कुरुक्षेत्र में जलेस हरियाणा की राज्य स्तरीय कविता कार्यशाला, 50 कवियों ने लिया हिस्सा
आलोचक प्रेम तिवारी ने कहा- संघर्षों के बीच उपजती है कविता
जनवादी लेखक संघ हरियाणा द्वारा रविवार को राज्य स्तरीय कविता कार्यशाला का आयोजन डॉ ओमप्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान कुरुक्षेत्र में किया गया । इस कार्यशाला में लगभग 50 कवियों ने सहभागिता की । प्रथम सत्र में उपस्थित सभी रचनाकारों ने अपनी एक-एक कविता का पाठ किया और दूसरे सत्र में आमंत्रित विद्वान वक्ताओं ने इन कविताओं पर अपनी रचनात्मक टिप्पणियां प्रस्तुत की ।

टिप्पणीकारों में केंद्रीय जनवादी लेखक संघ के संयुक्त महासचिव आलोचक प्रेम तिवारी , कवि/समीक्षक/पत्रकार ‘राधे श्याम तिवारी’, कवि एवं पत्रकार श्याम सुशील और चर्चित कथाकार गजेंद्र रावत थे । मुख्य वक्ता के तौर पर प्रोफेसर प्रेम तिवारी ने कविता की रचना प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि कविता व्यक्ति के जीवन संघर्षों में ही जन्म लेती है। कविता को सायास नहीं लिखा जा सकता ।

अपनी बोली में लिखना जरूरी
जनवादी कविता का संबंध जमीनी जीवन संघर्षों से होता है जिसमें वंचित/अपमानित/ प्रताड़ित/समाज के हिस्स की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी जाती है और समाज में गैर- बराबरी/ शोषण/ जातीय उत्पीड़न सांप्रदायिकता/ दमन / तानाशाही / धर्मान्धता / अवैज्ञानिकता आदि के खिलाफ़ आवाज उठाई जाती है ताकि समानता और सम्मान पर आधारित एक बेहतर समाज का निर्माण किया जा सके, जिसमें सामाजिक न्याय एक महत्वपूर्ण घटक हो । उन्होंने हरियाणवी बोली में लिखी जा रही कविता और गज़ल को हरियाणा की साहित्यिक पहचान और जीवंतता बताया । उनका सुझाव था कि अपनी बोली में अवश्य लिखा जाना चाहिए l

कविता में अभिधा, लक्षणा और व्यंजना पर विशेष ध्यान देने की जरूरतः राधेश्याम तिवारी
कवि/समीक्षक/पत्रकार ‘राधेश्याम तिवारी’ ने कहा कि कविता लिखते समय अभिधा,लक्षणा और व्यंजना का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने अपनी कविता ‘इस बीच’ को सुनाकर यह स्पष्ट किया कि कविता लक्षणा और व्यंजना में लिखी जानी चाहिए ।
आसपास को कविता का विषय बनाएंः श्याम सुशील
इसी प्रकार कवि/पत्रकार ‘श्याम सुशील’ ने युवा कवियों पर चर्चा की और अपनी एक कविता ‘नए पत्ते आ रहे हैं’ कविता के माध्यम से उपस्थित रचनाकारों को यह बताया कि कविता हमारे आसपास ही बिखरी हुई है और उसे वहीं से , वहीं की रंगत के साथ उठाना जाना चाहिए ।
संवेदनशील और सत्यान्वेषी हो कविताः गजेंद्र
तीसरे वक्ता सुप्रसिद्ध कथाकार गजेंद्र रावत ने उपस्थित रचनाकारों की कविताओं की चर्चा करते हुए कहा कि यह तो ठीक है कि हम कविता में संवेदनशीलता की बात करें लेकिन वह कोरी भावुकता होकर न रह जाए । हमारे संवेदनशीलता को सत्यान्वेषी भी होना जरूरी है..वह आत्मलाप बन कर न रह जाए। इसे मुक्तिबोध के शब्दों में ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान भी कहा जा सकता है। उन्होंने रामायण महाभारत और मध्यकालीन संत कवियों के काव्य को उपदेशात्मक कहा और यह बताया आज की कविता मुक्त छन्द में लिखी जा रही है । उसमें गुणात्मक परिवर्तन यह है कि समकालीन कविता उपदेशात्मक नहीं होना चाहती ।वह अपने स्वभाव में यथार्थवादी और सत्यान्वेषी है । वह, भाषा, कला, परंपरा, सरोकार और विषय-वस्तु के स्तर पर संघर्षरत है। उन्होने विभिन्न विमर्शों के साथ-साथ वर्गीय चेतना के विकास को भी महत्वपूर्ण माना।

भेजी गई कविताओं पर चर्चा न होने पर नाराज हुए कवि
कार्यशाला के अंत में उपस्थित रचनाकारों की टिप्पणियां भी ली गई जिसमें हरपाल,प्रमोद गोरी, दीपक वोहरा, ओमसिंह अशफ़ाक, कपिल भारद्वाज, मंगत राम शास्त्री, विकास आनंद, सुनील थुआ, अनुपम शर्मा, नरेश दहिया, विनोद कुमार, राम मेहर कमेरा, दिलबाग, अकेला आदि ने भाग लिया । उपस्थित सभी रचनाकारों का आरोप था कि भेजी गई कविताओं का संज्ञान आमंत्रित विद्वानों ने नहीं लिया ।उन्होंने केवल कार्यक्रम के दौरान प्रस्तुत की गई कविताओं पर ही अपने विचार रखें ।
कविता के कला पक्ष पर भी बात होनी चाहिए

प्रमोद-गौरी ,कपिल भारद्वाज और ओम सिंह अशफ़ाक का कहना था कि कविता के कला पक्ष पर भी बात की जानी चाहिए । उनका कहना था दलित, स्त्री, आदिवासी कविता को जनवाद से अलग नहीं किया जा सकता । इसके अतिरिक्त इस गंभीर चर्चा में डा.विकास आनंद, मनजीत सिंह भावड़िया,राम मेहर कमेरा,मंगतराम शास्त्री सुनील थुआ,दिलबाग अकेला, नरेश दहिया आदि ने भी भाग लिया और अपनी टिप्पणियों से इस कार्यशाला को समृद्ध किया ।
आज की कविता कार्यशाला की अध्यक्षता जलेस के राज्य अध्यक्ष जयपाल ने की और मंच संचालन राज्य सचिव सरदानंद राजली ने किया। इस आयोजन में कुरुक्षेत्र, अंबाला, करनाल, कैथल, हिसार, जींद, फतेहाबाद और रोहतक के रचनाकारों ने भाग लिया।
