डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर का जीवन और संघर्ष

डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर का जीवन और संघर्ष

गुरमीत अंबाला

भारत में जब भी अन्धविश्वास विरोधी आंदोलन को याद किया जाएगा ,वह तब तक अधूरा रहेगा जब तक डा. नरेंद्र दाभोलकर का नाम उसमें दर्ज नहीं होगा।

एक लंबी परम्परा भारत में रूढ़ियों,अंधविश्वासों के विरुद्ध आवाज उठाने वालों की रही है,जिन्होंने समाज कल्याण के लिए अपना जीवन तक न्योछावर कर दिया।डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर भी ऐसे ही चमकते सितारे रहे हैं।

दाभोलकर का पालन पोषण और व्यक्तित्व निर्माण

डॉ. नरेंद्र दाभोलकर का जन्म 1 नवंबर 1945 को सतारा (महाराष्ट्र )में हुआ था। उनके पिता अच्युतराव सातारा के विख्यात वकील थे। नरेंद्र पिता के सबसे छोटे पुत्र हुए हैं उनके सभी भाई-बहन अपने-अपने क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले रहे हैं। एक भाई देवदत्त पुणे विश्वविद्यालय के कुलपति बने। दूसरे भाई दत्तप्रसाद महान वैज्ञानिक और साहित्यकार थे। एक भाई शेती दाभोलकर कृषि विशेषज्ञ थे, तासगांव के बीजरहित अंगूरों का संशोधन उन्हीं की खोज थी।

जब नरेंद्र दस साल के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया। उनकी शिक्षा सातारा के ‘न्यू इंग्लिश स्कूल’ में हुई।आगे की पढ़ाई के लिए नरेंद्र सांगली में अपने बड़े भाई के पास आ गए। मिरज के मेडिकल कॉलेज से उन्होंने एम.बी.बी.एस. (MBBS) की पढ़ाई पूरी की। बारह वर्षों तक वे डॉक्टरी के पेशे से जुड़े रहे ,लेकिन उनके मन में समाज की गरीबी उनका शक्तिशाली ताकतों द्वारा शोषण उद्वेलित करता रहता था।

साहित्य और खेलों के प्रति लगाव

पढ़ाई के दौरान उन्हें साहित्य पाठन ,मुख्यत: कविताएं बहुत अच्छी लगती थी, जिस कारण बहुत से प्रसिद्ध कवियों की कविताएं उन्हें कण्ठस्थ थी।

कबड्डी के लिए मिला छत्रपति पुरस्कार

साहित्य के साथ-साथ उन्हें खेलों का भी बहुत शौक था। सातारा के ‘शिवाजी उदय मंडल’ में वे खो-खो और कबड्डी खेलने जाते थे। बहुत सी प्रतियोगिताएं उन्होंने विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय पर जीत कर नाम कमाया ।उनके कबड्डी कौशल को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें ‘छत्रपति पुरस्कार’ से सम्मानित किया। सातारा जिले में दो छत्रपति पुरस्कार पाने वाले वे एकमात्र खिलाड़ी बने। इस खेल पर उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी है, जो कबड्डी पर लिखी गई पहली पुस्तक है। इस पुरस्कार का एक लाभ उन्हें यह हुआ कि कि पूरे महाराष्ट्र में ‘राज्य परिवहन बस यात्रा उनके लिए मुफ्त हो गई जिसका उपयोग बाद में उन्होंने अंधश्रद्धा निर्मूलन के कार्यों के फैलाव के लिए किया।साथ ही खेल भावना से अच्छे स्वास्थ्य को भी बना कर रख सके। रोजाना नियमित व्यायाम करने की आदत रखकर उन्होंने अंत तक अपना स्वास्थ्य बनाए रखा। साथ ही खेलों से खेल भावना (Sportsmanship) का निर्माण भी होता है। दृढ़ता, कठिन प्रयास, समय की पाबंदी, मन की एकाग्रता, हार को पचाने की तैयारी, सहनशीलता, शांति, भाईचारा और टीम भावना जैसे अनेक गुण खिलाड़ियों में विकसित हो जाते हैं। इन गुणों का लाभ नरेंद्र दाभोलकर को आगे के जीवन में मिला।
बारह वर्षों तक उन्होंने डॉक्टरी का पेशा किया, लेकिन उसमें उनका मन इस कार्य में नहीं लगा ।गरीबों और पीड़ितों के प्रति उनकी दया भावना उन्हें सामाजिक कार्य की ओर ले आई।

