जाति और राजनीति: पंजाब की राजनीति में कंबोजों की भूमिका (सन् 1947– सन्2026)

जाति और राजनीति: पंजाब की राजनीति में कंबोजों की भूमिका ( 1947– 2026)

  • एक व्यवस्थित अध्ययन और समीक्षा

डॉ रामजीलाल

पंजाब की स्वतंत्रता के बाद की राजनीति को जाति, समुदाय, कृषि हितों और राजनीतिक दलों के पारस्परिक संबंधों को समझे बिना पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। कंबोज समुदाय पंजाब के महत्वपूर्ण कृषि समुदायों में से एक रहा है और इसकी राजनीतिक उपस्थिति कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल, आम आदमी पार्टी, भाजपा तथा अन्य राजनीतिक धाराओं में दिखाई देती है। हालांकि कंबोज राजनीतिक इतिहास को केवल निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या तक सीमित करना उचित नहीं होगा। इसमें स्वतंत्रता आंदोलन, गुरुद्वारा सुधार आंदोलन, किसान संगठनों, स्थानीय संस्थाओं और बदलते चुनावी गठबंधनों में भागीदारी भी शामिल है।

यहां एक महत्वपूर्ण पद्धति गत बात ध्यान देने योग्य है। केवल “कंबोज ‘’उपनाम के आधार पर राजनीतिक नेताओं की खोज करने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। अनेक नेताओं ने अलग उपनामों का प्रयोग किया, जबकि कुछ ऐतिहासिक और सामुदायिक स्रोत नेताओं की पहचान उनके परिवार, सामाजिक पृष्ठभूमि या क्षेत्रीय संबंधों के आधार पर करते हैं। इसलिए कंबोजों की राजनीतिक भूमिका का अध्ययन चुनावी रिकॉर्ड, समकालीन समाचार-पत्रों और ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर किया जाना चाहिए।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विभाजन के बाद

कंबोज राजनीतिक भागीदारी की जड़ें स्वतंत्रता से पहले की राजनीति में मिलती हैं। कंबोजों ने स्वतंत्रता आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों, गुरुद्वारा सुधार आंदोलन, अकाली राजनीति, किसान आंदोलनों, समाजवादी और कम्युनिस्ट गतिविधियों तथा सशस्त्र सेनाओं में योगदान दिया। समाज वीकली यूके द एशियन इंडिपेंडेंट यूके, और प्रतिबिम मीडिया में प्रकाशित हालिया ऐतिहासिक अध्ययनों में सिख और मुस्लिम दोनों कंबोज /कम्बोह समुदायों की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका का उल्लेख मिलता है।

विभाजन ने इस समुदाय के सामाजिक और राजनीतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। अनेक मुस्लिम कंबोज /कम्बोह परिवार पूर्वी पंजाब से पाकिस्तान चले गए, जबकि सिख और हिंदू कंबोज परिवार पश्चिमी पंजाब से भारत आए। भारतीय पंजाब में कंबोज समुदाय ने अनेक कृषि-प्रधान जिलों में अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को पुनर्गठित किया। हरित क्रांति के विस्तार के साथ कृषि आधारित समुदायों का आर्थिक और राजनीतिक महत्व भी बढ़ा।

कृषि समाज से चुनावी राजनीति तक:

स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दशकों में कंबोज राजनीतिक भागीदारी पंचायतों, सहकारी संस्थाओं, मार्केट कमेटियों, स्थानीय निकायों और प्रमुख राजनीतिक दलों के माध्यम से विकसित हुई। कांग्रेस एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मंच रही, जबकि अकाली आंदोलन ने विशेष रूप से उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जहां कृषि, सिख पहचान और पंजाब के क्षेत्रीय प्रश्न आपस में जुड़े हुए थे।

मुख्य विधायक प्रतिनिधि:

हिंदू, सिख और मुस्लिम कंबोज समुदायों के मुख्य विधायक प्रतिनिधि हैं: एस. साधु सिंह, एस. आत्मा सिंह, एस. बलवंत सिंह, एस. गुर्जर सिंह, बीबी उपेंद्र जीत कौर, श्री मदन लाल जलालपुर, एस. राजेंद्र सिंह, एस. हरदयाल सिंह कंबोज, हंसराज जोशन, और अभी गोल्डी कंबोज, विधायक जलालाबाद, और मोहम्मद जमील-उर-रहमान, विधायक मालेर कोटला।

