AI और बेरोज़गारी: खोट तकनीक में नहीं, व्यवस्था में है
धर्मेन्द्र आज़ाद
आज दुनिया भर में AI, रोबोटिक्स और ऑटोमेशन को लेकर बेचैनी है। डर है कि मशीनें इंसानों का काम कर लेंगी, नौकरियाँ छिनेंगी और बेरोज़गारी समाज के लिए नासूर बन जाएगी।
यह डर पूरी तरह काल्पनिक भी नहीं है। ILO के अनुसार, दुनिया भर में लगभग हर चार में से एक नौकरी AI के प्रभाव के दायरे में आ सकती है। वहीं IMF का अनुमान है कि वैश्विक रोजगार का करीब 40% हिस्सा AI से प्रभावित हो सकता है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह हिस्सेदारी लगभग 60% तक पहुँचती है। कई कंपनियों में इसका असर दिख भी रहा है; छँटनी और रोजगार की असुरक्षा बढ़ रही है। ऐसा माहौल बन रहा है, मानो उन्नत तकनीक मानवता की भलाई के लिए नहीं, बल्कि एक नई मुसीबत बनकर आई हो।
अर्थशास्त्रियों की चिंता केवल बेरोज़गारी तक सीमित नहीं है। वे यह भी जानते हैं कि इस बेरोज़गारी का दुष्प्रभाव केवल बेरोज़गारों और उन पर आश्रित लोगों तक सीमित नहीं रहेगा। बड़ी आबादी के रोजगार छिनने का मतलब उनकी क्रयशक्ति का कम होना भी है। इससे उपभोग और माँग घटेगी; माँग घटेगी तो कारखानों का माल बिकना मुश्किल होगा; कृत्रिम अतिउत्पादन का संकट पैदा होगा और छँटनी और बढ़ सकती है। इस तरह यह दुष्चक्र अर्थव्यवस्था को मंदी, यहाँ तक कि महामंदी की ओर भी धकेल सकता है।
लेकिन यहाँ एक बुनियादी सवाल है—
अगर तकनीक की मदद से वही काम बहुत कम लोगों द्वारा आसान तरीकों और कम समय में किया जा सकता है, जिसे पहले कई गुना अधिक लोग मिलकर अधिक मेहनत के साथ करते थे, तो यह संकट क्यों होना चाहिए?
मान लीजिए, एक मशीन की मदद से 100 लोगों का काम दो लोग कर सकते हैं। तब मानव सभ्यता के नज़रिए से तो यह एक शानदार उपलब्धि होनी चाहिए—
कम मेहनत।
ज्यादा उत्पादन।
ज्यादा अवकाश।
बेहतर जीवन।
तो फिर तकनीक दोषी कैसे बन गई?
असल सवाल यहीं से शुरू होता है कि यह समाज व्यवस्था किसके हितों के लिए काम कर रही है?
तकनीक, मशीनों, कारखानों और उत्पादन के साधनों पर मालिकाना किसका है—पूरे समाज का या कुछ पूँजीपतियों का?
अगर सामाजिक व्यवस्था का उद्देश्य लोगों की जरूरतें पूरी करना और जीवन बेहतर बनाना हो, तो नई तकनीक का मतलब होना चाहिए—कम काम के घंटे, छोटा कार्य-सप्ताह, उन्नत जीवन स्तर और सभी के लिए रोजगार की गारंटी।
लेकिन अगर उत्पादन का मुख्य उद्देश्य मुनाफ़ा हो, तो वही तकनीक कम लोगों से अधिक उत्पादन कराने के लिए इस्तेमाल होती है। परिणामस्वरूप छँटनी और बेरोज़गारी बढ़ती है और समाज एक ऐसे दुष्चक्र में फँस सकता है, जिसका रास्ता आर्थिक मंदी की ओर जाता है।
यही पूँजीवादी व्यवस्था कहती है—
“जब स्वचालित मशीनें आ गई हैं और AI काम आसान कर सकता है, तो अब इतने लोगों को काम पर रखने की जरूरत ही क्यों है?”
जबकि प्रचार इस बात का होना चाहिए—
आइए, और उन्नत तकनीक विकसित करें, जिससे तकनीक की मदद से इंसान को कम काम करना पड़े और हम एक संपन्न, स्वस्थ और खुशहाल समाज बनाने में कामयाब हों।
लेकिन ऐसा नहीं होता है। आखिर क्यों?
क्योंकि तकनीक का मालिकाना जिनके पास है, उन्हें समाज की उन्नति के लिए सोचने के बजाय अपना मुनाफ़ा बढ़ाने की होड़ लगी है। सरकारें तथा व्यवस्था के बाकी उपक्रम भी उन्हीं के मुनाफ़े बढ़ाने के औजार बने हुए हैं।
यानी तकनीक में इंसानों के काम को आसान और अधिक उत्पादक बनाने की क्षमता है, लेकिन मुनाफ़े पर टिकी हुई पूँजीवादी व्यवस्था में वही तकनीक इंसानों को उनके रोजगार से बेदखल करना अपनी उपलब्धि समझती है।
इसलिए असली सवाल AI या किसी भी उन्नत तकनीक का नहीं है।
सवाल है—उत्पादन के साधन किसके लिए और किसके नियंत्रण में हैं?
अगर उत्पादकता का लाभ समाज में बाँटा जाए, तो तकनीक इंसान को कम काम और बेहतर जीवन दे सकती है।
अगर वह पूँजी के हाथों में सिमट जाए, तो वही तकनीक असमानता का नया इंजन बन सकती है।
मशीनें समस्या नहीं हैं। सवाल यह है कि मशीनें किसके लिए काम करेंगी—समाज के लिए या मुनाफ़े के लिए?

लेखक- धर्मेन्द्र आजाद
