नगीना के बहाने दलित राजनीति के वर्चस्व की लड़ाई

राजनीति- उत्तर प्रदेश

नगीना के बहाने दलित राजनीति के वर्चस्व की लड़ाई

ओमप्रकाश तिवारी

क्या नगीना में 2024 का चुनाव सिर्फ एक लोकसभा चुनाव था? या फिर उस चुनाव में उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति के भीतर चल रहे एक बड़े बदलाव की झलक दिखाई दी? क्योंकि जिस चुनाव में चार दशक से उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा रही मायावती की बहुजन समाज पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, उसी चुनाव में चंद्रशेखर आजाद नगीना से भारी अंतर से जीतकर संसद पहुंच गए। और अब दो साल बाद मायावती ने उसी नगीना की जीत को लेकर ईवीएम पर सवाल खड़ा कर दिया है।

मायावती का आरोप है कि भाजपा ने कथित तौर पर ईवीएम में धांधली करके चंद्रशेखर आजाद को नगीना से जिताया, ताकि बसपा को नुकसान पहुंचाया जा सके। उन्होंने चुनाव बैलेट पेपर से कराने की मांग भी की है। चंद्रशेखर आजाद ने इसका जवाब दिया है और नगीना की जनता के जनादेश का बचाव किया है। तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ईवीएम सही है या गलत। बड़ा सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में नेतृत्व और वर्चस्व का केंद्र बदल रहा है क्या? और अगर बदल रहा है, तो इसका सबसे बड़ा संकेत नगीना से मिला है क्या?

2024 का चुनाव: एक तरफ बसपा, दूसरी तरफ नगीना

पहले आंकड़ों को समझिए। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ा। पार्टी को 9.39 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली। यह बसपा के लिए सामान्य हार नहीं थी। 2019 में सपा के साथ गठबंधन करके बसपा ने उत्तर प्रदेश में 10 लोकसभा सीटें जीती थीं और उसका वोट शेयर करीब 19.42 प्रतिशत था। 2024 में वोट शेयर आधे से भी कम होकर 9.39 प्रतिशत रह गया और सीटें—शून्य।

अब दूसरी तरफ नगीना को देखिए। नगीना अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित लोकसभा क्षेत्र है। 2024 में यहां आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद को 5 लाख 12 हजार 552 वोट मिले।भाजपा के ओम कुमार को 3 लाख 61 हजार 79 वोट मिले। चंद्रशेखर की जीत का अंतर था—1 लाख 51 हजार 473 वोट। समाजवादी पार्टी के मनोज कुमार को 1 लाख 2 हजार 374 वोट मिले। और बसपा के उम्मीदवार सुरेंद्र पाल सिंह को सिर्फ 13 हजार 272 वोट। यानी नगीना में बसपा चौथे स्थान पर रही।

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2019 में इसी सीट से बसपा के गिरिश चंद्र ने करीब 5 लाख 68 हजार वोट लेकर जीत दर्ज की थी। पांच साल बाद उसी सीट पर बसपा करीब 13 हजार वोट तक सिमट गई और एक नई राजनीतिक ताकत ने 5 लाख से ज्यादा वोट हासिल कर लिए। यहीं से कहानी बदलती दिखाई देती है।

नगीना क्यों महत्वपूर्ण है?

नगीना को केवल एक सुरक्षित लोकसभा सीट समझना इस पूरे घटनाक्रम को छोटा करके देखना होगा। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश का क्षेत्र है। यहां दलित और मुस्लिम आबादी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। 2024 के चुनाव में चंद्रशेखर को जिस तरह का समर्थन मिला, उसने उन्हें केवल एक सांसद नहीं बनाया, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक उभरते हुए दलित राजनीतिक चेहरे के रूप में स्थापित किया। चंद्रशेखर इससे पहले भी दलित आंदोलनों के कारण चर्चा में रहे थे। उन्होंने 2015 में भीम आर्मी बनाई और बाद में 2020 में आजाद समाज पार्टी बनाई। लेकिन 2024 से पहले उनकी पार्टी की लोकसभा में कोई सीट नहीं थी। नगीना ने उन्हें संसद पहुंचा दिया। और इसलिए नगीना की जीत का राजनीतिक अर्थ सिर्फ इतना नहीं है कि एक उम्मीदवार जीत गया। इसका अर्थ यह भी है कि मायावती के राजनीतिक प्रभाव के समानांतर एक नया दलित राजनीतिक चेहरा संसद में पहुंचा।