शुरुआती दशकों के दौर के वरिष्ठ अकाली नेताओं में सरदार आत्मा सिंह का उल्लेख किया जा सकता है, जो पंजाब के मंत्री और महत्वपूर्ण अकाली नेता रहे। बाद में उनकी पुत्री डॉ. उपिंदर जीत कौर ने पंजाब की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सुल्तानपुर से विधानसभा का प्रतिनिधित्व किया।

बलवंत सिंह और अकाली राजनीतिक परंपरा

बलवंत सिंह, वरिष्ठ अकाली नेता और पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री, अकाली राजनीति के एक महत्वपूर्ण दौर का प्रतिनिधित्व करते हैं। सन् 1980 के दशक में पंजाब संकट के दौरान वे उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने राजनीतिक समाधान के लिए वार्ताओं में भूमिका निभाई। समकालीन विवरणों के अनुसार, संत हरचंद सिंह लोंगोवाल और सुरजीत सिंह बरनाला के साथ बलवंत सिंह ने सन् 1985 के राजीव–लोंगोवाल समझौते की दिशा में चलने वाली वार्ताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

किसी एक व्यक्ति को समझौते का अकेला “मस्तिष्क” कहना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा, क्योंकि वार्ताओं में अनेक नेता और केंद्र सरकार शामिल थे। फिर भी बलवंत सिंह की भूमिका यह दर्शाती है कि पंजाब के वरिष्ठ अकाली नेतृत्व में कंबोज राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी मौजूद था।

डॉ. उपिंदर जीत कौर: महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व

कंबोजों के राजनीतिक इतिहास में डॉ. उपिंदर जीत कौर का स्थान विशेष महत्व रखता है। उन्होंने सुल्तानपुर का प्रतिनिधित्व किया और पंजाब सरकार में विभिन्न महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले। अक्टूबर 2010 में मंत्रिमंडल में फेरबदल के बाद उन्हें पंजाब का वित्त एवं योजना मंत्री बनाया गया।

उनका राजनीतिक जीवन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह कंबोज समुदाय की महिलाओं के उच्च स्तर की चुनावी और सरकारी राजनीति में प्रवेश को दर्शाता है। शिक्षा और अर्थशास्त्र की पृष्ठभूमि के साथ उन्होंने राज्य प्रशासन और वित्तीय नीति में भी भूमिका निभाई।

लाल सिंह और कांग्रेस की राजनीति

कांग्रेस में भी कंबोज समुदाय से महत्वपूर्ण राजनीतिक नेता उभरे। लाल सिंह, वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पंजाब के पूर्व मंत्री, लंबे समय तक राज्य की राजनीति में प्रभावशाली रहे। 2018 के शाहकोट उपचुनाव के दौरान द ट्रिब्यून ने उन्हें कांग्रेस के एक पूर्व कंबोज मंत्री के रूप में उल्लेखित किया, जिन्हें चुनाव प्रचार के लिए लगाया गया था। उसी रिपोर्ट में शाहकोट क्षेत्र में कंबोज मतदाताओं के महत्व का भी उल्लेख था।

यह उदाहरण बताता है कि पंजाब की राजनीति में जातीय पहचान अक्सर पार्टी विचारधारा के साथ-साथ काम करती रही है। विभिन्न दल स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कंबोज जाट सिख, दलित, वाल्मीकि और अन्य सामाजिक समूहों के बीच राजनीतिक गठबंधन बनाने का प्रयास करते रहे हैं।

हरदयाल सिंह कंबोज और राजपुरा

हरदयाल सिंह कंबोज समकालीन कांग्रेस राजनीति में समुदाय के प्रमुख प्रतिनिधियों में रहे। उन्होंने राजपुरा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और 2012 तथा 2017 में विधानसभा चुनाव जीते। विधायी रिकॉर्ड उन्हें राजपुरा से कांग्रेस विधायक के रूप में दर्ज करता है।

उनका राजनीतिक जीवन यह भी दिखाता है कि जाति को स्थायी चुनावी ब्लॉक मानना उचित नहीं है। सन् 2020–21 के किसान आंदोलन के दौरान भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस के कई नेताओं को भी किसानों के विरोध का सामना करना पड़ा। जून 2021 में बुधनपुर और अगस्त सन् 2021 में बनूड़ में हरदयाल सिंह कंबोज के विरुद्ध किसानों के प्रदर्शन की समकालीन रिपोर्टें प्रकाशित हुईं।

