भारतीय किसान आंदोलनों का बदलता स्वरूप – सन् 2000 से 2026: एक समीक्षा
डॉ. रामजीलाल
भारत में किसान आंदोलनों में इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से काफी बदलाव आया है। शुरुआत में सिंचाई, बिजली और फसल की कीमतों जैसे मुद्दों पर फोकस करने वाले ये क्षेत्रीय आंदोलन 2000 के बाद आर्थिक उदारीकरण, बढ़ती लागत और कॉर्पोरेट प्रभाव के कारण विकसित होने लगे। किसान न केवल ज़्यादा कीमतों की मांग करने लगे, बल्कि कृषि बाज़ारों और पब्लिक पॉलिसी पर ज़्यादा कंट्रोल की भी मांग करने लगे।यह बदलाव सन् 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान सबसे ज़्यादा दिखा, जहाँ कई संगठन संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के तहत एकजुट हुए, जिससे तीन विवादित कृषि कानूनों को रद्द कर दिया गया।
1. लोकल से नेशनल आंदोलनों तक:
शुरुआत में, आंदोलन भौगोलिक रूप से लोकल मुद्दों पर फोकस थे। समय के साथ, किसानों ने पहचाना कि मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) और कृषि व्यापार जैसी कई चुनौतियों के लिए नेशनल कोऑर्डिनेशन की ज़रूरत है। सन् 2017 में ऑल-इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी (AIKSCC) का बनना देश की एकता की दिशा में एक बड़ा कदम था।
2. फसलों कीमत की मांग से लेकर कानूनी MSP तक:
फसलों की ज़्यादा कीमतों की मांग कानूनी तौर पर गारंटी वाले मिनिमम सपोर्ट प्राइस (C2+50%) की मांग में बदल गई। यह 2020-21 के आंदोलन के दौरान एक मुख्य मुद्दा बन गया, जिसने एग्रीकल्चरल प्रोड्यूसर मार्केट कमेटी (APMC) सिस्टम में बदलाव के बीच MSP के कमज़ोर होने पर किसानों की चिंताओं को सामने लाया
3. सरकार से कॉर्पोरेट असर तक:
सिर्फ़ सरकार का सामना करने के बजाय, किसानों ने एग्रीकल्चरल मार्केटिंग और सप्लाई चेन में कॉर्पोरेशन की बढ़ती ताकत पर ध्यान देना शुरू कर दिया। तीन कृषि कानूनों ने यह डर पैदा किया कि कॉर्पोरेट असर किसानों की मोल भाव करने की ताकत को कम कर सकता है, जिससे राज्य-बाज़ार-कॉर्पोरेट ताकत के ख़िलाफ़ एक बड़ा संघर्ष शुरू हो गया।
4. अलग-अलग संगठनों से छाता संगठन तक:
सन्2020-21 के आंदोलन ने संयुक्त किसान मोर्चा(SKM )के तहत अलग-अलग संगठनों के बीच असरदार समन्वय दिखाया। इससे पता चला कि अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले संगठन साँझी मांगों के लिए एकजुट हो सकते हैं, जो खास राजनीतिक विचारधारा या क्षेत्रीय पिछले आंदोलनों से हटकर है।
5. महिलाओं की बढ़ती भागीदारी:
किसानों के आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका ज़्यादा अहम हो गई है। अब सिर्फ़ पुरुष किसानों के साथ नहीं, बल्कि महिलाओं ने वर्कर, किसान और प्रबंधक के तौर पर सक्रिय रूप से हिस्सा लिया, जो खेती की लड़ाइयों में उनकी पहले से सीमित भागीदारी से एक बड़ा बदलाव दिखाता है। किसानों के आंदोलनों में यह बदलाव भारत में एग्रीकल्चर सेक्टर के सामने आने वाली मुश्किल चुनौतियों से निपटने के लिए ज़्यादा संगठित व सबको साथ लेकर चलने वाली कोशिश को दिखाता है।
6. युवाओं और सोशल मीडिया की भूमिका: कम्युनिकेशन का डिजिटलाइज़ेशन
सन् 2000 के दशक की शुरुआत और सन् 2020 के बाद के किसान मूवमेंट के बीच सबसे खास अंतरों में से एक डिजिटल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल है। पहले के आंदोलन ज़्यादातर गांव की मीटिंग, पैम्फलेट, अखबार, और पारंपरिक यूनियन नेटवर्क पर निर्भर थे। इसके उलट, आजकल के आंदोलन इन तरीकों को WhatsApp, Facebook, YouTube और X जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ मिलाते हैं। सोशल मीडिया ने किसानों को सपोर्टर्स से सीधे बात करने, जानकारी फैलाने, सरकारी बातों को चुनौती देने और देश और विदेश दोनों का ध्यान खींचने में मदद की है। इस तरह सन्2020-21 का आंदोलन एक फिजिकल कब्ज़ा आंदोलन और एक डिजिटल कम्युनिकेशन आंदोलन, दोनों में बदल गया, जिसमें पीपल्स आर्काइव ऑफ़ फार्मर्स प्रोटेस्ट्स ने संघर्ष के आस-पास हुई बड़े पैमाने पर भीड़ और कम्युनिकेशन को डॉक्यूमेंट किया है।