मायावती की राजनीति का ऐतिहासिक महत्व

अब यहां थोड़ा पीछे जाना जरूरी है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांशीराम और मायावती ने दलित राजनीति को सिर्फ सामाजिक आंदोलन के रूप में नहीं छोड़ा। उन्होंने उसे चुनावी शक्ति में बदला। बहुजन समाज पार्टी ने दलितों को एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान देने की कोशिश की। मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। उनका राजनीतिक आधार खास तौर पर जाटव दलित मतदाताओं के बीच मजबूत माना जाता रहा।लेकिन बसपा की राजनीति सिर्फ दलितों तक सीमित नहीं रही। कभी दलित-ब्राह्मण सामाजिक इंजीनियरिंग, कभी दलित-पिछड़ा समीकरण और कभी दूसरे सामाजिक समूहों को साथ लाने की रणनीति के जरिए बसपा ने उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल की। 2007 का चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। लेकिन उसके बाद पार्टी के चुनावी प्रदर्शन में लगातार गिरावट आई। 2012 में बसपा सत्ता से बाहर हुई। 2014 में लोकसभा में एक भी सीट नहीं मिली। 2019 में सपा के साथ गठबंधन करके पार्टी ने 10 सीटें जीतीं। और 2024 में फिर शून्य। यानी नगीना को समझने के लिए बसपा के इस लंबे उतार को भी समझना होगा।

2024 में क्या बदला?

2024 का चुनाव बसपा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मायावती ने किसी बड़े गठबंधन का हिस्सा बनने के बजाय अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 79 सीटों पर चुनाव लड़ा।लेकिन सीट एक भी नहीं मिली। वोट मिले करीब 9.39 प्रतिशत। इसका अर्थ यह नहीं कि बसपा समाप्त हो गई। क्योंकि 9.39 प्रतिशत वोट अभी भी एक बड़ा वोट आधार है। लेकिन सवाल यह जरूर पैदा हुआ कि वह वोट सीट में क्यों नहीं बदल पा रहा है? और इससे भी बड़ा सवाल— क्या बसपा का पारंपरिक दलित वोट बैंक उसके साथ उसी तरह बना हुआ है, जैसा पहले था? यहीं पर चंद्रशेखर आजाद का उभार महत्वपूर्ण हो जाता है।

चंद्रशेखर का उभार क्या बताता है?

चंद्रशेखर की राजनीति मायावती से अलग शैली की है। उनकी राजनीति का एक बड़ा हिस्सा आंदोलनकारी राजनीति से आया है। भीम आर्मी के जरिए वह दलित अधिकारों के मुद्दों पर सड़क पर दिखाई दिए।फिर उन्होंने चुनावी राजनीति का रास्ता चुना। 2024 में नगीना ने उन्हें संसद तक पहुंचा दिया। और जीत भी मामूली नहीं थी। 5 लाख 12 हजार वोट। 51 प्रतिशत से ज्यादा वोट। और भाजपा उम्मीदवार पर 1.51 लाख से ज्यादा की बढ़त। यह आंकड़ा किसी सामान्य त्रिकोणीय मुकाबले की मामूली जीत नहीं थी। यही कारण है कि चुनाव के बाद कई विश्लेषणों में चंद्रशेखर को उत्तर प्रदेश में उभरते हुए दलित चेहरे के रूप में देखा गया। लेकिन यहां एक सावधानी भी जरूरी है।

