कविता
समय से परे
– मंजुल भारद्वाज
समय से परे
क्या है?
शून्य में घूमते
अंतराल के सिवा!
आत्म विस्फोट की
बिखरती राख़ से
जन्मता है अंतरिक्ष !
उड़ती हुई राख़
एकत्रित करती है
अपनी चिंगारियां
सृजित करती है अपना अस्तित्व !
ग्रहों,उपग्रहों
उल्का पिंडों
आकाश गंगा के बीच
जलता है सूर्य !
सूर्य अपनी रोशनी से मिटाता है
अंधेरा वसुंधरा का
वसुंधरा पंच तत्वों से
सृजित करती है प्राण !
जन्मता है समय
लिखता है अपने
इश्क़ की दास्तां !
हवा के बुलबुलों सा जीवन
अपने सुर,राग
संगीत लिए
रचता है संसार !
संसार फ़ानी है
पर जीवन की
अमर कहानी है!
अमर यानी
अंतराल में रचा
बसा सृजनकार
अपनी वेदना से
सृजित करता है समय
समय के परे
प्रेम सिरों को
जोड़ता हुआ !
