते लगते हैं. ना जाने कितनी ही फिल्मों की शूटिंग यहां हो चुकी है. यहां पहुंचे तो बूंदाबांदी चल रही थी. ये खेतों का इलाका ज्यादा है. आगे शांत बंगले मिलने शुरू होते हैं. हरियाली हर ओर कॉमन फैक्टर. थोड़ा और आगे बढ़े तो तेज बारिश. एक शेल्टर में जगह ली. फटाफट रेनकोट पहने. बारिश का तेज नृत्य पहले मध्यम ताल में आया फिर और अवरोह.
वैसे बारिश में आप कहीं किसी हरियाली जगह में खड़े हों, आसमान से गिरती धाराएं देख रहे हों तो ये सीन दिलोदिमाग को बहुत आनंद औऱ सुकून देता है. रास्ते में कोई बहुत भव्य और पुराना चर्च परिसर मिला. यहां से हमें कैलंगुट की ओर जाने वाली ब्रांच सड़क मिली. फिर तो सबकुछ देखा हुआ था. पहुंच गए वापस होटल.
शाम को हमने उत्तर गोवा के इस प्रवास में आखिरी बार कैंडोलिम के मुख्य बीच का रुख किया. सैलानियों, लहरों के खेलती बालू, मछुआरों का जाल और आसमान से धीरे धीरे समुद्र में उतरता अंधियारा…क्या हसीन शाम थी
( बात जारी रहेगी) . संजय श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से साभार
