फर्निश्ड फ्लैट से फर्निश्ड रिश्तों तक… क्या बचा अपना?

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

रिश्ते-नाते

फर्निश्ड फ्लैट से फर्निश्ड रिश्तों तक… क्या बचा अपना?

डॉ रीटा अरोड़ा

 

“आज की पीढ़ी को देखो,” शर्मा जी ने पार्क की बेंच पर बैठते हुए कहा, “घर में कुछ भी अपना नहीं चाहिए। खाना ऑनलाइन, घर फर्निश्ड, गाड़ी किराये की… और अब शायद रिश्ते भी सुविधा के हिसाब से चाहिए!”
वर्मा जी मुस्कुराए, लेकिन उनकी आँखों की उदासी छिपी नहीं।
“बात सिर्फ सुविधा की नहीं है शर्मा जी,” उन्होंने धीरे से कहा, “बात यह है कि सुविधा कहीं जिम्मेदारी की जगह तो नहीं ले रही?”

यही सवाल आज हमारे समाज के सामने खड़ा है।

कभी घर बनाना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में माना जाता था। ईंट-ईंट जोड़कर घर बनता था और रिश्ते वर्ष-दर-वर्ष।
रसोई में माँ की आवाज,
आँगन में बच्चों की किलकारियाँ,
पिता की डाँट,
भाई-बहनों की नोकझोंक और
शाम को साथ बैठकर खाना-

इन सबमें जीवन की असली संपत्ति छिपी होती थी।

आज तस्वीर बदल रही है।

ऑनलाइन खाना कुछ ही क्लिक में दरवाजे तक पहुँच जाता है। फर्निश्ड फ्लैट में प्रवेश करते ही जीवन की अधिकांश जरूरतें पहले से मौजूद मिलती हैं। व्यक्ति अपने साथ केवल एक बैग लाता है और बाकी सब किराये या सुविधा से जुटा लेता है।
यह बदलाव बुरा नहीं है।
समय बचता है,
श्रम बचता है और
जीवन अधिक सुविधाजनक होता है।

लेकिन सवाल तब पैदा होता है, जब यही सोच रिश्तों में प्रवेश कर जाती है।

आज साथ रहने का अर्थ हमेशा साथ निभाना नहीं रह गया है। दो लोग एक ही छत के नीचे रह सकते हैं, साथ खा-पी सकते हैं, घूम सकते हैं, खुशियाँ बाँट सकते हैं, लेकिन अपने-अपने सामान, खर्च, सुविधा, स्वतंत्रता और भविष्य की जिम्मेदारी अलग-अलग रख सकते हैं।

रिश्ता जैसे कह रहा हो- “तुम अपनी जिंदगी के मालिक, मैं अपनी जिंदगी का मालिक; जब तक सुविधा है, साथ हैं।”

यह व्यवस्था स्वतंत्रता देती है, लेकिन क्या यह भावनात्मक सुरक्षा भी देती है?

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न माता-पिता की भूमिका का है।

जिस पीढ़ी ने बच्चों को पालने में अपनी जवानी लगा दी, क्या उसकी भूमिका अब केवल आर्थिक सहायता, भावनात्मक बैकअप या जरूरत पड़ने पर बच्चों के लिए उपलब्ध रहने तक सीमित हो जाएगी?

माता-पिता ने कभी बच्चों से हिसाब नहीं माँगा कि हमने तुम्हारे लिए कितनी रातें जागकर बिताईं।
उन्होंने यह भी नहीं कहा कि हमारी पढ़ाई, हमारी कमाई, हमारी नींद और हमारी इच्छाओं का हिसाब दो।
उन्होंने बस दिया- क्योंकि रिश्ते में “देना” उनका स्वभाव था।

लेकिन आने वाली पीढ़ी क्या रिश्तों को भी “यूज़ एंड मैनेज” की वस्तु बना देगी?

एक दिन पार्क में बैठे दो बुजुर्गों की बातचीत सुनिए-

“वर्मा जी, हमारे बच्चे दूर हैं। फोन करते हैं, पैसे भेजते हैं, चिंता भी करते हैं… फिर भी घर खाली क्यों लगता है?”
“क्योंकि बेटा, जरूरतें पूरी होना और किसी का पास होना—दो अलग बातें हैं।”
“तो भविष्य में हमारे बच्चों के बच्चे क्या पाएँगे?”

“शायद बहुत सुविधाएँ… लेकिन यह तय नहीं कि उन्हें कोई दादी की गोद भी मिलेगी या नहीं।”

यही हमारे समय की सबसे बड़ी सामाजिक पीड़ा है।

हमें नई पीढ़ी को दोष देने से पहले यह समझना होगा कि परिवर्तन जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है।

आज का युवा स्वतंत्र रहना चाहता है,
अपने फैसले स्वयं लेना चाहता है और
पुराने सामाजिक बंधनों से बाहर निकलना चाहता है।

यह उसकी गलती नहीं है। समस्या स्वतंत्रता में नहीं, जिम्मेदारी से अलग होती स्वतंत्रता में है।

रिश्ते कोई फर्निश्ड फ्लैट नहीं हैं, जहाँ प्रवेश करते ही सारी सुविधाएँ तैयार मिल जाएँ।
रिश्तों में कभी असहमति होगी,
कभी त्याग करना पड़ेगा,
कभी अपनी सुविधा छोड़कर दूसरे का हाथ पकड़ना होगा।
कभी माता-पिता बच्चों के लिए झुकेंगे तो कभी बच्चों को माता-पिता की कमजोर होती उम्र के लिए रुकना होगा।

क्योंकि रिश्ते केवल साथ रहने से नहीं बनते, एक-दूसरे के लिए खड़े रहने से बनते हैं।

आज “लिव-इन” केवल दो व्यक्तियों के साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि कहीं-कहीं हमारी पूरी सामाजिक मानसिकता का प्रतीक बनता जा रहा है—साथ रहो, जब तक मन हो; सुविधा रहे, तब तक निभाओ; कठिनाई आए तो रास्ता बदल लो।

लेकिन जीवन की असली परीक्षा सुविधा के दिनों में नहीं, कठिन दिनों में होती है।

कल जब आज की युवा पीढ़ी स्वयं वरिष्ठ नागरिक होगी, तब उनके बच्चे उनसे क्या कहेंगे?

“आप हमारे लिए हमेशा उपलब्ध थे, लेकिन क्या हम आपके लिए उपलब्ध होंगे?”

यह सवाल आज ही पूछना जरूरी है।

क्योंकि हम अपने बच्चों को महँगे घर, अच्छी शिक्षा, आधुनिक सुविधाएँ और आर्थिक सुरक्षा तो दे सकते हैं; मगर रिश्तों की गर्माहट विरासत में तभी दे पाएँगे, जब उसे अपने जीवन में बचाकर रखेंगे।

शायद आने वाले समय में हमारे पास स्मार्ट घर होंगे,
स्मार्ट किचन होंगे,
स्मार्ट फोन होंगे और
स्मार्ट रिश्तों के लिए भी हजारों ऐप होंगे।

बस डर इतना है कि कहीं इंसान के पास सब कुछ स्मार्ट हो जाए… और दिल अकेला रह जाए।

आखिर जीवन में घर कितना भी फर्निश्ड क्यों न हो, घर तभी घर लगता है जब उसमें कोई अपना बिना बुलाए भी आ सके।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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