7. विरोध प्रदर्शन स्थल व अस्थायी निवास के तौर पर: सोशल ऑर्गनाइज़ेशन और सोशल मूवमेंट के सेंटर
हाल के आंदोलनों की एक और नई खासियत लंबे समय तक चलने वाले प्रोटेस्ट साइट्स बनाना है। सन् 2020-21 के दिल्ली-बॉर्डर प्रोटेस्ट के दौरान, प्रोटेस्ट कैंप सेमी-परमानेंट कम्युनिटी में बदल गए, जो खाना बांटने, मेडिकल सुविधाएं, कल्चरल एक्टिविटी, लाइब्रेरी, वॉलंटियर नेटवर्क और मीडिया ऑपरेशन की सुविधा देते थे। नतीजतन, प्रोटेस्ट सिर्फ एक मार्च या प्रदर्शन नहीं था; यह एक लगातार चलने वाला सोशल मूवमेंट बन गया। कैंप, लंगर और अलग-अलग सेवाओं के आयोजन से लगभग एक साल तक लोगों को जोड़े रखने में मदद मिली।
8. खेती के मुद्दों से लेकर बड़े सामाजिक सवालों तक: ग्रामीण समाज के लिए एक बड़ा एजेंडा
आजकल के किसान आंदोलन ने अपने एजेंडे को काफी बड़ा कर लिया है। किसान संगठन खेती का कर्ज़, मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP), फसल बीमा, इनपुट कॉस्ट, ज़मीन के अधिकार, पानी और बिजली तक पहुँच, क्लाइमेट चेंज, फसल डायवर्सिफिकेशन, ग्रामीण युवाओं की बेरोज़गारी, किसानों की पेंशन, कॉर्पोरेट कंट्रोल, फ़ूड सिक्योरिटी और एनवायरनमेंटल सस्टेनेबिलिटी जैसे मुद्दों पर तेज़ी से चर्चा कर रहे हैं। इस तरह, किसानों का आंदोलन अब फसल की कीमतों के छोटे सवाल तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण समाज के भविष्य के बारे में एक बहुत बड़ी बातचीत का हिस्सा बन गया है।
9. सन् 2024–6 का फेज़: एक नए युग की शुरुआत
तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने से किसानों की माँगें खत्म होने का संकेत नहीं मिला। कई संगठन MSP, खेती का कर्ज़, मुआवजा, पेंशन और पहले दिए गए आश्वासनों को लागू करने से जुड़ी चिंताओं को दूर करना जारी रखे हुए हैं। चल रही लामबंदी दिखाती है कि तीनों कानूनों को रद्द करने से एक बड़ा मुद्दा हल तो हुआ, लेकिन इससे भारतीय खेती के सामने मौजूद स्ट्रक्चरल संकट का हल नहीं हुआ। सन् 2026 तक, सरकार ने खेती के लोन और MSP खरीद में काफ़ी बढ़ोतरी की जानकारी दी; उदाहरण के लिए, अगस्त 2026 तक, किसान क्रेडिट कार्ड अकाउंट में ₹10.08 लाख करोड़ बकाया थे, और लंबे समय में MSP खरीद में काफ़ी बढ़ोतरी हुई। हालांकि, किसान संगठनों का तर्क है कि इनकम सिक्योरिटी और सही दाम से जुड़े मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं। अगस्त 2026 में, संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने 26 नवंबर से दिल्ली समेत 100 जगहों पर नए विरोध प्रदर्शन की योजना की घोषणा की, जिससे पता चलता है कि किसानों का आंदोलन एक मजबूत ताकत बना हुआ है।
किसान आंदोलन के भविष्य की प्रवृतियां
किसान आंदोलन का भविष्य खत्म होने की उम्मीद नहीं है; बल्कि, इसका स्वरूप बदल जाएगा। मुख्य सवाल इस बात पर ज़्यादा ध्यान देगा कि क्या खेती बाज़ार के उतार-चढ़ाव, क्लाइमेट चेंज, टेक्नोलॉजी में तरक्की और कॉर्पोरेट के जमावड़े के बीच सुरक्षित और सम्मानजनक रोज़ी-रोटी दे सकती है। इसलिए, अगली पीढ़ी के किसान आंदोलन किसी एक खेती के कानून के बारे में कम और “खेती के न्याय” के बारे में ज़्यादा हो सकते हैं, जिसमें सही दाम, सुरक्षित रोज़ी-रोटी, क्लाइमेट प्रोटेक्शन, सोशल सिक्योरिटी, ज़मीन और रिसोर्स पर कंट्रोल, टेक्नोलॉजी के अधिकार और ज़्यादा पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन शामिल हैं।
