भारत में खाने की थाली का बदलता स्वरूप

खान-पान

भारत में खाने की थाली का बदलता स्वरूप

  • पारंपरिक अनाजों से आधुनिक सुगमता की ओर

डॉ. रीटा अरोड़ा

 

“दादी, ये बाजरे की रोटी कौन खाता है? मुझे तो पिज्जा ऑर्डर कर दो।”

पोते की बात सुनकर दादी मुस्कुरा दीं। उन्होंने थाली में रखी बाजरे की रोटी को देखा और धीरे से बोलीं, “बेटा, जिस रोटी ने पीढ़ियों को ताकत दी, आज वही तुम्हें पुरानी लग रही है।”

पोता मोबाइल पर फूड डिलीवरी ऐप देखता रहा। लेकिन दादी की बात कहीं न कहीं उसके मन में उतर गई।

दरअसल, यह केवल एक घर की कहानी नहीं है। यह भारत की बदलती हुई थाली की कहानी है।

एक समय था जब भारतीय रसोई में ज्वार, बाजरा, रागी, जौ और मक्के जैसे पारंपरिक अनाजों की खुशबू होती थी। सुबह सत्तू, दोपहर में मोटे अनाज की रोटी और शाम को घर का बना हल्का भोजन सामान्य बात थी। उस दौर में लोगों को “सुपरफूड” शब्द नहीं पता था, लेकिन उनका भोजन वास्तव में सुपरफूड ही था।

आज तस्वीर बदल चुकी है।

महज एक पीढ़ी के भीतर हमारी थाली में पराठों और दलिया की जगह पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइज़, इंस्टेंट नूडल्स और पैकेटबंद स्नैक्स ने ले ली है। सुविधा ने स्वाद का रूप ले लिया है और स्वाद धीरे-धीरे आदत बन गया है।

यह बदलाव अचानक नहीं आया।

हरित क्रांति के बाद चावल और गेहूं का उत्पादन बढ़ा। धीरे-धीरे ज्वार, बाजरा और रागी जैसे अनाज हमारी थालियों से गायब होने लगे। फिर वैश्वीकरण आया, बड़े खाद्य ब्रांड आए और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का बाजार तेजी से फैलने लगा। 1980 के दशक में दो मिनट में बनने वाले नूडल्स ने भारतीय रसोई में प्रवेश किया और सुविधा वाले भोजन का एक नया युग शुरू हो गया।

शुरुआत में यह सुविधा अच्छी लगी।

कामकाजी परिवारों को समय बचाने का विकल्प मिला। बच्चों को नए स्वाद मिले। शहरों में रहने वालों के लिए भोजन पहले से अधिक सुलभ हो गया।

लेकिन हर सुविधा की एक कीमत होती है।

आज भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का कारोबार लाखों करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। ऐसे खाद्य पदार्थों में अत्यधिक चीनी, नमक, वसा और कृत्रिम तत्व होते हैं, जो स्वाद तो बढ़ाते हैं लेकिन स्वास्थ्य को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाते हैं।

विडंबना देखिए।

आज लोगों के पास खाने के विकल्प पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी पहले से अधिक हैं।

मोटापा बढ़ रहा है। मधुमेह कम उम्र में दिखाई दे रहा है। हृदय रोगों का खतरा बढ़ रहा है। एक ओर कुपोषण है तो दूसरी ओर अतिपोषण। यानी कुछ लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा और कुछ लोग गलत भोजन की वजह से बीमार हो रहे हैं।

सबसे अधिक चिंता की बात युवाओं को लेकर है।

आज का युवा जेनरेशन सुविधा की दुनिया में बड़ा हुआ है। मोबाइल पर एक क्लिक कीजिए और भोजन घर के दरवाजे तक पहुंच जाता है। लेकिन शोध बताते हैं कि अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ केवल शरीर ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहे हैं। एकाग्रता, भावनात्मक संतुलन और मानसिक ऊर्जा पर इसका असर देखा जा रहा है।

यानी मामला सिर्फ भोजन का नहीं, भविष्य का भी है।

समस्या को और गंभीर बनाता है भ्रामक प्रचार।

टीवी और सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाले कई उत्पाद खुद को “हेल्दी”, “शुगर-फ्री” या “रियल फ्रूट” बताते हैं। लेकिन अक्सर उनके भीतर छिपी हुई चीनी, नमक और रिफाइंड वसा की मात्रा बहुत अधिक होती है। उपभोक्ता पैकेजिंग देखकर प्रभावित हो जाता है और वास्तविक पोषण पीछे छूट जाता है।

ऐसे समय में हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने की जरूरत है।

इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिकता को पूरी तरह नकार दिया जाए। बल्कि आवश्यकता संतुलन की है।

बाजरा, ज्वार, रागी और अन्य मोटे अनाज केवल हमारे पूर्वजों की विरासत नहीं हैं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता भी हैं। ये कम पानी में उगते हैं, अधिक पौष्टिक होते हैं और किसानों के लिए भी बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) भी अपनी नवीनतम आहार संबंधी सिफारिशों में थाली का बड़ा हिस्सा सब्जियों, फलों और पारंपरिक अनाजों को देने की बात करती है। यह केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ कृषि का भी प्रश्न है।

दादी की थाली में शायद चमक नहीं थी, लेकिन संतुलन था।

उसमें विज्ञापन नहीं थे, लेकिन पोषण था।

उसमें विदेशी नाम नहीं थे, लेकिन स्थानीय बुद्धिमत्ता थी।

आज जरूरत इस बात की है कि हम सुविधा और स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाएं। बच्चों को केवल स्वाद नहीं, भोजन का मूल्य भी समझाएं। उन्हें यह बताएं कि असली ताकत पैकेट के रंग में नहीं, भोजन की गुणवत्ता में होती है।

क्योंकि भारत की थाली केवल पेट भरने का साधन नहीं है। यह हमारी संस्कृति, हमारी खेती, हमारे स्वास्थ्य और हमारे भविष्य का आईना है।

फंडा यह है कि-

जिस देश ने दुनिया को मसाले, अनाज और संतुलित भोजन की परंपरा दी हो, उसे अपनी थाली की पहचान नहीं खोनी चाहिए। आधुनिकता को अपनाइए, लेकिन अपनी जड़ों को मत भूलिए। क्योंकि स्वस्थ भारत की शुरुआत किसी अस्पताल से नहीं, बल्कि रसोई की थाली से होती है।

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