जो किताबों में नहीं मिलता

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

जो किताबों में नहीं मिलता

जीवन की सबसे बड़ी सीख अक्सर अपने अनुभवों से मिलती है, पाठ्यपस्तकों से नहीं

डॉ. रीटा अरोड़ा

कुछ दिन पहले एक परिचित अपने बेटे के साथ मिलने आए। बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुका था और पहली नौकरी जॉइन करने वाला था।

बातों-बातों में मैंने उस युवक से पूछा, “पापा से सबसे बड़ी सीख क्या मिली?”

वह कुछ क्षण सोचता रहा। फिर मुस्कुराकर बोला, “उन्होंने कभी मुझे लंबा भाषण नहीं दिया। लेकिन जब भी मैं किसी दुविधा में होता, वे अपने जीवन की कोई घटना सुना देते थे। उसी में मेरा उत्तर छिपा होता था।”

उसके पिता मुस्कुरा रहे थे। शायद उन्हें भी नहीं पता था कि उनकी साधारण-सी बातें बेटे के लिए जीवन का मार्गदर्शन बन चुकी थीं।

वहीं बैठा-बैठा मैं सोचने लगा—हम अपने बच्चों के लिए क्या छोड़कर जाना चाहते हैं?

बैंक बैलेंस… मकान… ज़मीन… गहने…

या फिर वह अनुभव, जिन्हें पाने में हमने पूरी ज़िंदगी लगा दी?

संपत्ति कमाने में वर्षों लगते हैं, लेकिन उसे खोने में कभी-कभी कुछ ही दिन लगते हैं। अनुभवों का ठीक उलटा है। जितना उन्हें बाँटते हैं, वे उतने ही मूल्यवान होते जाते हैं।

जीवन हमें हर दिन कुछ न कुछ सिखाता है। पहली नौकरी का उत्साह, पहली असफलता की टीस, गलत व्यक्ति पर किया गया भरोसा, सही समय पर लिया गया कठिन निर्णय, आर्थिक तंगी के दिन, रिश्तों की परीक्षा, बीमारी से मिली सीख

-ये सब किसी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं होते। ये जीवन के अध्याय होते हैं।

दुर्भाग्य से आज अनुभवों का हस्तांतरण कम होता जा रहा है।

पहले रात के भोजन के बाद परिवार साथ बैठता था। दादा-दादी अपने संघर्ष सुनाते थे। पिता अपने शुरुआती दिनों की बातें बताते थे। बच्चे सुनते-सुनते जीवन की अनगिनत सीखें बिना किसी औपचारिक शिक्षा के सीख लेते थे।

आज एक ही घर में चार लोग बैठे होते हैं, लेकिन चारों की नज़र अलग-अलग स्क्रीन पर होती है।

संवाद कम हो गए हैं और इसलिए अनुभव भी आगे नहीं बढ़ पा रहे।

एक बुजुर्ग शिक्षक से किसी ने पूछा, “आपने अपने बच्चों को सबसे बड़ी संपत्ति क्या दी?”

उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “अपनी गलतियाँ।”

सुनने वाला चौंक गया।

उन्होंने समझाया, “मैंने उन्हें हमेशा बताया कि जीवन में कहाँ-कहाँ ठोकर खाई, किस पर आँख बंद करके भरोसा किया, कब अहंकार ने नुकसान पहुँचाया और कब धैर्य ने बचा लिया। मैं चाहता था कि वे मेरी गलतियाँ दोहराने में अपनी आधी ज़िंदगी बर्बाद न करें।”

यही तो अनुभव की असली कीमत है।

हम अक्सर अपनी सफलताओं के किस्से सुनाते हैं, लेकिन अपनी असफलताओं को छिपा लेते हैं। जबकि अगली पीढ़ी को हमारी उपलब्धियों से अधिक हमारी भूलों से सीखने की ज़रूरत होती है।

किसी बच्चे को यह बताना कि “मेरे अंक हमेशा अच्छे आते थे”, शायद उसे प्रभावित करे। लेकिन यदि आप यह बताएँ कि “एक बार मैं असफल हुआ था, फिर कैसे संभला”, तो वह उससे जुड़ पाएगा।

क्योंकि सफलता प्रेरणा देती है, लेकिन संघर्ष साहस देता है।

आज इंटरनेट के पास जानकारी की कोई कमी नहीं है। कोई भी उत्तर कुछ सेकंड में मिल जाता है। लेकिन यह कोई नहीं बताता कि सही उत्तर जानते हुए भी सही निर्णय कैसे लिया जाए।

यह कला केवल अनुभव सिखाते हैं।

यही कारण है कि अनुभवी लोगों की उपस्थिति किसी भी परिवार की सबसे बड़ी पूँजी होती है।

लेकिन अनुभव तभी उपयोगी बनते हैं, जब वे अलमारी में बंद डायरी नहीं, बल्कि बातचीत का हिस्सा बनें।

कभी अपने बच्चों से यह भी साझा कीजिए कि पहली तनख्वाह मिलने पर आपने कैसा महसूस किया था। पहली गलती से क्या सीखा। किस निर्णय पर आज भी गर्व है और कौन-सा निर्णय आज भी सोचने पर मजबूर कर देता है।

हो सकता है उस समय उन्हें यह केवल एक कहानी लगे। लेकिन जीवन के किसी कठिन मोड़ पर वही कहानी उनके भीतर रास्ता खोज लेगी।

अगली पीढ़ी को हमारी सलाह शायद हमेशा याद न रहे, लेकिन हमारे अनुभवों से निकली कहानियाँ उन्हें जीवन भर याद रहती हैं।

यही कहानियाँ उन्हें गिरने से पहले संभालती हैं और हारने के बाद फिर खड़ा होना सिखाती हैं।

आख़िरकार, हर पीढ़ी अपने अनुभव स्वयं अर्जित करेगी। लेकिन यदि उसे पिछली पीढ़ी के तजुर्बों का सहारा मिल जाए, तो उसकी यात्रा थोड़ी आसान, थोड़ी समझदार और शायद थोड़ी अधिक मानवीय हो जाएगी।

फंडा यह है कि अपने बच्चों के लिए केवल संपत्ति मत जोड़िए। उन्हें अपने अनुभवों की विरासत भी दीजिए। क्योंकि धन सुविधा देता है, लेकिन तजुर्बा सही दिशा देता है।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
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