कबीर : युग प्रवर्तक क्रांतिकारी संत
दीपक वोहरा
कबीर के नाम में एक अद्भुत गूंज और सम्मोहन है। कबीर का फारसी भाषा में अर्थ है- श्रेष्ठ। कबीर वाकई श्रेष्ठ थे– अपने जीवन चरित्र और सारगर्भित व मर्मस्पर्शी वाणी से। कबीर का नाम आते ही हमारे जेहन में फक्कड़, निर्भिक, जन्मजात विद्रोही और क्रांतिकारी संत का चित्र उभरता है। कबीर के सामने रूढ़िवादी पंडितों का वह वर्ग था जो धर्म की चादर ओढे सैंकड़ों आचार-संहिताओं के बल पर मेहनतकशों का शोषण कर रहा था। ब्राह्मण अपनी संहिताओं द्वारा निर्मित कर्मकाण्ड के डण्डे के बल पर मेहनतकशों को जातीय बहिष्कार करके शूद्र बना रहे थे। अगर किसी बहिष्कृत व्यक्ति या वर्ग ने सामाजिक न्याय के लिए सिर उठाया तो उसे अछूत बना दिया गया। ऐसी ही परिस्थितियों में कबीर मुस्लिम जुलाहे नीरा-नूरा दम्पति के घर बनारस में पैदा हुए। मध्यकालीन संतों में कबीर का स्थान बहुत ऊंचा है। अपनी सरल किंतु सारगर्भित तथा मर्मस्पर्शी वाणी के कारण, कबीर आज भी बेहद लोकप्रिय हैं। परन्तु दुख की बात है कि ऐसे महान व्यक्ति के जीवन काल के बारें में बहुत कम पता है।
कबीर का सबसे पहले उल्लेख नाभादास की भक्तमाल 1585 में मिलता है। इनके जन्म को लेकर तरह तरह की बातें फैलाई गई हैं। किसी का कहना है कि कबीर ने कुंआरी ब्राह्मणी के कोख से जन्म लिया, तो किसी का कहना है कि कबीर आकाश से एक ज्याति के रूप में आए थे। लेकिन यह बातें सभी झूठी हैं, क्योंकि संत रविदास, गुरु अमरदास, रज्जब आदि संतों ने स्पष्ट लिखा है कि कबीर ने एक मुस्लिम जुलाहा के गर्भ से जन्म लिया। संत रज्जब कहते हैं–जुलाहा गर्भे उत्पन्नों साध कबीर ।
धर्मदास जो कबीर के शिष्य थे, उन्होंने कहा है, “माय तुरकनी बाप जुलाहा, बेटा भक्त भये। गुरु रविदास ने स्पष्ट लिखा है कि कबीर के माता पिता मुस्लिम ही नहीं थे, बल्कि उनके परिवार में ईद के समय जानवरों की बलि भी दी जाती थी।
इस लेख का उद्देश्य कबीर के जीवन से | संबंधित मतभेदों का विवेचन करना नहीं है, बल्कि पंद्रहवी शताब्दी के इस महान क्रांतिकारी संत के व्यक्तित्व और शिक्षा पर रोशनी डालना है। जाति, कुल. सामाजिक स्तर और राष्ट्रीयता से संतो का कोई लेना देना नहीं है। कबीर स्वयं किसी जाति या धर्म में विश्वास नहीं करते थे। कबीर का जन्म 1398 में ज्येष्ठ शुक्ल के चतुदर्शी में हुआ। कबीर बचपन से ही जुलाहा व्यवसाय में रूचि लेने लगे। धीरे-धीरे जुलाहे के कार्य में कुशल हो गए। किसी भी जाति को छोटा या बड़ा न मानकर कबीर ने पंडितों से कहा – तू बामन मैं काशी का जुलाहा। कबीर इससे भी बढ़कर आगे लिखते हैं- हम बासी उस देश के, जहां जाति बरण कुल नाहिं। कबीर ने आम लोगों को विश्वास दिलाया, “बांमन गुरु जगत का, साधु का गुरू नहीं।’