कंबोज और सन् 2020–21 का किसान आंदोलन

सन् 2020–21 का किसान आंदोलन पंजाब में जाति, कृषि हितों और चुनावी राजनीति के बदलते संबंधों को समझने का महत्वपूर्ण दौर था। पंजाब के ग्रामीण समाज के अन्य वर्गों की तरह कंबोज किसान भी तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ व्यापक किसान लामबंदी का हिस्सा बने। पंजाब से शुरू हुआ आंदोलन आगे चलकर दिल्ली की सीमाओं पर ऐतिहासिक किसान आंदोलन में बदल गया, जिसमें पंजाब और हरियाणा के किसानों की बड़ी भागीदारी रही।

इस आंदोलन ने यह भी दिखाया कि सामुदायिक पहचान हमेशा राजनीतिक व्यवहार निर्धारित नहीं करती। हरदयाल सिंह कंबोज के विरुद्ध किसानों के विरोध का उदाहरण महत्वपूर्ण है। किसान संगठनों ने विभिन्न दलों के नेताओं का विरोध किया, चाहे उनका सामाजिक आधार कुछ भी हो। इससे संकेत मिलता है कि किसान हित और कृषि संबंधी मुद्दे पारंपरिक जातीय तथा दलीय सीमाओं को पार कर सकते हैं। कंबोज राजनीति के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था—समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अब MSP, कृषि बाजार, भूमि, किसान आय और ग्रामीण आजीविका जैसे प्रश्नों के साथ जोड़कर देखना आवश्यक हो गया।

सी. डी. सिंह कंबोज और राजनीतिक परिवर्तनशीलता

कर्नल सी. डी. सिंह कंबोज राजनीतिक परिवर्तनशीलता का एक अन्य उदाहरण हैं। उन्होंने शाह कोट विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और बाद में शिरोमणि अकाली दल में शामिल हुए। उनका राजनीतिक सफर यह दर्शाता है कि कंबोज नेताओं की राजनीतिक निष्ठा किसी एक दल तक स्थायी रूप से सीमित नहीं रही। द ट्रिब्यून ने 2018 में उनके अकाली दल में शामिल होने की रिपोर्ट की थी।

आम आदमी पार्टी और जग दीप “गोल्डी” कंबोज

आम आदमी पार्टी के उदय ने पंजाब की राजनीति में एक नया राजनीतिक अवसर पैदा किया। जग दीप सिंह “गोल्डी” कंबोज इसका प्रमुख उदाहरण हैं। कांग्रेस की राजनीति से जुड़े रहने के बाद वे सन् 2020 में आम आदमी पार्टी में शामिल हुए और सन् 2022 में जलालाबाद से विधानसभा चुनाव लड़ा। उन्होंने शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल को पराजित कर विधानसभा में प्रवेश किया। समकालीन रिपोर्टों ने इस परिणाम को जलालाबाद की राजनीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के रूप में दर्ज किया।

उनका उदय यह दर्शाता है कि कंबोज राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल पारंपरिक दलों तक सीमित नहीं रहा। नई पीढ़ी के नेता नए राजनीतिक मंचों और स्थानीय मुद्दों के माध्यम से अपनी राजनीतिक जगह बना रहे हैं।

मुस्लिम कंबोज और मलेर कोटला

पंजाब के कंबोज राजनीतिक इतिहास में मुस्लिम कंबोज/ कम्बोह प्रतिनिधित्व को शामिल करना भी आवश्यक है। मलेर कोटला इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। चौधरी मोहम्मद जमील उर रहमान ने सन् 2022 में मलेर कोटला विधानसभा सीट जीती। सामुदायिक ऐतिहासिक स्रोत उन्हें मुस्लिम कंबोज के रूप में पहचानते हैं।

यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विभाजन ने एक ऐसे समुदाय को दो देशों में विभाजित कर दिया जिसकी सामाजिक उपस्थिति ऐतिहासिक पंजाब में व्यापक थी। मालेर कोटला में मुस्लिम कंबोज की राजनीतिक उपस्थिति यह दर्शाती है कि कंबोजों के इतिहास को केवल स्वतंत्रता के बाद के सिख कंबोज राजनीतिक संदर्भ तक सीमित नहीं किया जा सकता।

भाजपा, SGPC और व्यापक संस्थागत राजनीति

कंबोज राजनीतिक भागीदारी कांग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी से आगे भी दिखाई देती है। भाजपा में भी कंबोज राजनीतिक कार्यकर्ता और स्थानीय स्तर के नेता सक्रिय रहे हैं। हालांकि उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर पंजाब के मुख्यमंत्री या बड़ी संख्या में लोकसभा प्रतिनिधियों के स्तर पर कंबोज भाजपा नेतृत्व का दावा करना उचित नहीं होगा। इसी प्रकार SGPC के सर्वोच्च पदों पर कंबोज प्रतिनिधित्व के संबंध में व्यक्तिगत दावे केवल दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध होने पर ही किए जाने चाहिए।

