कुर्सी के नीचे दबा हुआ लोकतंत्र

कुर्सी के नीचे दबा हुआ लोकतंत्र

रत्ना भदौरिया

 

बासाहेब से शिकायत है—आखिर यह कैसा लोकतंत्र है, जिसमें जनता अपने वोट से किसी को सत्ता की गाड़ी पर बैठाती है और वही गाड़ी लौटकर जनता को ही रास्ते से हटाती हुई निकल जाती है? जिस उँगली की स्याही सत्ता की पहचान बनती है, उसी उँगली का मालिक सत्ता के सामने इतना असहाय क्यों हो जाता है कि कभी उसे जुमलों से बहलाया जाता है और कभी किसी काफिले के पहिए उसकी आवाज तक कुचल देते हैं? सबसे बड़ा दुख यह नहीं कि जनता सड़क पर कुचलती है; दुख यह है कि उसके बाद भी कुर्सी अपनी जगह अडिग रहती है।

बाबासाहेब ने लोकतंत्र को केवल वोट का अधिकार नहीं, मनुष्य की गरिमा का विधान माना था। मगर हमने शायद वोट को सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी और नागरिक को उस सीढ़ी के बाद भूल जाने वाली वस्तु बना दिया है। चुनाव के समय जनता सर्वोच्च होती है, उसके बाद वही जनता सुरक्षा घेरे के बाहर खड़ी दिखाई देती है। उसके सवालों के सामने भाषण हैं, उसकी पीड़ा के सामने आश्वासन हैं और उसके हिस्से में फिर वही इंतजार—किसी अगले चुनाव का, किसी अगले वादे का, किसी अगले जुमले का।

यह कैसी विडंबना है कि जनता सत्ता को चलाने के लिए वोट देती है, लेकिन सत्ता को रोकने के लिए उसके पास अक्सर केवल अपनी आवाज बचती है; और जब आवाज भी सायरन के शोर में दब जाए, तब लोकतंत्र का सबसे जरूरी प्रश्न जन्म लेता है—सत्ता आखिर किसकी सुरक्षा के लिए है?

कुर्सी जनता से बनती है, मगर कुर्सी पर बैठते ही जनता से दूरी क्यों बनने लगती है? क्या सत्ता मिलते ही नागरिक का महत्व समाप्त हो जाता है? क्या लोकतंत्र में प्रतिनिधि को रास्ता और जनता को केवल किनारा मिलता है?

बाबासाहेब को स्मरण करने का अर्थ केवल उनकी तस्वीर के सामने सिर झुकाना नहीं है; असली स्मरण तो तब होगा, जब सत्ता के पहिए यह याद रखें कि सड़क उनकी नहीं, जनता की है—और कुर्सी पर बैठा व्यक्ति मालिक नहीं, जनता का प्रतिनिधि है।

क्योंकि जिस दिन जनता के वोट से निकली गाड़ी उसी जनता को कुचलकर भी अपनी यात्रा जारी रखे और कुर्सी पर कोई कंपन न आए, उस दिन चोट केवल किसी व्यक्ति को नहीं लगती—लोकतंत्र की आत्मा पर पहिया चढ़ता है।

रत्ना भदौरिया के फेसबुक वॉल से साभार

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