बैसाखी का त्यौहार : सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व   

 

बैसाखी का त्यौहार : सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व

डॉ. रामजीलाल

हिंदू धर्म: बैसाखी का त्यौहार:

हिंदू धर्म में बैसाखी प्राचीनतम त्योहार की श्रेणी में आता है .हिंदू परंपरा के अनुसार यह आदिकालीन त्योहार है. हिंदू धर्म की पौराणिक की मान्यताओं के अनुसार यह सौर कैलेंडर का प्रथम दिन है व हिंदू नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है. लगभग 3000 वर्ष पूर्व पौराणिक कालीन मान्यताओं के अनुसार राजा भागीरथ(मुनि भगीरथ) मुनि के रूप में कई वर्ष कठोर तपस्या के बाद गंगा नदी को पृथ्वी पर लेकर आए थे .क्योंकि इस दिन गंगा नदी अवतरण दिवस माना जाता है . इसलिए इस दिन लाखों की संख्या में भारत के विभिन्न भागों और विदेशों में रहने वाले प्रवासी हिंदू ,स्त्री, पुरुष व बच्चे हरिद्वार और ऋषिकेश में आकर स्नान करते हैं और अपने आप को धन्य समझते हैं.

कृषक व कृषि श्रमिक : उल्लास का दिवस

इस त्यौहार का कृषि, कृषक व कृषि श्रमिक से घनिष्ठ संबंध है. सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि इस दिन रबी की फसल-गेंहू,जौ, चना इत्यादि कटाई के लिए तैयार हो जाती है. बैसाखी के दिन  को शुभ दिन मान कर गेहूं की कटाई करना कृषक व श्रमिकों की खुशी का प्रतीक माना जाता है .इसलिए हरियाणा, पंजाब, दिल्ली , व उत्तर प्रदेश के कृषकों व कृषि श्रमिकों के लिए यह एक विशेष महत्व और हर्षो उल्लास का दिवस है तथा यह प्रसन्नता मानते हैं कि उनकी फसल पक गई है और वह प्राकृतिक आपदाओं से बची रही है. इस दिन परंपरा के रूप में फसल की कटाई की जाती है. इस दिन विशेष तौर से पंजाबी युवा किसान भांगड़ा डांस व युवतियां गिदा डांस करके हर्षो उल्लास मानते हैं.

सिख धर्म और बैसाखी

सिख धर्म में बैसाखी सबसे पूजनीय ,पवित्र व सर्वोतम त्योहार के रूप में मनाया जाता है .13 अप्रैल 1699 को आनंदपुर साहिब (पंजाब) में सिख धर्म के दसवें गुरु ,गुरू गोविंद सिंह ने पंज प्यारों(पांच प्रिय) को दीक्षा देकर सिख धर्म की स्थापना की थी. यह पंज प्यारे-(भाई दया सिंह (खत्री-लाहौर अब पाकिस्तान), भाई धर्म सिंह (जाट हस्तिनापुर (यू.पी.),भाई हिम्मत सिंह(झीउर- जगनाथपुरी-ओडिशा),भाई मोहकम सिंह (दर्जी-द्वारका-गुजरात),व भाई साहब सिंह(नाई-बीदर-कर्नाटक) विभिन्न क्षेत्रों व जातियों से सम्बंधित थे.बैसाखी के दिन गुरू गुरू गोविंद सिंह ने जब हिन्दू धर्म रक्षा हेतु पांच शीष मांगे तो यह पांचों बहादूर वफादार अनुयायी बिना विलम्ब तैयार हो गए.गुरूजी ने इनको अमृतपान कराया और सिंह उपाधि देकर सिख की एक विशेष पहचान निश्चित करते हुए पांच “क” – केस,कंघा,कड़ा,कछेरा व कृपाण धारण करने का संदेश दिया .इन के माध्यम से सिक्खों की अलग पहचान बन गई .यही कारण कि बैसाखी एक पवित्र त्यौहार के रूप में मनाया जाने लगा. सिख धर्म के अनुयायियों के द्वारा विभिन्न गुरुद्वारों में मथा टेक कर लोक नृत्य , भांगड़ा, गिद्दा, तथा ढोल नगाड़ों के साथ नगर कीर्तन निकला जाता है. . इसमें स्त्री- पुरुष , बच्चे- बुजुर्ग व युवक- युवतियां सभी भाग लेते हैं .नगर कीर्तन का नजारा ऐसा दिखाई देता जैसे पृथ्वी स्वर्ग का अवतरण हो गया हो.

भारत के भागों में बैसाखी का त्यौहार:

बैसाखी को भारत के विभिन्न भागों में अलग -अलग नाम से मनाया जाता है. उदाहरण के तौर पर उत्तराखंड में ‘बिखोती’ का महत्व है तथा उत्तराखंड के निवासी हरिद्वार व ऋषिकेश में गंगा नदी में स्नान को पवित्र मानते हैं.असम में ‘बोहाग’,’बिहू’, ‘रंगली बिहू’, ‘असमिया नव वर्ष’, व ‘बोहाग कैलेंडर’ के रूप में मनाया जाता है. बंगाल में 14 अप्रैल को ‘पाहेला बेसाख’ के रूप में मनाया जाता है तथा त्रिपुरा और बंगाल में शोभा यात्राएं भी निकली जाती हैं. तमिलनाडु में पुत्थांडु , पुथुवरूषम -तमिल नव वर्ष या तमिल कैलेंडर के रूप में इस त्योहार को मनाते हैं. बिहार और मिथिला क्षेत्र में इसे जुर शीतल के रूप में मनाया जाता है.