समाज के प्रति कबीर की जागरूकता, निडरता, सामाजिक कुरीतियों और अन्याय के खिलाफ विद्रोह की भावना लाजवाब है। कबीर जैसा कटु यथार्थवादी स्पष्ट कवि कम से कम हिंदी साहित्य में दूसरा पैदा नहीं हुआ जो संप्रदायिक कट्टरता और विभेदों का खुलकर पर्दाफाश कर सकता है।
कबीर ने अनुभव किया कि झूठे मूल्यों को तोड़कर निर्माण की सही प्रक्रियाओं को अपनाकर सृजन की बुनियाद रखी जा सकती है। इसलिए उन्होंने खण्डन- मण्डन की रीति अपनाई। कबीर की समझ इतनी पैनी थी कि उन्होंने तत्कालीन समाज के सामंत से अधिक खतरनाक पंडित वर्ग और कठमुल्ला वर्ग की पहचान कर ली। पंडित वर्ग के हाथों में वेद पुराण, रीति-रिवाज, झूठे मूल्यों के हथियार थे। कबीर ने सबसे पहले इन्हीं हथियारों को कुंद किया।
उन्होंने लिखा है-
‘पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूंजो पहार ।
ताने ती चक्की गली, पीस खाय संसार ।।
वर्ण व्यवस्था के चलते श्री राम के हाथों शम्भूक मारा जाता है तो शूद्रों को पढ़ने-लिखने के अधिकार से वंचित रखकर पूरे वर्ग को अज्ञानता के दंश से मारा जाता है। तभी तो कबीर को कहना पड़ा–
मसि कागद छुओ नहीं, कलम गहयो नहिं हाथ।
कबीर निर्गुण भक्ति आंदोलन के सबसे सशक्त और विद्रोही कवि थे। समझौता उनकी प्रकृति में था ही नहीं। विद्रोह उनकी रंग रंग में व्याप्त था। उन्हें समझौता परस्तों की नहीं अपना घर फूंककर साथ चलने वालों की जरूरत थी। कबीर का रास्ता बेहद खतरनाक था। वे कहते हैं–
कबिरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ ।
जो घर जारे आपना चले हमारे साथ।।
कबीर की स्पष्टवादिता से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसा साहित्यकार भी क्षुब्ध हो जाता है। द्विवेदी जी लिखते हैं- “कबीर यह जानते ही नहीं थे कि पंडित वर्ग के पास तत्वज्ञान है, मोक्ष और अपवर्ग की व्याख्या है।” (कबीर, पृष्ठ संख्या 141) आचार्य जी जिस आध्यात्मिक मोक्ष, अपवर्ग, शास्त्रज्ञान, परम तत्व की वकालत कर रहे हैं, कबीर उसी का विरोध कर रहे थे। कबीर की लड़ाई सामाजिक मोक्ष के लिए थी। कबीर को यदि आचार्य द्विवेदी जी वाले ‘मोक्ष’ की जरूरत होती तो तो वे कभी भी काशी छोड़कर मगहर नहीं जाते।
कबीर एक अपराजेय योद्धा थे। कथनी और करनी में अंतर न होना ही कबीर को कबीर बनाता है। उनकी वाणी प्रखर से प्रखरतर होती गई। उन्हें चुप कर पाना तो दूर की बात थी, उसे कोई मद्धिम भी नहीं कर पाया। उन्होंने हर समझौते को लानत दी, हर प्रलोभन को ठुकराया, हर खतरे का सामना डटकर किया। कबीर जान गए थे कि हिंदू और मुसलमान दोनों अंधे है, जो अंधे हैं वे दूसरों को क्या रास्ता दिखायेंगे :
अरे इन दोऊब राह न पाई
हिंदु बन के हिंदुबाई देखी,
तुरकन की तुरकाई।”
कबीर ने धार्मिक पांखडियों के सामने तिलमिला देने वाले सवालों की झड़ी लगा कर उनको बिल्कुल निरुत्तर कर दिया: मन ना रंगाए, रंगाए जोगी कपरा
