राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं
1.
असमान गुज़र गया जीवन
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बीत गया बहुत कुछ बीत गया
मौसम भी बदलते गए तमाम धीरे-धीरे
शेष मुखौटे भी बचे नहीं शेष फिर कहीं
सच कहते शेष रह गईं ज़ुबानें सबकी शेष
झूठ सुनते-सुनते पत्थर हो गये कान तक
ऊॅंचाइयों पर टॅंगा रह गया आसमान
असमान गुज़र गया जीवन.
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2.
समय हुआ मैं सो गया
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सोचा था कभी ये भी था सोचा
कि जीवन में जीवन की निरंतरता होगी
और उस निरंतरता में थोड़ी कविता होगी
कविता में फिर कविता जैसा जीवन होगा
और जीवन में जीवन जैसी कविता होगी
जो था सब कुछ उलट-पलट हो गया
समय हुआ मैं सो गया.
