डॉ. रीटा अरोड़ा की कविता – रस्मों से परे उसका आसमान

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

कविता

रस्मों से परे उसका आसमान

डॉ रीटा अरोड़ा

जब बेटे की किलकारी से घर का आँगन मुस्काता है,
हर चेहरा खिल उठता है, हर सपना जगमगाता है।
‘वंश का दीपक’ कहकर उसको माथे पर सजाया जाता,
जन्म के साथ ही जैसे भाग्य का ताज पहनाया जाता।

उसकी लंबी उम्र की खातिर कितने व्रत रखे जाते हैं,
चाँद, सितारे, देवी-देवता सब मनाए जाते हैं।
कभी करवाचौथ की छलनी में चाँद निहारा जाता है,
कभी अहोई के धागों में जीवन सँवारा जाता है।

सिंदूर, बिंदी, मंगलसूत्र उसकी सलामती गाते हैं,
चूड़ी, बिछिया, मेहंदी भी उसकी उम्र बढ़ाते हैं।
हर लाल रंग में जैसे पुरुष की साँस सँजोई जाती है,
हर रस्म में उसकी लंबी उम्र की आस पिरोई जाती है।

और जब बेटी जन्मे तो कुछ स्वर धीमे पड़ जाते हैं,
खुशियों के बीच न जाने कितने प्रश्न खड़े हो जाते हैं।
आने से पहले ही उसके हिस्से अंदेशे लिखे जाते,
जन्म के बाद ‘पराया धन’ कहकर सपने बाँटे जाते।

उसकी हँसी पर पहरे हैं, उसकी बोली पर दीवारें,
हर मोड़ पर समझाती रहतीं दुनिया की रस्में सारी।
कितना बोलो, कितना हँसो – सीमाएँ समझाई जाती हैं,
पंख तो दे दिए जाते हैं, पर राहें बतलाई जाती हैं।

पर कभी किसी ने सोचा – उसके जीवन की क्या आस?
कौन-सा व्रत माँगता है उसके लिए लंबी साँस?
उसकी सलामती के नाम कौन-सा दीप जलाया जाता?
कौन-सा धागा उसकी उम्र से हर बरस बँधाया जाता?

शायद कोई रस्म नहीं जो उसकी साँसें माँग सके,
कोई तावीज़ नहीं जो उसके जीवन को थाम सके।
फिर भी हर तूफ़ान से वह अपना रास्ता बनाती है,
टूटे हुए सपनों से फिर नया जहाँ सजाती है।

काँच बिछे हों राहों में तो उन पर भी चल जाती है,
आँखों में आँसू हों फिर भी दुनिया को हँसाती है।
हर ठोकर को सीढ़ी करके ऊँचाइयों तक जाती है,
राख बची हो मुट्ठी भर तो उससे लौ बनाती है।

उसे किसी लाल धागे की जीने को दरकार नहीं,
उसके भीतर जो साहस है, उसका कोई पार नहीं।
हौसले की अदृश्य डोरी हर पल उसे उठाती है,
सब कुछ खोकर भी जीने की वजह नई दे जाती है।

दुनिया चाहे बार-बार उसे कमज़ोर बताती रहे,
अपने ही तराज़ू में उसकी कीमत घटाती रहे।
वह हर चोट को गहना कर फिर खुद को सँवार लेती है,
ज़िंदगी जितना झुकाती है, उतना ही निखार लेती है।

वो केवल रिश्तों, रस्मों, नामों की पहचान नहीं,
उसके अपने सपने भी हैं – वो कोई सामान नहीं।
जिस दिन अपने वजूद का अर्थ स्वयं पहचान लेती है,
उस दिन औरत जीती ही नहीं – इतिहास बना देती है।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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