एक कचौरी, दो समोसा और मर्द समाज के खिलाफ गुस्सा
ओमप्रकाश तिवारी

क्या दिल्ली की सड़कों पर गूंजते ये नारे पुरुषों के खिलाफ हैं या उस व्यवस्था के खिलाफ, जो महिलाओं को आज भी पूरी आज़ादी नहीं दे पाई?
“एक कचौरी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा…”
“एक सुट्टा, दो चाय, मर्द समाज हाय-हाय…”
“एक जीरा, दो अजवाइन, मर्द समाज दो रिज़ाइन…”
“दो कबाब, एक बिरयानी, हर मर्द की अलग कहानी…”
दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों ये नारे सुनाई दे रहे हैं। तुकबंदी है, व्यंग्य है, कहीं हास्य भी है। लेकिन इनके पीछे जो आवाज है, वह हंसी की नहीं, गुस्से की है।
और इसी गुस्से पर बहस शुरू हो गई है।
कुछ पुरुषों का सवाल है—सारे मर्द ऐसे तो नहीं होते, फिर पूरे पुरुष समाज को कटघरे में क्यों खड़ा किया जा रहा है?
सवाल गलत नहीं है। लेकिन इसके साथ एक दूसरा सवाल भी पूछा जाना चाहिए—सारी औरतें भी तो एक जैसी नहीं होतीं। फिर सदियों से “तिरिया चरित्र” जैसी धारणाएं पूरी स्त्री जाति के चरित्र पर क्यों चस्पा की जाती रही हैं?
“तिरिया चरित्तर” का अर्थ ही स्त्री के चरित्र से जुड़ा हुआ है और लोकभाषा में यह मुहावरा अक्सर स्त्री के कथित रहस्यमय या चालाक आचरण के अर्थ में इस्तेमाल हुआ है।
यानी जब किसी पुरुष के अपराध को देखकर कोई महिला कहती है—“मर्दों का क्या भरोसा”, तो हम तुरंत कह देते हैं—“सभी पुरुष ऐसे नहीं होते।”
बिल्कुल। सभी पुरुष ऐसे नहीं होते। लेकिन तब यही तर्क उन तमाम स्त्रियों के लिए भी होना चाहिए जिन्हें सदियों से कुछ महिलाओं के व्यवहार के आधार पर पूरे स्त्री समाज के लिए बनाए गए मुहावरों और पूर्वाग्रहों का बोझ ढोना पड़ा है।
सवाल नारे से बड़ा है
इन नारों को शाब्दिक सत्य मानना शायद उचित नहीं होगा।
हर पुरुष अपराधी नहीं है। हर पुरुष स्त्री विरोधी नहीं है। लाखों पुरुष ऐसे हैं जो महिलाओं की बराबरी, स्वतंत्रता और सुरक्षा के पक्ष में खड़े हैं।
लेकिन किसी विरोध प्रदर्शन का नारा समाजशास्त्र की पाठ्यपुस्तक नहीं होता।
वह अक्सर सामूहिक अनुभव का विस्फोट होता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं के हालिया प्रदर्शनों में यही दिखाई देता है। 17 वर्षीय लड़की के साथ आस्था कुंज पार्क में कथित गैंगरेप के बाद हुए प्रदर्शनों में छात्राओं ने सिर्फ उस घटना का विरोध नहीं किया, बल्कि खराब रोशनी, अपर्याप्त पुलिस गश्त, निगरानी की कमी और सार्वजनिक स्थानों पर असुरक्षा जैसे सवाल भी उठाए।
यही वजह है कि इन नारों को केवल “मर्द विरोधी” कहकर खारिज कर देना उस गुस्से के स्रोत को समझने से बच निकलना होगा।
आखिर गुस्सा किससे है?
शायद हर पुरुष से नहीं।
शायद उस अनुभव से है जिसमें एक लड़की को घर से निकलते समय कहा जाता है—
जल्दी लौटना।
अंधेरा होने से पहले आ जाना।
अकेले मत जाना।
कैब में बैठकर फोन करना।
लोकेशन भेज देना।
किसी अनजान आदमी से बात मत करना।
रात में बाहर मत रहना।
और फिर कभी कोई घटना हो जाए तो सवाल भी उसी से—
वह वहां गई क्यों थी?
इतनी रात को बाहर क्यों थी?
अकेली क्यों थी?
उसने कपड़े कैसे पहने थे?
उसने विरोध क्यों नहीं किया?
यहीं असली समस्या है।
सुरक्षा की जिम्मेदारी अपराधी से हटकर पीड़िता के व्यवहार पर क्यों चली जाती है?
दिल्ली के मौजूदा प्रदर्शनों में छात्राओं की एक बड़ी शिकायत यही रही है कि महिलाओं को सावधान रहने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है; सार्वजनिक स्थानों और संस्थानों को भी सुरक्षित बनाया जाना चाहिए।
आजादी का मतलब सिर्फ बाहर निकलने की अनुमति नहीं
महिला की आजादी का मतलब यह नहीं कि उसे घर से निकलने की इजाजत मिल गई।
आजादी का मतलब है कि वह सड़क पर चल सके और हर आदमी को संभावित खतरे की तरह देखने के लिए मजबूर न हो।
वह पार्क में बैठ सके।
बस में सफर कर सके।
कॉलेज से देर से लौट सके।
नौकरी से रात में घर आ सके।
दोस्त के साथ बाहर जा सके।
और इन सबके लिए उसे अपने अस्तित्व का हिसाब न देना पड़े।
आजादी भय की अनुपस्थिति का नाम भी है।
अगर किसी शहर में लड़की को हर कदम पर अपने बचाव की रणनीति बनानी पड़े तो सवाल सिर्फ लड़की की सावधानी का नहीं, शहर की व्यवस्था का भी है।
फिर “सारे मर्द” क्यों?