सबसे बड़ा बदलाव “किसान विरोध” से “किसान पॉलिटिक्स” में बदल सकता है। किसान सिर्फ़ सरकारों से छूट की मांग नहीं कर रहे हैं; वे खेती, आर्थिक और पर्यावरण पॉलिसी को बनाने में ऑर्गनाइज़्ड पार्टिसिपेंट बन रहे हैं। इस मायने में, भविष्य का किसान आंदोलन भारत के सबसे ज़रूरी डेमोक्रेटिक आंदोलनों में से एक बन सकता है, जो किसानों, खेती में काम करने वालों, महिलाओं, गांव के युवाओं और कंज्यूमर्स को इस ज़रूरी सवाल के आस-पास जोड़ेगा कि भारत के फूड्स सिस्टम को कौन कंट्रोल करता है और जो लोग खाना उगाते हैं, वे इसे इज्ज़त के साथ कैसे कर सकते हैं।
सारांश:सन्2000 के आसपास, किसानों के आंदोलन मुख्य रूप से बिजली, पानी, कीमतें और खेती के इनपुट जैसे मुद्दों पर केंद्रित थे। किसान संगठन, ज़्यादातर क्षेत्रीय, स्थानीय नेताओं द्वारा चलाए जाते थे और रैलियों, अखबारों और मीटिंग के ज़रिए उनसे बातचीत की जाती थी। विरोध प्रदर्शन आम तौर पर राज्य सरकारों और स्थानीय एजेंसियों के खिलाफ मार्च और प्रदर्शनों के रूप में होते थे, जिसमें ज़्यादातर भागीदारी सिर्फ़ किसानों तक ही सीमित होती थी।
सन्2026 तक, इन आंदोलनों का माहौल काफ़ी बदल गया है। नई मांगें सामने आई हैं, जिनमें मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP), कर्ज़ में राहत, बाज़ार तक पहुँच, कॉर्पोरेट प्रभाव और जलवायु से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। अब इस आंदोलन की पहचान राष्ट्रीय गठबंधनों से है, जैसे कि संयुक्त किसान मोर्चा (SKM), जिसमें 400 से ज़्यादा संगठन शामिल हैं। कम्युनिकेशन में पारंपरिक और आधुनिक, दोनों तरह के तरीके शामिल हो गए हैं, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया शामिल हैं।
भागीदारी किसानों से आगे बढ़कर खेतिहर मज़दूरों, महिलाओं, ग्रामीण युवाओं, बाहर से आए लोगों और शहरों में पढ़े-लिखे बेरोज़गार लोगों तक भी पहुँच गई है। ध्यान स्थानीय मुद्दों से हटकर राष्ट्रीय सरकार की नीतियों, मल्टीनेशनल कंपनियों और विदेश नीति पर चला गया है। सन्2024 से सन्2026 तक चल रहे विरोध प्रदर्शन भारतीय खेती में अनसुलझी चुनौतियों को दिखाते हैं, जैसे कम इनकम, बढ़ती लागत और क्लाइमेट रिस्क।
इन वजहों से किसान आंदोलन और तेज़ हो सकते हैं, जिसमें युवा पीढ़ी अहम भूमिका निभाएगी और नतीजों का कम डर दिखाएगी। इसलिए, सरकार को किसानों की फ़ूड सिक्योरिटी की मांगों पर ध्यान देना चाहिए। भारतीय किसान आंदोलनों का बदलता हिए, और युवाओं को विरोध के शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीकों में शामिल होना चाहिए।

A comprehensive analysis of the changing nature of farmers’ movements in India. The article truly traces the journey from regional struggles over prices, irrigation and electricity to a broader national movement centred on MSP, agrarian justice, corporate influence, climate change, women’s participation and rural youth. The discussion of the 2020–21 farmers’ movement, digital mobilisation and the growing role of the Samyukta Kisan Morcha is particularly significant. The idea of a transition from “Kisan Protest” to “Kisan Politics” is thought-provoking and highlights the growing role of farmers in shaping public policy and Indian democracy. An important contribution to the understanding of contemporary agrarian movements.Heartiest congratulations sir for such an insightful article
With Regards and Good Wishes
Dr Amol
Assistant Professor of English
Dyal Singh College
Karnal (Haryana)
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Dr Amol
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Dyal Singh College
Karnal (Haryana)
I AM THANKFUL TO THE READERS