विदेशों में बैसाखी का त्यौहार

भारत के पड़ोसी मुल्कों-नेपाल,बांग्लादेशऔर पाकिस्तान में यह त्यौहार मनाया जाता है. पाकिस्तान में हजारों की संख्यां में भारत सहित अनेक देशों मे रहने वाले सिक्ख धर्म के अुनयायी गुरू नानक देव जी की जन्म स्थली ननकाना साहिब तथा पंजा साहिब गुरुद्वारों में शीश नवा कर बैसाखी मनाते हैं. इसके अतिरिक्त संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड ,ऑस्ट्रेलिया इत्यादि देशों में भी बैसाखी मनाई जाती है तथा इन देशों में भी गुरुद्वारों में माथा टेकने के पश्चात निशुल्क सेवा, नगर कीर्तन (आध्यात्मिक गीत ) लंगर तथा अन्य सेवाओं व परंपराओं का निर्वाह किया जाता है.

बैसाखी व जलियांवाला बाग : शहीद-ए-आजम उधम सिंह

बैसाखी के दिन (13 अप्रैल 1919) अमृतसर के जलियांवाला बाग में रॉलेट एक्ट का शांतिपूर्ण विरोध करने के लिए एक जनसभा आयोजित की गई जिसमें लगभग 20,000 व्यक्ति मौजूद थे. भारतीयों की आवाज को दबाने के लिए ब्रिगेडियर जनरल रिचार्ड डायर सैनिकों की टुकड़ी के साथ शाम को 5:15 पर घटना स्थल पर पहुंच गए और बिना किसी चेतावनी के गोली चलाने का आदेश दिया . परिणामस्वरूप 10 मिनट में 1650 राउंड की फायरिंग में अमृतसर के सिविल सर्जन डॉक्टर सुमित के अनुसार लगभग 1800 भारतीयों की जान चली गई. उधम सिंह वहां मौजूद थे और उन्होंने उस कसम उठाई कि वह प्रायोजित नरसंहार का बदला लेकर रहेगा. यद्यपि वह ब्रिगेडियर जनरल रिचार्ड डायर को मौत के घाट उतारना चाहता था परंतु उसकी मृत्यु 23जुलाई 1927 को हो चुकी थी. 13मार्च 1940 को कैक्सटन हॉल,लंदन में जब माइकल ओ’डॉयर एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे उधम सिंह ने उसको मौत के घाट उतार कर जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लिया और घटना स्थल से जान बचा कर भागने की अपेक्षा आत्मसम्पर्ण कर दिया. 31जुलाई 1940 को उधम सिंह माइकल ओ’डॉयर की हत्या के आरोप में फाँसी दे दी गई. सन् 1952 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उधम सिंह को सम्मानित करते हुए कहा, “मैं शहीद-ए-आजम उधम सिंह को श्रद्धापूर्वक सलाम करता हूँ, जिन्होंने फाँसी के फंदे को चूम लिया था ताकि हम आज़ाद हो सकें”. बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग नरसंहार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में क्रांतिकारी मोड लेकर आया.

बैसाखी और सर छोटू राम: दीनबंधु का सम्मान

सर छोटू राम का इतिहास में एक विशेष स्थान है, विशेषकर बैसाखी के मामले में.13 अप्रैल, 1938 को, उन्होंने बहुत सारी मुश्किलों को पार करते हुए 454,625 एकड़ खेती लायक सरकारी ज़मीन अनुसूचित जातियों को दिलवाई, जिससे वे सिर्फ़ 3 रुपये प्रति एकड़ की दर से ज़मीन के मालिक बन गए, 12 साल तक कोई ब्याज नहीं लगा, और यह ज़मीन चार आने (आज के 25 पैसे के बराबर) की सालाना किश्तों में देनी थी.

ज़मीन का यह बड़ा बंटवारा मुल्तान ज़िले में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है, और यह बैसाखी के दिन (13 अप्रैल, 1938) ही हुआ. उसी दिन, अनुसूचित जातियों के लोगों ने सर छोटू राम को हाथी पर बिठाकर एक शानदार जुलूस निकाला, जिसमें अलग-अलग जातियों के हज़ारों लोग शामिल हुए. इस जोशीले जमावड़े में, सर छोटू राम को ‘दीनबंधु’ की उपाधि दी गई, यह सम्मान यूनिवर्सिटी या सरकारों से मिलने वाले किसी भी सम्मान से कहीं ज़्यादा था, जिससे बराबरी और सामाजिक न्याय के चैंपियन के तौर पर उनकी पहचान और मज़बूत हुई.

निष्कर्षतः, बैसाखी का त्यौहार सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, और यह सामाजिक समरसता, एकता, धर्मनिरपेक्षता, बलिदान और समर्पण को बढ़ावा देता है. इसीलिए सन् 2016 में संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने मंगल शोभा यात्रा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में सम्मिलित करके इसके महत्व को और बढ़ाया है..

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