एक लोकसभा सीट जीतना अपने आप में पूरे उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति का नेतृत्व हासिल कर लेना नहीं है। उत्तर प्रदेश बहुत बड़ा राज्य है। बसपा का वोट आधार अभी भी चंद्रशेखर की पार्टी से बहुत बड़ा है। इसलिए नगीना को बदलाव का संकेत कहा जा सकता है, लेकिन इसे अंतिम राजनीतिक बदलाव का प्रमाण कहना जल्दबाजी होगी।

अब आया मायावती का नया हमला

और यहीं 28 सितंबर 2026 का मायावती का बयान इस पूरी कहानी को नया मोड़ देता है। मायावती ने कहा कि भाजपा ने ईवीएम में धांधली कर चंद्रशेखर आजाद को नगीना से चुनाव जिताया। उन्होंने यह भी कहा कि नगीना में चंद्रशेखर का पर्याप्त जनाधार नहीं था। मायावती ने ईवीएम बंद करके बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि निशाना केवल ईवीएम पर नहीं है। निशाना सीधे नगीना के उस परिणाम पर है जिसने चंद्रशेखर को संसद पहुंचाया। मायावती के राजनीतिक तर्क को अगर उनके शब्दों में समझें तो सवाल है— अगर चंद्रशेखर की नगीना जीत को भाजपा और ईवीएम की कथित भूमिका से जोड़ दिया जाए, तो उस जीत की राजनीतिक वैधता पर सवाल खड़ा हो जाता है। लेकिन यहां दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। चुनाव परिणाम के आधिकारिक आंकड़ों में चंद्रशेखर को 5 लाख 12 हजार 552 वोट मिले और जीत का अंतर 1 लाख 51 हजार 473 रहा। ईवीएम में धांधली के आरोप को साबित करने वाला कोई स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध रिपोर्टों में सामने नहीं आया है। इसलिए पत्रकारिता की दृष्टि से मायावती के आरोप को आरोप के रूप में ही रखना होगा, प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं।

चंद्रशेखर का जवाब

चंद्रशेखर आजाद ने मायावती के बयान का जवाब दिया। उनकी राजनीति का मूल तर्क यह है कि नगीना की जनता ने उन्हें वोट दिया। और यहां एक दिलचस्प बात है। चंद्रशेखर खुद भी चुनाव प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते रहे हैं और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग का समर्थन कर चुके हैं। इसलिए ईवीएम के मुद्दे पर दोनों के बीच एक समानता दिखाई देती है। दोनों बैलेट पेपर की बात कर रहे हैं। लेकिन अंतर यह है कि मायावती नगीना के 2024 के परिणाम को ही सवालों के घेरे में रख रही हैं, जबकि चंद्रशेखर उसी परिणाम को जनता का जनादेश बता रहे हैं। यही असली राजनीतिक टकराव है।

अब आता है ‘भाजपा की बी-टीम’ वाला आरोप

इस पूरे विवाद में एक और आरोप बार-बार सामने आता है। मायावती और बसपा पर उनके राजनीतिक विरोधी लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि वह भाजपा की ‘बी-टीम’ की तरह काम करती हैं। 2024 के चुनाव से पहले भी समाजवादी पार्टी और बसपा एक-दूसरे पर भाजपा की ‘बी-टीम’ होने के आरोप लगा रहे थे। बसपा उस समय न तो भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में थी और न ही विपक्षी इंडिया गठबंधन में। मायावती ने खुद को दोनों से अलग रखा था। 2024 के चुनाव परिणाम के बाद इस आरोप को नए सिरे से राजनीतिक बहस में इस्तेमाल किया गया। कुछ विश्लेषणों में यह तर्क दिया गया कि बसपा के 9.39 प्रतिशत वोट ने कई सीटों पर विपक्षी उम्मीदवारों को नुकसान पहुंचाया और कुछ सीटों पर बसपा को मिले वोट जीत के अंतर से ज्यादा थे। लेकिन यहां भी तथ्य और राजनीतिक व्याख्या को अलग रखना जरूरी है। बसपा ने भाजपा के साथ औपचारिक गठबंधन नहीं किया था। इसलिए ‘बी-टीम’ कहना एक राजनीतिक आरोप है, स्थापित तथ्य नहीं।

