भगवान भी मेरे-तुम्हारे में बंटे!
माफी के बाद भी सवाल कायम
धार्मिक व्याख्या के पीछे कौन-सा राजनीतिक संदेश?
ओमप्रकाश तिवारी
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने भगवान राम और श्रीकृष्ण की तुलना करते हुए कहा कि हमारे वाले भगवान सीधे हैं और तुम्हारे वाले टेढ़े। विवाद बढ़ा तो माफी मांग ली। लेकिन क्या माफी मांग लेने से उस बयान का राजनीतिक और सामाजिक संदेश भी खत्म हो जाता है? उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इस पूरे घटनाक्रम को समझने की जरूरत है।
धर्म का उद्देश्य मनुष्य को जोड़ना है, लेकिन जब धर्म की व्याख्या ही विभाजन की भाषा बोलने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है। बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की हालिया टिप्पणी इसी सवाल को सामने लाती है।
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा में रामकथा के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने भगवान राम और श्रीकृष्ण के स्वरूप की तुलना करते हुए कहा कि हमारे वाले भगवान सीधे खड़े होते हैं, जबकि तुम्हारे वाले तीन जगह से टेढ़े खड़े होते हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण की त्रिभंग मुद्रा और बांसुरी बजाने की शैली का मजाकिया अंदाज में उल्लेख किया।
यहां गौर करने वाली बात सिर्फ राम और कृष्ण की तुलना नहीं है। उनके संबोधन में इस्तेमाल किए गए ‘हमारे वाले’ और ‘तुम्हारे वाले’ जैसे शब्द हैं। ये शब्द दो आराध्यों के बीच तुलना से आगे बढ़कर भक्तों को भी दो खेमों में खड़ा करने का अर्थ पैदा करते हैं।
भगवान राम और श्रीकृष्ण भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में समान रूप से पूजनीय हैं। दोनों को एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा करने की जरूरत आखिर क्यों पड़नी चाहिए?
(संदर्भ: अमर उजाला की 3 नवंबर 2026 की रिपोर्ट और द प्रिंट की भाषा रिपोर्ट।
माफी मांग ली, लेकिन सवाल अपनी जगह है
विवाद बढ़ा तो धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने वीडियो जारी कर सफाई दी और माफी मांगी। उन्होंने कहा कि उनकी बात का आशय भगवान राम और श्रीकृष्ण में अंतर बताना नहीं था। वह भावावेश में कही गई बात थी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनकी व्याख्या से किसी को ठेस पहुंची है तो वह क्षमा चाहते हैं।
उनकी माफी को दर्ज किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति को अपनी बात स्पष्ट करने और गलती महसूस होने पर क्षमा मांगने का अधिकार है।
लेकिन इस पूरे प्रकरण का एक दूसरा पहलू भी है। सार्वजनिक जीवन में किसी प्रभावशाली व्यक्ति के बयान का महत्व केवल उसकी बाद की सफाई से तय नहीं होता। यह भी देखना पड़ता है कि बयान किस मंच से दिया गया, उसमें कौन-सी भाषा इस्तेमाल हुई और उसका सामाजिक प्रभाव क्या हुआ।
माफी से विवाद का एक हिस्सा समाप्त हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक मंच से दिए गए संदेश के प्रभाव को स्वतः समाप्त नहीं माना जा सकता।
यही इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
धार्मिक व्याख्या से राजनीतिक संदेश तक
इस घटनाक्रम को उत्तर प्रदेश की राजनीति से अलग करके देखना भी उचित नहीं होगा। 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और प्रदेश की राजनीति में धार्मिक पहचान, जातीय समीकरण तथा हिंदू एकजुटता का सवाल लगातार चर्चा में है।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का राजनीतिक बयानों से जुड़ाव भी नया नहीं है। नवंबर 2024 में उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ नारे का समर्थन किया था। उन्होंने इस नारे की व्याख्या करते हुए चीन और पाकिस्तान का संदर्भ दिया था।
इसलिए जब आज उनकी धार्मिक व्याख्या में ‘हमारे भगवान’ और ‘तुम्हारे भगवान’ का विभाजन दिखाई देता है तो उसके राजनीतिक निहितार्थों पर चर्चा होना स्वाभाविक है।
यहां एक बड़ा विरोधाभास भी है।
एक तरफ राजनीतिक मंचों से कहा जाता है कि हिंदू समाज जातियों में न बंटे। दूसरी तरफ धार्मिक पहचान के नाम पर समाज को एक खास राजनीतिक पहचान में समेटने की कोशिश दिखाई देती है। इस प्रक्रिया में दूसरे धर्मों के प्रति दूरी और धार्मिक श्रेष्ठता का भाव भी पैदा हो सकता है।
‘बटोगे तो कटोगे’ का नारा इसी तरह की एकजुटता की राजनीतिक अपील करता है। लेकिन सवाल यह है कि एकजुटता का आधार क्या हो? समान नागरिकता, संवैधानिक अधिकार और सामाजिक न्याय या धार्मिक पहचान के आधार पर दूसरे समुदायों से दूरी?
