कविता
चुप
डा.रमेश कुमार
चुप बैठी चुप
कभी भी चुप नहीं होती ।
चुप्पी
बहुत कुछ बोलती है – भीतर ही भीतर
अपने भीतर ।
चुप की बहुत परतें होती हैं
-परत-दर-परत।
चुप की
सबसे निचली परत को सुनने की आवश्यकता होती है
-किसी पहाड़ी चश्में की तरह
चश्मा
जो पथरीली धरतीओं का सीना चीर कर निकलता
उछलती लहरें
बन जाती दरिया ।
चुप बैठी
कोई भी कौम
कभी-भी चुप नहीं होती ।
