राजकुमार कुम्भज की तीन कविताऍं
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1.
जो अभी तक हुआ नहीं.
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जो अभी तक हुआ नहीं
कल तक हो जाएगा,कहा सभी ने
और फिर सुना सभी ने,सुना मैंने भी
कल होगा कल,ये सच जानते हैं सभी
कल कभी होता नहीं है,जानते हैं सभी
जानता हूॅं मैं भी कि होता नहीं है कल
जब सब जानते हैं और जानता हूॅं मैं भी
कि कल कभी होता ही नहीं है कल कभी
तो फिर इस महामक्कार कल के विरुद्ध
शुरू क्यों नहीं करते हैं सब सभी महायुद्ध
फ़ैसले में फ़ासलों का आख़िर सबब क्या
फ़ासलों के फ़ैसले में आख़िर इंतज़ार क्या
कल-कल कहने से कब बदली है सूरत
इंतज़ार में जाने से बढ़ते हैं दायरे शक़ के
सूने में सुनाई दे रही है झिगुॅंरों की आवाज़
झिगुॅंर ही मचा रहे हैं शोर चौतरफ़ा
झिगुॅंर ही हो रहे हैं बहुमुखी शासक भी
झिगुॅंर कर रहे हैं वह सब जो है निषिद्ध
देखते ही देखते है सब हो रहा है ध्वस्त
जो अभी तक हुआ नहीं.
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2
प्रेम-बिछात.
बढ़ती जा रही हैं स्वीकृतियाॅं
बातें भी हो रही हैं,कुछ अच्छा है,बुरा है
थोड़ा आगे-पीछे चल रहा है सोचने में
ख़बर नहीं है कि खाता-पीता क्या है
वह आर्टिफ़िशियल है,इंटिलिजेंट भी है
अर्थात् बनावटी भी और बुद्धिमान भी
कहीं मार्गदर्शक-मंडल का सदस्य तो नहीं
क्या ये संभव है कि जो है,वह है नहीं
और जो है वह बच रहता है दिखाई देने से
जैसे क्राॅंतिवीर की जगह क्राॅंतिवीर नहीं है
नाना पाटेकर है वह जो कि है अभिनेता
है प्रतिबद्ध है पारदर्शिता की पक्षधरता में
क्या मिट्टी का पुतला भी कुछ सोचता है
क्या वह रात को दिन बना सकता है
सोचता हूॅं,तृष्णा का तृप्ति में बदल जाना
और यहीं-कहीं गुज़रे वक़्त का लौट आना
वाक़ई होगा किसी आश्चर्य जैसा गुज़रना
क़माल है यही कि कहीं कोई सवाल नहीं
और कहीं किसी को कोई मलाल भी नहीं
धीरे-धीरे कटते जा रहे हैं पॅंख सपनों के
विवशता नहीं है किसी चिड़िया का उड़ना
खुले आसमान का खुलापन जानती है वह
सरल है समस्या का सरलीकरण करना
लेकिन ऑंखें फूटेंगी मेरी तो अंधा हुआ मैं
फिर जगतभर की रोशनी का सवाल क्या
साक्षात हो सकता है धोखेबाज़ ईश्वर भी
प्रेम-बिछात का सूखना क्या,खिलना क्या
जब टूटेंगे,तब देखेंगे तमाशा.
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3.
कल अच्छा नहीं था बीता.
कल अच्छा नहीं था बीता
फिर भी शुरूआत अच्छी रही,कहना था
ज़ाहिर है कि कल रात थी,घुप्प अंधेरा था
आज दिन है,उजाला है,थोड़ा भरोसा है
दोपहर धूप में जब निकलता हूॅं घर से
तो मेरे साथ-साथ चलती है परछाई भी
कल रात में सिर्फ़ रात थी और था अंधेरा
अंधेरे में सिर्फ़ एक ही आवाज़ थी अकेली
जो टकराते हुए लौटती थी,गूॅंजती थी
आवाज़ मेरी भी हो सकती थी,अन्य भी
पता लगाना ज़ुर्म था,मुश्किल था जीवन
पहचान लिए जाने की गहरी पहरेदारी थी
शीशे के घर थे चहुॅंओर,पत्थर थे हाथों में
और थी दोनों के टकराने पर सख़्त पाबंदी
ऑंखें थीं कि खुली रहती थीं सामान्यत:
लूट-खसोट,चोरी-डकैती भी थी जारी
थी ये शर्त भी कि शिक़ायत नहीं करे कोई
अपने तरीक़ों से प्रायःजीना चाहते थे लोग
बचाते थे,छुपाते थे,छोटी-छोटी सच्चाइयाॅं
मगर वहाॅं अफ़सोस था कि थी अफ़वाह
क़त्लेआम था शब्दों की दुनिया में निरंतर
कल अच्छा नहीं था बीता.