लेकिन सवाल उठता है-फिर यह आरोप इतना प्रभावी क्यों है? क्योंकि राजनीति में केवल गठबंधन ही मायने नहीं रखता। विपक्षी दल यह भी देखते हैं कि किसी पार्टी की चुनावी रणनीति से किसे फायदा और किसे नुकसान हुआ। 2024 में बसपा का वोट शेयर 9.39 प्रतिशत था, लेकिन सीटें शून्य। दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ काफी बेहतर प्रदर्शन किया। इसलिए बसपा की स्वतंत्र लड़ाई को लेकर यह बहस हुई कि उसका वोट विभाजन किसके लिए फायदेमंद रहा। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। मायावती का तर्क है कि बसपा किसी दूसरी पार्टी के वोट बैंक के लिए नहीं बनी है। वह अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के साथ चुनाव लड़ती है। इसलिए बसपा के लिए किसी गठबंधन में जाना भी अपने आप में राजनीतिक जोखिम है। यानी ‘बी-टीम’ की बहस को समझने के लिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि किसे फायदा हुआ। यह भी देखना होगा कि बसपा स्वयं अपनी राजनीति को किस रूप में परिभाषित करती है।

असली टकराव: मायावती बनाम चंद्रशेखर?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी। चंद्रशेखर आजाद ने मायावती की जगह पूरी तरह नहीं ले ली है। ऐसा कहना आंकड़ों से साबित नहीं होता। लेकिन उन्होंने एक वैकल्पिक दलित राजनीतिक आवाज जरूर खड़ी कर दी है। यही मायावती के लिए राजनीतिक चुनौती का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। क्योंकि बसपा की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत लंबे समय तक यह रही कि दलित समाज के भीतर उसके सामने कोई मजबूत स्वतंत्र चुनावी विकल्प नहीं था। अब नगीना ने दिखाया है कि एक नया दलित नेता चुनाव जीत सकता है। और वह भी उस समय, जब बसपा का उम्मीदवार उसी सीट पर चौथे स्थान पर चला गया। यानी मुकाबला सिर्फ वोटों का नहीं है। मुकाबला राजनीतिक प्रतिनिधित्व की भाषा का भी है।

मायावती की चुनौती क्या है?

मायावती के सामने अब दोहरी चुनौती है। पहली—बसपा का पारंपरिक वोट आधार बनाए रखना। दूसरी—नई पीढ़ी के दलित मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखना। चंद्रशेखर की राजनीति युवा और आंदोलनकारी शैली के साथ सामने आती है। मायावती का राजनीतिक अनुभव और संगठनात्मक इतिहास बहुत बड़ा है। इसलिए दोनों की राजनीतिक शैली अलग है। एक तरफ सत्ता का लंबा अनुभव है। दूसरी तरफ आंदोलन से निकला नया नेतृत्व है। नगीना इन दोनों धाराओं की सीधी भिड़ंत का सबसे स्पष्ट उदाहरण बन गया है।

2027 की तरफ देखिए

अब इस पूरे विवाद को 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से अलग करके नहीं देखा जा सकता। मायावती ने अपना बयान 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दिया है। चंद्रशेखर आजाद भी अब सिर्फ आंदोलनकारी नेता नहीं हैं। वह लोकसभा सांसद हैं। उनके पास संसद का मंच है। उनकी पार्टी के पास एक लोकसभा सीट है। और नगीना का परिणाम उनके लिए राजनीतिक पूंजी है। दूसरी तरफ बसपा के पास अभी भी पूरे उत्तर प्रदेश में संगठन, पुराना वोट आधार और मायावती की स्थापित पहचान है। इसलिए 2027 में सवाल यह नहीं होगा कि कौन तुरंत मायावती की जगह ले चुका है। सवाल यह होगा कि क्या चंद्रशेखर उस राजनीतिक स्थान को लगातार विस्तार दे पाते हैं, जो नगीना ने उन्हें दिया है? और दूसरी तरफ— क्या मायावती बसपा के पुराने सामाजिक आधार को फिर से मजबूत कर पाती हैं? इन दोनों सवालों का जवाब 2027 के चुनावी मैदान में मिलेगा।