परिवारिक जीवन

डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर का विवाह शैलाताई से हुआ। शादी से पहले ही उन्होंने अपनी पत्नी के सामने समाज सेवा करने का अपना इरादा जाहिर कर दिया था। शैलाताई की भी सामाजिक कार्यों में रुचि थी। बच्चों का पालन-पोषण, पारिवारिक जिम्मेदारियां और डॉक्टरी के पेशे को संभालते हुए वे सीमित रूप से ही सही, लेकिन सामाजिक कार्यों में लगी रहीं पर डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर को उनके काम के लिए पूरा समय और सहयोग देना, यह उनका सबसे बड़ा योगदान था। उनके दो बच्चे हुए—हमीद और मुक्ता। वे दोनों भी बहुत काबिल निकले। पिता की हत्या के बाद उन्होंने अंधश्रद्धा निर्मूलन समिती के काम में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है । आज बहुत से कार्यक्रमों में हामिद दाभोलकर और डाक्टर मुक्ता दाभोलकर की उपस्थिति आम देखी जा सकती है।

सामाजिक कार्यों में सक्रियता

जैसा कि डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर अपने स्कूल और कॉलेज के समय से ही सामाजिक ,सहायक,खेल कूद में रुचि रखते थे । चिकित्सीय पेशे में आकर उनमें समाज में लगातार विचरने से समाज की विसंगतियों के प्रति उनकी संवेदनशीलता तेजी से बढ़ने लगी।

समाजवादी युवक दल एक ऐसा संगठन था जो विकास के पूंजीवादी मॉडल से उत्पन्न विसंगतियों के प्रति आवाज उठाता था।शिक्षित हुई युवा पीढ़ी महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक मंदी की लहरों से बेचैन होने लगी थी इसमे ‘समाजवादी युवक दल’ के कार्यों से डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर प्रभावित हुए और सातारा में ‘समाजवादी युवक दल’ का काम शुरू कर दिया।
‘एक गांव, एक पनघट’ (एक गाव एक पाणवठा) का आंदोलन बाबा आढाव के नेतृत्व में चल रहा था । वे इसमें शामिल हो गए,उन्होंने देखा कि संविधान ने सभी को समान अधिकार दिए हैं जिसमें समानता का अधिकार भी शामिल है, लेकिन गांवों में सारा व्यवहार विषमता के नियमों पर चलता था। उसी का एक हिस्सा यह था कि उच्च जातियों के पनघट (कुएं) से दलितों को पानी भरने का अधिकार नहीं था। वे उनके कुओं से पानी नहीं भर सकते थे। उनके पनघट अलग थे, कोई संकट आने पर भी वे परंपराओं को नहीं तोड़ सकते थे। इस अन्याय को दूर करने के लिए ‘एक गांव, एक पनघट’ आंदोलन शुरू हुआ था। सातारा में इस आंदोलन की जिम्मेदारी डॉ. दाभोलकर ने ली। हजारों साल पुरानी विषमता की खाई गहरी थी उच्च वर्णो के हाथों में केंद्रित सभी प्रकार की सत्ता थी । अनपढ़ता के कारण गांवों में होने वाली यह लड़ाई बहुत असमान थी, लेकिन फिर भी वह लड़ाई लड़ी गई और डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर इसमें अग्रणी रहे।

सतारा के महानुभाव पंथ के एक मठ में एक नाबालिग बच्ची की शादी भगवान (देवता) से कराने की कुप्रथा चल रही थी। इस प्रथा के खिलाफ अदालत में केस दर्ज कराकर डॉक्टर साहब ने सफलता हासिल की।

कांची कामकोटी के शंकराचार्य ने सतारा आकर जब वर्ण-वर्चस्व की अनिवार्यता की बात की। तब नरेंद्र दाभोलकर ने सतारा में उनके विरोध में एक विशाल जनसभा आयोजित की। इसी तरह अन्य सामाजिक संगठनों जैसे ‘छात्र भारती’ और ‘राष्ट्र सेवा दल’ में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई।

मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के नाम से करने का जब चला तो वे इस आंदोलन में भी सक्रियता से जुड़े रहे। जो ‘नामांतर आंदोलन’ के रूप में प्रसिद्ध है। उन्होंने सतारा से औरंगाबाद तक पैदल यात्रा (Long March)निकाला। रास्ते में जगह-जगह से कार्यकर्ता जुड़ते गए। इस लॉन्ग मार्च को अहमदनगर में रोककर पुलिस ने प्रमुख कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। पूरे राज्य में ऐसे कई लॉन्ग मार्च और सत्याग्रह हुए। उन्हे प्रचंड जनसमर्थन मिला। हजारों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। राज्य की सभी जेलें भर गईं। अंत में सत्याग्रहियों को खुले मैदानों और बड़े हॉलों में दिनभर रखना पड़ा।

ऐसे कई प्रसंगों से नरेंद्र दाभोलकर का व्यक्तित्व गढ़ा गया, जिसका उपयोग आगे चलकर अंधश्रद्धा निर्मूलन आंदोलन में हुआ।

अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति का गठन

अंधश्रद्धा निर्मूलन आंदोलन में डाक्टर अब्राहम थामस कोव्वुर की मृत्यु के बाद बी. प्रेमानंद देश ही नहीं विश्व में अंधविश्वास विरोधी आंदोलन का एक जाना पहचाना चेहरा बन चुके थे। देश,विदेश में उनके कार्य सुर्खियाँ बनते थे। बहुत से टी.वी. चैनलों ने उन पर डॉक्यूमेंट्री बनाई थी। चमत्कारों का पर्दाफाश उनका बेहद जागरूक करने वाला प्रसिद्ध कार्यक्रम होता था,वे देश भर में घुम घुम कर यह कार्यक्रम देते रहते थे। इसी सिलसिले में उनका महाराष्ट्र आगमन हुआ। वे ढोंगी बाबाओं द्वारा किए जाने वाले तथाकथित चमत्कारों को करके दिखाते थे और उनके पीछे की पोल खोलते थे। कोल्हापुर से नागपुर तक कई शहरों में उनके प्रदर्शन युक्त व्याख्यान हुए। इन व्याख्यानों से प्रेरित होकर कई स्थानों पर कार्यकर्ता एकजुट हुए। उन्होंने जन-जागरूकता के लिए समितियां और संस्थाएं बनाईं। कोल्हापुर में इस समय ‘विज्ञान प्रबोधिनी’ की स्थापना हुई, जिसने गांव-गांव जाकर प्रयोग दिखाए। इन सब से प्रभावित होकर 1981 में डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और उनके साथियों ने अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति बनाई। जिसे 1983 में पुनर्गठित करके ‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ की स्थापना की और महाराष्ट्र राज्य को अपना कार्यक्षेत्र बनाया।

भारत में जब भी अन्धविश्वास विरोधी आंदोलन को याद किया जाएगा ,वह तब तक अधूरा रहेगा जब तक डा. नरेंद्र दाभोलकर का नाम उसमें दर्ज नहीं होगा।
चमत्कारों का पर्दाफाश कार्यक्रम देते नरेंद्र दाभोलकर

अंधश्रद्धा निर्मूलन जैसे विषय पर कोई राज्यव्यापी संगठन खड़ा हो सकता है, ऐसा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था,लेकिन नरेंद्र दाभोलकर ने यह सब करके दिखाया। उन्होंने अन्य साथियों के सहयोग से पूरे महाराष्ट्र में इसकी शाखाएं खड़ी की साथ ही समाज के विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य लोगों को इस आंदोलन के साथ जोड़ा , जिसमें ग. बा. सरदार, नरहर कुरुंदकर, प्रो. डॉ. एन. डी. पाटिल, डॉ. श्रीराम लागू, सदाशिव अमरापुरकर, सोनाली कुलकर्णी प्रसिद्ध अभिनेता , वामपंथी और प्रगतिशील विचारक समिति से जुड़े।

उन्होंने सरकारी और अर्ध-सरकारी उच्च अधिकारियों, शिक्षाविदों, संस्थापकों, शिक्षकों, प्रोफेसरों, संपादकों और पत्रकारों जैसे विभिन्न क्षेत्रों के असंख्य लोगों को इस आंदोलन की मुख्यधारा में जोड़ा,जो विभिन्न कार्यक्रमों में उनके मंचों पर देखे जाते रहे हैं।

जब अंधश्रद्धा, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना आदि अतार्किक विषयों को सामने रखकर वे सक्रिय हुए तो समाज को अंधविश्वास, भाग्यवाद में फँसा कर लूटने वालों के निशाने पर आ गए, धमकियों को दरकिनार करते हुए, समाज के प्रति उत्तरदायित्व ने डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर को और मजबूत बना दिया। अपने लिए सुरक्षा इंतजाम कर लेने की तमाम हिदायतों को दर किनार करते हुए उन्होंने कहा—“अगर मैंने सुरक्षा ले ली, तो वे लोग मेरे साथियों पर हमला करेंगे, अगर मरना ही है तो फिर मैं ही सामने क्यूँ न रहूँ” इसी विचार को लेकर वे सक्रिय बने रहे ।
एक समय निर्मला देवी के भक्तों ने उन पर मिट्टी का तेल छिड़क कर उन्हें जिन्दा जलाने का प्रयास भी किया, परन्तु अपने मिशन के प्रति उनकी अडिगता बेमिसाल थी।

डॉ नरेंद्र दाभोलकर की शहादत

आखि़र वो दिन आया जब अंधश्रद्धा निर्मूलन में अपना जीवन लगाने वाले डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर धार्मिक कट्टर पंथियों की गोलियों का निशाना बने और 20अगस्त2013 को सदा के लिए इस जहां को अलविदा कर गए,परंतु समाज में वैज्ञानिक चेतना के प्रचार प्रसार में लगे लोगों के बीच वे सदा के लिए अमर हो गए।

लेखक – गुरमीत अंबाला

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