राजकुमार कुम्भज की कविता – जाग रहे हैं जॅंगल में फूल

 कविता

जाग रहे हैं जॅंगल में फूल

राजकुमार कुम्भज

 

प्रदर्शनकारी हैं,पुलिस है,चारों ओर

पुलिसकर्मी फेंक रहे हैं पत्थर

प्रदर्शनकारियों पर

सिर फूट रहे हैं प्रदर्शनकारियों के,नारों के

पुलिसकर्मियों के हाथों में हो रहा है तीखा दर्द

अपने ही लोगों में,अपने ही लोगों द्वारा,शासन है अपने ही लोगों का

तबला और झाॅंझ और ताशे और… और…

मॅंज़ीरे जैसे कुछ वाद्य-यंत्र संसद में

धम्म-धमाके से बज रहे हैं करते हुए करतल

गर्म है,लाल है ख़ून,उबल रहा है,बह रहा है सड़कों पर

रोटी और क़िताब का साधारण-सा सवाल लिए जागता हूॅं मैं

पर्दे की तरह काॅंप रहा है डर,काॅंप रहा है दर्पण

प्रधानमंत्री लहरा रहे हैं अपना तीस बरस पुराना मफ़लर

रोगग्रस्त हैं खटमल-परिवार की समस्त प्रजातियाॅं

पाॅंचजन्य है कि फुस्स,भरा है ढ़ेर सारा भूसा

नस-नस में कौंध रही है नफ़रत की बारूद

तनी हैं सॅंगीनें,तनी गरदनों पर,ज़रा नहीं छुप-छुप

आओ गाऍं राष्ट्रवाद का मॅंगलगान,दोहराऍं मेरे नगपति-मेरे विशाल

झाॅंक रही हैं,क़ब्र से झाॅंक रही हैं हिटलर की हड्डियाॅं

खाट खड़ी है,खड़ी रहे लोकतंत्र की प्राचीन देश में

असफल हो रही हैं प्रार्थनाऍं-विवेचनाऍं तमाम

पवित्र स्मृतियाॅं और सॅंस्कृतियाॅं अब मिलेंगीं कहाॅं

मैं सोचता हूॅं और तलाशता हूॅं ऑंखों में पानी

बचा हो थोड़ा-सा भी कहीं बचा हो,तो बचाना मुझे

मैं मर रहा हूॅं अपनी ही उलझनों से उलझते हुए

मौसम है बारिश का,घरों में क़ैद हैं चिंगारियाॅं

स्त्रियाॅं गूॅंथ रही हैं आटे में आग जैसा कुछ

कवि बुन रहे हैं,सुना रहे हैं सूने में कविताऍं

कम-कम है धूप फिर भी चमक रहा है विचार

जाग रहे हैं जॅंगल में फूल.

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