किताब के विरुद्ध खड़ा डमरू
रत्ना भदौरिया
हमारे समय का सबसे तीखा व्यंग्य शायद यही है—भविष्य बनाना है तो किताब छोड़ो, डमरू संभालो। डमरू की थाप पर उत्सव है, फूल हैं, स्वीकृति है; लेकिन शिक्षा, रोजगार और अधिकार की बात आते ही वही लोकतांत्रिक व्यवस्था असहज दिखाई देने लगती है।
यह विरोधाभास केवल भाषा का व्यंग्य नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति का संकेत है जिसमें नागरिक के प्रश्न से अधिक उसके समर्थन का मूल्य तय होने लगता है।
किताब का स्वभाव ही प्रश्न करना है। वह पूछती है—शिक्षित युवाओं के लिए रोजगार कहाँ है? शिक्षा लगातार महँगी क्यों होती जा रही है? सरकारी शिक्षण संस्थानों की स्थिति क्या है?
प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार होने वाली अव्यवस्थाओं की जवाबदेही किसकी है? और नागरिक अपने अधिकारों की बात करे तो उसके साथ संवाद होगा या दमन?
इन प्रश्नों का कोई धार्मिक या सांस्कृतिक विकल्प नहीं हो सकता।
डमरू संस्कृति का प्रतीक हो सकता है, आस्था का हिस्सा हो सकता है, उत्सव का माध्यम हो सकता है; लेकिन उसे शिक्षा, रोजगार और नागरिक अधिकारों का राजनीतिक विकल्प बना देना मूल प्रश्न से ध्यान हटाना है।
सबसे गंभीर स्थिति तब बनती है जब सत्ता के अनुकूल प्रदर्शन को राष्ट्रभक्ति और असहमति को अव्यवस्था के चश्मे से देखा जाने लगे। तब नागरिक की योग्यता से अधिक उसकी निष्ठा महत्वपूर्ण हो जाती है और प्रश्न पूछने की क्षमता धीरे-धीरे राजनीतिक असुविधा में बदल दी जाती है।
लाठी किसी आंदोलन को कुछ समय के लिए रोक सकती है, लेकिन वह उस प्रश्न का उत्तर नहीं होती जिसके कारण आंदोलन पैदा हुआ।
यही इस पूरे परिदृश्य का सबसे कठोर तथ्य है—बेरोजगार युवा को प्रतीक दिया जा सकता है, लेकिन रोजगार नहीं; महँगी शिक्षा के बीच नारा दिया जा सकता है, लेकिन अवसर नहीं; अधिकार मांगने वाले नागरिक को व्यवस्था का अनुशासन समझाया जा सकता है, लेकिन उसके प्रश्न का उत्तर नहीं।
फिर सवाल डमरू का नहीं रहता।
सवाल यह हो जाता है कि जिस व्यवस्था के पास शिक्षा और रोजगार के प्रश्नों के लिए पर्याप्त उत्तर नहीं हैं, उसके पास प्रदर्शन और असहमति को नियंत्रित करने के लिए इतने उत्तर कहाँ से आते हैं?
यहीं किताब और डमरू के बीच का वास्तविक अंतर दिखाई देता है—
एक प्रश्न पैदा करता है, दूसरा केवल शोर।