इसके बावजूद गुरुद्वारा संस्थाओं, सहकारी संगठनों, स्थानीय निकायों, शैक्षणिक संस्थाओं और सामाजिक कल्याण संगठनों में भागीदारी ने समुदाय के राजनीतिक नेटवर्क को मजबूत किया है।

जाति, वर्ग, क्षेत्र और राजनीतिक विकल्प:

सन् 1947 से सन् 2026 तक कंबोज राजनीतिक अनुभव यह बताता है कि केवल जाति पंजाब के चुनावी व्यवहार की व्याख्या नहीं कर सकती। भूमि, वर्ग, धर्म, क्षेत्र, व्यवसाय, पार्टी संगठन और तत्कालीन कृषि हित सभी राजनीतिक विकल्पों को प्रभावित करते हैं।

शाह कोट में कंबोज मतदाताओं का महत्व दिखाई दिया। किसान आंदोलन ने पारंपरिक पार्टी और जातीय समीकरणों को चुनौती दी। जगदीप गोल्डी कंबोज का AAP के माध्यम से उदय राजनीतिक गतिशीलता को दिखाता है, जबकि कांग्रेस और अकाली दल में कंबोज नेताओं की उपस्थिति पुरानी राजनीतिक परंपराओं की निरंतरता को दर्शाती है।

यहां समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और समुदाय का सामूहिक मतदान दो अलग बातें हैं। किसी समुदाय से विभिन्न दलों के नेता निकल सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा समुदाय किसी एक दल के साथ स्थायी रूप से जुड़ा है।

निष्कर्ष:

सन् 1947 से सन् 2026 तक कंबोज राजनीतिक भागीदारी पंजाब के राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। समुदाय की राजनीतिक यात्रा पारंपरिक कृषि और कांग्रेस-अकाली नेटवर्क से निकलकर एक अधिक प्रतिस्पर्धी राजनीतिक व्यवस्था तक पहुंची है, जिसमें कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल, आम आदमी पार्टी, भाजपा और स्वतंत्र स्थानीय राजनीतिक धाराएं शामिल हैं।

बलवंत सिंह, डॉ. उपिंदर जीत कौर, लाल सिंह, हरदयाल सिंह कंबोज , जगदीप “गोल्डी” कंबोज और मोहम्मद जमील उर रहमान जैसे नेताओं के राजनीतिक जीवन इस यात्रा के विभिन्न चरणों को सामने रखते हैं। दूसरी ओर, सन् 2020–21 के किसान आंदोलन ने दिखाया कि कृषि और किसान हित पारंपरिक जातिय और दलीय सीमाओं को पार कर सकते हैं।

इसलिए पंजाब में कंबोज राजनीति को किसी एक स्थायी राजनीतिक निष्ठा की कहानी के रूप में नहीं, बल्कि कृषि पहचान, सामाजिक गतिशीलता, सामुदायिक प्रतिनिधित्व और बदलते राजनीतिक विकल्पों के इतिहास के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है। भविष्य में इस राजनीति का स्वरूप केवल जातिय गणित से नहीं, बल्कि कृषि, रोजगार, शिक्षा, ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय और पंजाब की बदलती राजनीतिक अर्थव्यवस्था जैसे प्रश्नों से भी निर्धारित होगा।

डॉ रामजीलाल,सामाजिक वैज्ञानिक व पूर्व प्राचार्य, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल (हरियाणा-भारत)।

 

3 thoughts on “जाति और राजनीति: पंजाब की राजनीति में कंबोजों की भूमिका (सन् 1947– सन्2026)”

  1. An insightful and academically significant study of the political trajectory of the Kamboj community in Punjab from Partition to the contemporary period.Sir,you have skillfully situated Kamboj political participation within the broader frameworks of caste, agrarian relations, regional politics, party dynamics and social mobility. The discussion of Congress, Akali Dal, AAP and the farmers’ movement demonstrates that community identity cannot be understood in isolation from changing socio-economic and political realities. Particularly noteworthy is the methodological emphasis on distinguishing community representation from uniform electoral allegiance. The article makes a valuable contribution to the understanding of Punjab’s complex political and agrarian history.
    Heartiest congratulations for this well -researched and valuable contribution
    With Warm Regards
    Dr Amol
    Assistant Professor of English
    Dyal Singh College
    Karnal (Haryana)

  2. I am delighted to share that the article on caste and politics is highly appreciated. Warm wishes

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