डॉ नरेंद्र दाभोलकर की शहादत

 20 अगस्त  शहादत दिवस पर विशेष

डॉ नरेंद्र दाभोलकर की शहादत

गुरमीत अंबाला

दिसंबर 2013 में अंधविश्वास विरोधी कानून को एक अध्यादेश के जरिए लागू करने की घोषणा कर दी, जिस के लिए पिछले अठारह वर्षों से नरेंद्र दाभोलकर संघर्ष कर रहे थे। वे अपने भाषणों में अक्सर कहा भी करते थे कि यह कानून उनकी मौत के बाद ही बनेगा।
डॉ नरेंद्र दाभोलकर अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति, साधना पत्रिका के संपादक

20 अगस्त 2013,दिन मंगलवार को पुणे,महाराष्ट्र में प्रात: सूर्य अपनी रश्मियां रोज की तरह बिखेर रहा था । पुणे के लोगों में आज अपार उत्साह था ,क्योंकि आज रक्षा बंधन और नारीळ पूर्णिमा का त्यौहार मनाया जा रहा था।

आलस से निकल कर लोग अपने दैनिक कार्यों के लिए तैयारी कर रहे थे,कुछ अपनी दिनचर्या के अनुसार प्रात: भ्रमण के लिए निकलने लगे थे।

महाराष्ट्र में वैज्ञानिक चेतना का परचम लहराने वाले डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर सोमवार की रात पुणे में ही रुके थे ,वे अपने वैज्ञानिक चेतना के कार्यों के लिए अक्सर महाराष्ट्र भर में घूमते ही रहते थे ।

“साधना” साप्ताहिक मराठी पत्रिका के संपादक होने के नाते सोमवार और मंगलवार को पुणे आ कर पत्रिका के कार्यों को पूर्ण करते थे । लगभग पचास साल से चलती इस लोकप्रिय साप्ताहिक के संपादन का दायित्व भी उनके पास था।

प्रात: अपनी दिनचर्या के अनुसार वे अपने अस्थाई निवास स्थान शनिवार पैठ से सवेरे सात बजे सैर के लिए निकलते हैं, जिस स्थान पर वह भ्रमण करते थे वह वही जगह थी।

जब सैर करते हुए वे मुला नाम से चर्चित बरसाती नदी पर बने वी.रा. शिंदे पुल पर से गुजर रहे थे,तभी मोटरसाइकिल पर दो व्यक्ति उनके निकट पहुंचते हैं, एक व्यक्ति उन पर रिवॉल्वर से गोली चलाता है,पीछे से अचानक सिर में गोली लगने से वे नीचे गिर पड़ते हैं। लेकिन हमलावर फिर भी गोली चला रहे होते हैं। कुल चार राउंड गोलियां चलती है जिसमें से तीन उन्हें लगती है और हमलावर अपना काम कर भाग खड़े होते हैं। पल भर में ही यह घटना घट जाती है। ये हत्यारे  घर से ही लगातार उनका पीछा कर रहे थे।

घटना स्थल से थोड़ी दूरी पर ही पुलिस स्टेशन था । पुलिस गोलियों की आवाज सुन कर जब पुल पर पहुंचती है तो सिर में गोली लगने से 68 वर्षीय नरेंद्र दाभोलकर की मृत्यु हो चुकी होती है।
आवागमन बढ़ने लगा था । पुलिस उन्हें पहचाने की कोशिश करने लगी लोग भी आस पास आ कर खड़े होने लगे थे। सवेरे सवा सात बजे गोली की वारदात हुई थी ।लगभग आठ बजे तक पहचान को लेकर पुलिस ने दाभोलकर के पहने कपड़ों से और जेब में मिले कागज से यह तो अंदाजा लगा लिया था कि ये प्रसिद्ध समाज सेवी नरेंद्र दाभोलकर हैं ।  भीड़ के लोग भी उन्हें पहचानने लगते हैं,लेकिन कोई भी पुष्टि नहीं करता फिर उनके पाए मिले कागज के आधार पर साधना पत्रिका के कार्यालय फोन किया तो फोन उठाने वाले व्यक्ति ने उन्हें दाभोलकर ही होने की पुष्टि कर दी।

तब तक दिन दिहाड़े गोली चलने की घटना की मीडिया को खबर लग चुकी थी और जल्दी ही पुणे महाराष्ट्र सहित देश भर में मीडिया और फोन के माध्यम से यह खबर फैल चुकी थी कि अन्धविश्वासों के विरुद्ध एक सशक्त आवाज सदा के लिए खामोश हो गई है।उन्हें इसी दौरान हस्पताल ले जाया गया ,परिवार को भी सूचित किया गया जो 110 किलोमीटर दूर सतारा में रहते थे।परिवार में एक पुत्र,एक पुत्री और पत्नी थे।

अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति और अन्य सामाजिक संस्थाओं के लोग इकट्ठे होने लगे थे। लोगों ने नारेबाजी शुरू कर दी और हत्यारों को पकड़ने की मांग करने लगे। इन पंक्तियों के लेखक को भी पुणे से महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के साथी मिलिंद देशमुख ने लगभग दस बजे जब ये खबर दी कि डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर नहीं रहे तो यकीन नहीं हुआ। फिर धीरे धीरे हरियाणा पंजाब के तर्कशील साथियों के बीच खबर फैलने से गमगीन माहौल बन गया,क्योंकि नरेंद्र दाभोलकर महाराष्ट्र ही नहीं अन्य राज्यों के विज्ञान चिंतको के बीच भी लोकप्रिय थे। प्रगतिशील लोगों में यह खबर सदमा पैदा करने वाली थी।