राजनीतिक आका और धार्मिक मंचों का इस्तेमाल
इस प्रकरण का एक राजनीतिक पक्ष और भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके राजनीतिक आकाओं को यह सब मंजूर होगा, लेकिन उन्हें यह तनिक भी स्वीकार्य नहीं है। 
यहां राजनीतिक आकाओं की भूमिका का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।
यह कहना कि किसी खास राजनीतिक नेतृत्व ने धीरेंद्र शास्त्री से यह बयान दिलवाया, उसके लिए प्रत्यक्ष प्रमाण चाहिए। अभी ऐसा प्रमाण सामने नहीं है लेकिन व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह सवाल जरूर उठता है कि धार्मिक मंचों से बार-बार ऐसी भाषा क्यों सामने आती है, जो समाज को धार्मिक पहचान के आधार पर विभाजित करती है और राजनीतिक ध्रुवीकरण की जमीन तैयार कर सकती है।
जिन राजनीतिक शक्तियों की राजनीति में धार्मिक पहचान और बहुसंख्यक एकजुटता का आग्रह प्रमुखता से दिखाई देता है, उनके लिए ऐसे संदेश राजनीतिक रूप से उपयोगी हो सकते हैं। यह राजनीतिक प्रक्रिया का विश्लेषण है, किसी गुप्त निर्देश या सौदे का प्रमाणित दावा नहीं।
राजनीतिक नेतृत्व एक तरफ सामाजिक एकता की बात करता है, लेकिन दूसरी तरफ ऐसी भाषा और ऐसी व्याख्याओं को लेकर स्पष्ट असहमति जताने के बजाय कई बार उन्हें राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने देता है।
इसलिए सवाल सिर्फ कथावाचक से नहीं, उस राजनीतिक वातावरण से भी है जिसमें इस तरह की धार्मिक व्याख्याओं को जगह और महत्व मिलता है।
क्या माफी राजनीतिक संदेश को वापस ले सकती है?
इस सवाल पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
किसी प्रभावशाली धार्मिक वक्ता के लाखों अनुयायी होते हैं। उसके शब्द सामान्य बातचीत के शब्द नहीं रह जाते। वे धार्मिक विश्वास, सामाजिक धारणाओं और राजनीतिक सोच को प्रभावित कर सकते हैं।
विवाद होने पर माफी मांग लेना अच्छी बात है। लेकिन यह भी सच है कि बयान सार्वजनिक मंच से लाखों लोगों तक पहुंच चुका होता है। उसके बाद आने वाली सफाई उन सभी लोगों तक उसी प्रभाव के साथ पहुंचे, यह जरूरी नहीं।
इसलिए यह आशंका निराधार नहीं है कि विवादित बयान से जो राजनीतिक संदेश जाना था, वह माफी आने से पहले ही अपने लक्षित श्रोताओं तक पहुंच चुका हो सकता है। हालांकि, इसे वक्ता की पूर्वनियोजित मंशा मानने के लिए अलग प्रमाण चाहिए।
असली सवाल समाज के सामने है
भारत की धार्मिक परंपरा में विविधता और अनेक आराध्यों की स्वीकृति रही है। एक ही परिवार में अलग-अलग देवी-देवताओं के उपासक हो सकते हैं। रामभक्त कृष्ण को भी पूजते हैं और कृष्णभक्त राम को भी। यह भारतीय समाज की धार्मिक विविधता का हिस्सा है।
ऐसे समाज में भगवान को ‘हमारे’ और ‘तुम्हारे’ में बांटने वाली भाषा किस तरह की धार्मिक चेतना विकसित करेगी?
और इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जो लोग समाज को बांटने से बचाने के नाम पर राजनीतिक नारे देते हैं, वे धार्मिक मंचों से पैदा होने वाले ऐसे विभाजनकारी संदेशों पर क्या रुख अपनाते हैं?
उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव नजदीक है। ऐसे में धार्मिक आयोजनों, कथावाचकों के बयानों और राजनीतिक विमर्श के आपसी संबंधों की पड़ताल जरूरी है।
धर्म के नाम पर राजनीतिक एकजुटता की अपील करना एक बात है और धार्मिक आस्था के भीतर ही विभाजन पैदा करना दूसरी बात। भगवान राम और श्रीकृष्ण को एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा करने से किसी धर्म का गौरव नहीं बढ़ता। सवाल यह है कि आखिर भगवान को भी राजनीतिक खेमों में बांटने की जरूरत किसे पड़ रही है?
–