नगीना का सबसे बड़ा संदेश

अब वापस नगीना पर आइए। 2019 में बसपा ने यहां जीत दर्ज की। 2024 में उसी सीट पर बसपा चौथे स्थान पर चली गई। चंद्रशेखर आजाद 51 प्रतिशत से अधिक वोट लेकर जीत गए। यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उत्तर प्रदेश की पूरी दलित राजनीति चंद्रशेखर के साथ चली गई। और न ही यह साबित होता है कि बसपा का राजनीतिक आधार समाप्त हो गया। जो साबित होता है, वह यह है कि दलित राजनीति में प्रतिस्पर्धा का एक नया केंद्र सामने आया है। और अब मायावती स्वयं उस नए केंद्र को चुनौती दे रही हैं। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक अर्थ है।

अंतिम सवाल

तो नगीना की कहानी को सिर्फ इस सवाल तक सीमित करना कि— ईवीएम सही थी या गलत? शायद इस पूरे घटनाक्रम को छोटा करके देखना होगा। बड़ा सवाल है— 2024 में बसपा का शून्य और चंद्रशेखर की जीत क्या दलित राजनीति के बदलते सामाजिक-राजनीतिक समीकरण का संकेत है? क्या चंद्रशेखर आजाद सिर्फ नगीना के सांसद हैं? या वह उत्तर प्रदेश में मायावती के सामने एक नए दलित राजनीतिक नेतृत्व का दावा पेश कर रहे हैं? और दूसरी तरफ— क्या मायावती का ईवीएम वाला आरोप सिर्फ चुनाव प्रक्रिया पर सवाल है? या इसके पीछे नगीना के उस राजनीतिक परिणाम को चुनौती देने की कोशिश भी है, जिसने चंद्रशेखर को दलित राजनीति में एक नया स्थान दिया? और ‘भाजपा की बी-टीम’ का आरोप? वह भी फिलहाल राजनीतिक आरोप ही है। उसे तथ्य मान लेना उतना ही गलत होगा, जितना किसी चुनाव परिणाम पर बिना प्रमाण के ईवीएम धांधली को तथ्य मान लेना।

इसलिए नगीना का दूसरा पक्ष यही है— यह लड़ाई सिर्फ ईवीएम की नहीं। यह सिर्फ मायावती और चंद्रशेखर की नहीं। यह उस सवाल की लड़ाई है कि उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति का अगला राजनीतिक केंद्र कहां बनेगा। मायावती के पास इतिहास है, संगठन है और एक बड़ा राजनीतिक अनुभव है। चंद्रशेखर के पास नगीना का जनादेश है, आंदोलन की पृष्ठभूमि है और नई राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश है। अब देखना यह है कि 2027 तक यह मुकाबला कितना आगे जाता है। क्योंकि नगीना में जो हुआ, वह सिर्फ एक चुनाव परिणाम नहीं था। वह उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति के बदलते हुए परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर था।

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One thought on “नगीना के बहाने दलित राजनीति के वर्चस्व की लड़ाई”

  1. बहुत शानदार विश्लेषण।
    दलित की बात हो गई। अब पश्चिम उत्तर प्रदेश में मुस्लिम के दो चेहरे हैं। कांग्रेस से इमरान मसूद। सपा से इकरा हसन। इकरा हसन इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि जिस कैराना के मुद्दे को भाजपा के माध्यम से देश दुनिया में चर्चा मिली। भाजपा वहीं हार गई। इस पर भी एक विश्लेषणात्मक स्टोरी आपसे अपेक्षित है।

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