यहां पुरुषों की आपत्ति को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
किसी निर्दोष व्यक्ति को केवल उसके पुरुष होने के कारण अपराधी मानना न्यायसंगत नहीं है।
जो पुरुष महिलाओं की सुरक्षा और समानता के लिए खड़े हैं, उन्हें “अपराधी वर्ग” में डालना समस्या का समाधान नहीं है।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी समझना होगा कि विरोध का नारा अक्सर व्यक्ति विशेष के खिलाफ आरोपपत्र नहीं होता।
“मर्द जात हाय-हाय” सुनकर किसी अच्छे पुरुष को चोट लग सकती है।
लेकिन किसी महिला से यह पूछना भी जरूरी है कि उसे ऐसा नारा लगाने की जरूरत महसूस क्यों हुई?
क्योंकि अगर हम केवल शब्द सुनेंगे तो शायद हमें अपमान दिखाई देगा।
अगर हम उन शब्दों के पीछे का अनुभव सुनेंगे तो शायद हमें भय दिखाई देगा।
और भय से पैदा हुआ गुस्सा दिखाई देगा।
यह गुस्सा पुरुषों के खिलाफ नहीं, पितृसत्ता के खिलाफ भी पढ़ा जा सकता है
यहां एक महत्वपूर्ण फर्क है।
पुरुष और पुरुषवादी व्यवस्था एक ही चीज नहीं हैं।
पुरुष भी उस व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है और उसका विरोधी भी।
एक पिता अपनी बेटी को रोक सकता है और बेटा अपनी बहन के साथ खड़ा हो सकता है।
एक पुरुष अपराध कर सकता है और दूसरा पुरुष अपराध के खिलाफ सड़क पर उतर सकता है।
इसलिए असली लड़ाई “मर्द बनाम औरत” बनाना शायद समस्या को और सरल कर देना होगा।
लड़ाई उस मानसिकता से है जिसमें पुरुष की आजादी सामान्य और महिला की आजादी जोखिम मानी जाती है।
लड़ाई उस व्यवस्था से है जिसमें अपराध होने के बाद सुरक्षा बढ़ाने के बजाय पहले महिलाओं
की आवाजाही सीमित करने का रास्ता चुना जाता है।
आस्था कुंज की घटना के बाद भी सुरक्षा संबंधी चिंताएं सामने आईं—पार्क में रोशनी, गार्ड, निगरानी और पुलिस गश्त जैसे सवाल उठे।
“जब जुर्म की हद पार होगी, तब बगावत होगी”
शायद इन नारों को समझने की सबसे जरूरी कुंजी यही है।
हर विरोध सभ्य भाषा में नहीं होता।
हर पीड़ा साहित्यिक भाषा में नहीं बोलती।
कभी वह कविता बनती है।
कभी नारा।
कभी गाली के करीब पहुंच जाती है।
कभी हंसी में अपना गुस्सा छिपाती है।
“एक कचौरी, दो समोसा…” सुनकर कोई हंस सकता है।
लेकिन उस हंसी के पीछे एक गंभीर सवाल है—
कब तक? कब तक लड़की को ही बताया जाएगा कि कहां जाना है और कहां नहीं? कब तक उसे ही बताया जाएगा कि किस समय घर लौटना है?
कब तक सार्वजनिक जगहों की असुरक्षा का समाधान महिलाओं की आवाजाही सीमित करके किया जाएगा?
और कब समाज यह सवाल अपराधी से पूछेगा कि उसने किसी महिला की स्वतंत्रता को अपना अधिकार क्यों समझ लिया?
फिर भी एक सावधानी जरूरी है! गुस्सा जायज हो सकता है, लेकिन हर सामान्यीकरण न्यायपूर्ण नहीं होता। अगर हम बराबरी चाहते हैं तो सिद्धांत दोनों तरफ लागू होना चाहिए।
न पुरुष को उसके लिंग के कारण अपराधी मानना चाहिए, न महिला को उसके लिंग के कारण चरित्र के कटघरे में खड़ा करना चाहिए।
यही असली समानता है।
इसलिए इन नारों का जवाब “सारे मर्द ऐसे नहीं होते” भर नहीं है।
और न ही जवाब यह है कि “हर मर्द दोषी है।”
बेहतर सवाल है—
ऐसा समाज कैसे बने जिसमें किसी लड़की को ऐसा नारा लगाने की जरूरत ही न पड़े? क्योंकि अंततः लक्ष्य पुरुषों से नफरत करना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य यह होना चाहिए कि महिलाओं को पुरुषों से डरने की जरूरत न रहे।
और शायद तब—
“एक कचौरी, दो समोसा…”
जैसे नारे इतिहास का हिस्सा होंगे, वर्तमान की जरूरत नहीं।
आजादी नारा नहीं है।
आजादी वह स्थिति है जिसमें डर के बिना जीना संभव हो।
और जब किसी आधी आबादी को यह भरोसा नहीं मिलता, तो उसकी आवाज सड़क पर सुनाई देना असामान्य नहीं है।
असली सवाल यह है कि हम उस आवाज को सुनते हैं या सिर्फ उसके शब्दों से नाराज होते हैं।
