डा. रमेश कुमार की कविता – चुप

कविता

चुप

डा.रमेश कुमार

चुप बैठी चुप
कभी भी चुप नहीं होती ।
चुप्पी
बहुत कुछ बोलती है – भीतर ही भीतर
अपने भीतर ।
चुप की बहुत परतें होती हैं
-परत-दर-परत।
चुप की
सबसे निचली परत को सुनने की आवश्यकता होती है
-किसी पहाड़ी चश्में की तरह
चश्मा
जो पथरीली धरतीओं का सीना चीर कर निकलता
उछलती लहरें
बन जाती दरिया ।
चुप बैठी
कोई भी कौम
कभी-भी चुप नहीं होती ।
पंजाबी से अनुवाद
-प्रि.उर्मिल मोंगा, इंजी. गुरजिन्दर सिंह बड़ाना

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