आसन मारि मंदिर में बैठे, ब्रह्म छोड़ि, पूजन लागे पथरा
डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने अपनी पुस्तक ‘कबीर’ में लिखा है- कबीर वाणी के डिक्टेटर थे। भाषा कबीर के सामने कुछ लाचार सी नजर आती है। उसमें मानों ऐसी हिम्मत ही नहीं, इस लापरवाह फक्कड़ की किसी फरमाइश को ना कर सके।
अंत में मैं इतना कहना चाहूंगा कि कबीर युग प्रवर्तक थे। उन्हें अपने समय की दुखती नब्ज पर हाथ रखा और पहचाना कि तत्कालीन समाज कितना गला-सड़ा और बीमार है। उन्होंने जीवन के हर पहलू पर लिखा। कबीर जैसे तत्व को समग्रता में समझने की जरूरत है, न कि टुकड़ों में।
कबीर के अन्धविश्वास, पाखंड, भेदभाव,जातिवाद पर कुछ एक दोहे !!
“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।”
” जो तूं ब्रह्मण , ब्राह्मणी का जाया !
आन बाट काहे नहीं आया !! ”
“लाडू लावन लापसी ,पूजा चढ़े अपार
पूजी पुजारी ले गया,मूरत के मुह छार !!”
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होइ॥
हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमान,
आपस में दोउ लड़ी मुए, मरम न कोउ जान।
”पाथर पूजे हरी मिले,
तो मै पूजू पहाड़ !
घर की चक्की कोई न पूजे,
जाको पीस खाए संसार !!”
”मुंड मुड़या हरि मिलें ,सब कोई लेई मुड़ाय |
बार -बार के मुड़ते ,भेंड़ा न बैकुण्ठ जाय ||”
”माटी का एक नाग बनाके,
पुजे लोग लुगाया !
जिंदा नाग जब घर मे निकले,
ले लाठी धमकाया !!”
” जिंदा बाप कोई न पुजे, मरे बाद पुजवाये !
मुठ्ठी भर चावल लेके, कौवे को बाप बनाय !!
”हमने देखा एक अजूबा ,मुर्दा रोटी खाए ,
समझाने से समझत नहीं ,लात पड़े चिल्लाये !!”
– कबीर
”कांकर पाथर जोरि के ,मस्जिद लई चुनाय |
ता उपर मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय ||”
”हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।”
”जाति ना पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान !
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान !!
”काहे को कीजै पांडे छूत विचार।
छूत ही ते उपजा सब संसार ।।
हमरे कैसे लोहू तुम्हारे कैसे दूध।
तुम कैसे बाह्मन पांडे, हम कैसे सूद।।”
”कबीरा कुंआ एक हैं,
पानी भरैं अनेक ।
बर्तन में ही भेद है,
पानी सबमें एक ॥”
”एक बूँद ,एकै मल मुतर,
एक चाम ,एक गुदा ।
एक जोती से सब उतपना,
कौन बामन कौन शूद ”
“मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे ,
मैं तो तेरे पास में।
ना मैं तीरथ में, ना मैं मुरत में,
ना एकांत निवास में ।
ना मंदिर में , ना मस्जिद में,
ना काबे , ना कैलाश में।।
ना मैं जप में, ना मैं तप में,
ना बरत ना उपवास में ।।।
ना मैं क्रिया करम में,
ना मैं जोग सन्यास में।।
खोजी हो तो तुरंत मिल जाऊ,
इक पल की तलाश में ।।
कहत कबीर सुनो भई साधू,
मैं तो तेरे पास में बन्दे…
मैं तो तेरे पास में…..

लेखक -दीपक वोहरा
