कविता
कब तय करेंगे
जयपाल
जहां गोदाम खा रहे हों अनाज
पेट खा रहे हों आम की गुठलियां
जहां सूखे में सूख जाती हैं आंतें
बाढ़ में फूल जाते हैं पेट
जहां लू और शीत का मतलब हो
बीमारी और मौत का मौसम
जहां सूरज निकलने का मतलब हो
बच्चों का मज़दूरी के लिए निकलना
सूरज छिपने का मतलब हो
चूल्हे पर रखा खाली तवा
जहां बच्चे सपने में जाते हों स्कूल
जागने पर पहुँचते हों कूड़े के ढेर पर
जहां सरकार का मतलब हो चक्की
और जनता का मतलब हो गेहूँ
जहां खेती का मतलब हो ख़ुदकशी की फसल
और मज़दूरी का मतलब हो मौत का कुआं
ऐसे विचित्र समय में
जब शब्दों को जलील किया जा रहा हो
अर्थों का अपहरण कर लिया गया हो
इतिहास के अंत की घोषणा हो गयी हो
इस दौर का कठिन प्रश्न यह है
कि जब चारों तरफ सब कुछ मरता जा रहा हो
हम यह कब तय करेंगे
कि हम जी रहे हैं या मर रहे हैं!
