जन्मदिन पर विशेष
राजेन्द्र राजन : गीत को जन-जन की संवेदना बनाने वाले शब्द-साधक
राजेन्द्र शर्मा
हिंदी गीत परंपरा में राजेन्द्र राजन ऐसे नायाब गीतकार है जो केवल गीत नहीं लिखते, बल्कि अपनी संवेदनाओं से समय की धड़कनों को शब्द देते हैं। राजेन्द्र राजन ने चार दशकों से अधिक समय तक हिंदी गीत को मंचों, पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी और दूरदर्शन के माध्यम से व्यापक पहचान दिलाई। उनके गीतों में प्रेम की कोमलता, विरह की टीस, मानवीय संबंधों की ऊष्मा और जीवन-दर्शन की सहज अभिव्यक्ति एक साथ दिखाई देती है।
9 अगस्त 1952 को उत्तर प्रदेश के शामली जनपद के एलम कस्बे में जन्मे राजेन्द्र राजन ने साहित्यिक संस्कारों को बचपन से ही आत्मसात कर लिया था। किशोरावस्था में ही उन्होंने लेखन प्रारम्भ कर दिया। स्वयं उनके अनुसार, 24 जून 1969 की रात हरिद्वार के गंगा तट पर बैठकर उन्होंने अपना पहला गीत लिखा, जिसने आगे चलकर उनके रचनात्मक जीवन की दिशा निर्धारित की।
आजीविका के लिए राजेन्द्र राजन स्टार पेपर मिल, सहारनपुर में वेलफेयर ऑफिसर के पद पर कार्यरत रहे, लेकिन उनका वास्तविक परिचय साहित्य था। नौकरी और साहित्य के बीच उन्होंने ऐसा संतुलन बनाया कि दोनों क्षेत्रों में समान निष्ठा के साथ कार्य किया। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपना लगभग पूरा समय साहित्य को समर्पित कर दिया।
राजेन्द्र राजन का रचनात्मक संसार अत्यंत व्यापक था। उनके चर्चित गीत-संग्रह ‘पतझर–पतझर, सावन–सावन’, ‘केवल दो गीत लिखे मैंने’ और ‘खुशबू प्यार करती है’ पाठकों के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय रहे। उनकी ग़ज़ल-संग्रह ‘मुझे आसमान देकर’ ने भी उनके बहुआयामी रचनाकार व्यक्तित्व को स्थापित किया।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी—सरल भाषा में गहरी अनुभूति। वे शब्दों का अनावश्यक वैभव नहीं रचते थे। उनके गीत सीधे हृदय तक पहुँचते थे। प्रेम उनके यहाँ केवल निजी अनुभूति नहीं, बल्कि मनुष्य की करुणा, विश्वास और आत्मीयता का विस्तार बन जाता है। इसी कारण उनके अनेक गीत मंचों पर श्रोताओं की जुबान पर चढ़ गए। उनका प्रसिद्ध गीत—
“मैं रात-रात भर जगा तुम्हें भुलाने के लिए,
मैं पात-पात झर गया बसंत लाने के लिए।”
—हिंदी गीत परंपरा की चर्चित पंक्तियों में गिना जाता है।
सन् 1977 से उन्होंने देश के प्रतिष्ठित कवि सम्मेलनों में नियमित काव्यपाठ किया। लाल किला, राष्ट्रपति भवन सहित अनेक राष्ट्रीय मंचों पर उनके गीत गूँजे। आकाशवाणी और दूरदर्शन के विभिन्न केंद्रों से भी उनकी रचनाओं का प्रसारण होता रहा। ऐसे समय में, जब मंचीय कविता में हास्य और तात्कालिकता का प्रभाव बढ़ रहा था, राजेन्द्र राजन ने गीत विधा की गरिमा को बनाए रखा।
राजेन्द्रक राजन को साहित्य जगत में अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने उन्हें ‘साहित्य भूषण’ सम्मान से अलंकृत किया। इसके अतिरिक्त साहित्य श्री, महादेवी वर्मा पुरस्कार, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर स्मृति पुरस्कार, विद्यापति पुरस्कार, महाकवि नीरज सम्मान, तुलसी माखन सम्मान और अनेक अन्य सम्मानों ने उनके रचनात्मक अवदान को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया।
राजेन्द्र राजन केवल लोकप्रिय गीतकार ही नहीं, बल्कि हिंदी भाषा के सजग प्रहरी भी थे। वे मानते थे कि मातृभाषा का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा जब नई पीढ़ी को प्रारंभिक शिक्षा से ही हिंदी के प्रति आत्मीयता विकसित करने का अवसर मिले। हिंदी के प्रचार-प्रसार को वे सांस्कृतिक दायित्व मानते थे।
15 अप्रैल 2021 को उनके निधन के साथ हिंदी गीत-जगत ने अपनी एक मधुर, संवेदनशील और गरिमामयी आवाज़ खो दी। उनके निधन पर देशभर के साहित्यकारों ने उन्हें स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने मंचीय कविता में गीत की गरिमा को जीवित रखा। ओज कवि डॉ. हरिओम पंवार ने उन्हें “सरल, सहज और सुरीले गीतकार” कहा, जबकि उर्दू के वरिष्ठ शायर वसीम बरेलवी ने उन्हें रिश्तों और प्रेम के गीतों का सच्चा कवि बताया।
आज जब हिंदी कविता निरंतर नए प्रयोगों से गुजर रही है, तब राजेन्द्र राजन के गीत यह स्मरण कराते हैं कि साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संवेदना है। उन्होंने सिद्ध किया कि गीत केवल गाए जाने के लिए नहीं होते, बल्कि वे मनुष्य के भीतर आशा, प्रेम और विश्वास को जीवित रखने का माध्यम भी होते हैं। इसी कारण राजेन्द्र राजन का नाम हिंदी गीत परंपरा में एक ऐसे रचनाकार के रूप में आदरपूर्वक लिया जाएगा, जिसने शब्दों को संगीत और संवेदना दोनों का स्वर प्रदान किया।