अस्पताल से पोस्टमार्टम के उपरांत नरेंद्र दाभोलकर के मृतक शरीर को अनिस( महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिती)के साथियों और परिवार को लगभग 11 बजे सौंप दिया गया। मृतक शरीर को लोगों के दर्शन के लिए साधना पत्रिका के कार्यालय लाया गया ,लोग गमगीन होने के साथ ही आक्रोश से भरे हुए थे,वे लगातार नारे लगा रहे थे कि हत्यारों को गिरफ्तार करो। कुछ समय साधना पत्रिका के कार्यालय में नरेंद्र दाभोलकर के शव को रखा गया,जहां लोगों ने उन्हें नम आंखों से आदरांजलि दी।शाम होते होते नरेंद्र दाभोलकर के सतारा स्थित निवास स्थान पर भी हजारों की भीड़ लग चुकी थी राजनीति पार्टियों,सामाजिक संस्थाओं से जुड़े लोग कलाकार,लेखक, बुद्धिजीवी अपने प्रिय नरेंद्र दाभोलकर के प्रति सम्मान प्रकट करने पहुंच रहे थे।

देर शाम उनके पार्थिव शरीर की बिना किसी धार्मिक कर्मकांड के पुत्र द्वारा अग्नि देने की परम्परा के विपरीत उनकी पुत्री डाक्टर मुक्ता दाभोलकर ने अग्नि को भेंट कर उसका निष्पादन कर दिया। नम आंखों से और आक्रोश से भरे जन समुदाय ने उन्हें अंतिम विदाई दी।उन्होंने अपने जीते जी मृतक शरीर को मेडिकल कॉलेज को सौंपने की शपथ ली हुई थी,लेकिन पुलिस केस बनने और पोस्टमार्टम होने के कारण यह संभव नहीं हो सका ।
भारी आक्रोश से भरे लोग अगले दिन से ही वी.रा. शिंदे पुल पर पहुंचे जहां एक लंबे धरने/प्रदर्शन की शुरुआत हो गई लोग उनके हत्यारों को गिरफ्तार करने और जिस अंधविश्वास विरोधी कानून को लागू करने के लिए उन्होंने संघर्ष किया और जिस के लिए वे शहीद हो गए, उसे लागू करने की मांग करने लगे।

सात महीने तक चलता रहा धरना-प्रदर्शन

सात महीने लगातार उस पुल पर यह धरना ,प्रदर्शन चलता रहा। देश भर में अन्य वैज्ञानिक चेतना के प्रचार प्रसार में लगे संगठन भी हत्यारों को गिरफ्तार करने की मांग करने लगे,प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह मुद्दा लगातार गरमाने लगा, आखिर सरकार ने उनकी हत्या की जांच सी. बी. आई. को सौंप दी और दिसंबर 2013 में अंधविश्वास विरोधी कानून को एक अध्यादेश के जरिए लागू करने की घोषणा कर दी, जिस के लिए पिछले अठारह वर्षों से नरेंद्र दाभोलकर संघर्ष कर रहे थे। वे अपने भाषणों में अक्सर कहा भी करते थे कि यह कानून उनकी मौत के बाद ही बनेगा। इस अध्यादेश को बाद में विधान सभा और विधान परिषद से भी पास कर सरकार ने महाराष्ट्र राज्य में इस कानून को लागू कर दिया था। साथ ही डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर के अप्रतिम योगदान को देखते हुए उन्हें पद्म श्री से मृत्युपरांत सम्मानित भी किया गया।

पांच लोगों की गिरफ्तारी

सी. बी. आई. ने खोज पड़ताल करते हुए पांच लोगों को डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार किया,जिसमें से दो को उम्र कैद हुई तीन लोग सबूतों के अभाव में बरी हो गये थे। खोज पड़ताल में यह पाया गया कि हत्यारे एक कट्टर धार्मिक संगठन से जुड़े थे।

वैज्ञानिक चेतना के उनके परचम को सदा लहराता रहेगा

दिसंबर 2013 में अंधविश्वास विरोधी कानून को एक अध्यादेश के जरिए लागू करने की घोषणा कर दी, जिस के लिए पिछले अठारह वर्षों से नरेंद्र दाभोलकर संघर्ष कर रहे थे। वे अपने भाषणों में अक्सर कहा भी करते थे कि यह कानून उनकी मौत के बाद ही बनेगा।
लोग रा. वि. शिंदे पुल पर हर वर्ष एकत्र होकर डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर को 20 अगस्त को याद करते हैं।
इसी पुल पर एकत्र लोगों की एक पुरानी तस्वीर जिसमें प्रसिद्ध अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, अमोल पालेकर, अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी सहित वरिष्ठ समाजवादी नेता भाई वैद्य, हमीद दाभोलकर आदि शामिल हुए थे

नरेंद्र दाभोलकर सदा के लिए चले गए, लेकिन अपने पीछे एक लंबा काफिला छोड़ गए,जो वैज्ञानिक चेतना के उनके परचम को सदा लहराता रहेगा। हर वर्ष 20अगस्त को उनकी याद में वैज्ञानिक चिंतन के प्रचार प्रसार में लगे संगठन विभिन्न कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें आदरांजलि भेंट करते हैं। रा.वि. शिंदे पुल पर 20 अगस्त को लोग पिछले 13 सालों से एकत्र होकर उन्हें हर साल अभिवादन करते हैं,उनके कार्यों को नतमस्तक होते हैं।

वैज्ञानिक चेतना के प्रहरियों के बीच डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर सदा अमर रहेंगे और विचार के लिए लड़ने,मरने की प्रेरणा देते रहेंगे।

 

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