कॉकरोच जनता पार्टी के पीछे कौन?
रजनीश भारतीय
कहीं अमीरी का पहाड़ है तो कहीं गरीबी की गहरी खाईं। बिना पहाड़ काटे खाईं नहीं पट सकती।
अर्थात बगैर भीटा काटे गड्ढा नहीं पटेगा। मगर काकरोच जनता पार्टी भीटा काटकर गरीबी का गड्ढा पाटने के पक्ष में नहीं है। वह रेवड़ियां बांटकर ही गरीबों को रिझाने में विस्वास करती है। इस पार्टी के मामूली सुधार वाली मांगों से यही निष्कर्ष निकलता है। तो इससे मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी इतनी तेजी से क्यों जुड़ रहे हैं?
अधिकांश मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों में सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि वे लोग चाहते हैं कि गड्ढे पाटना चाहिए मगर यह नहीं चाहते हैं कि ऊँचे-ऊँचे भीटों को भी काटा जाये। वे भीटों को बचाना भी चाहते हैं और गड्ढों को भी पाटना चाहते हैं। मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों की बौद्धिकता यहीं पर अटकी हुई है। इसीलिए साम्राज्यवादी ताकतें इन्हें आसानी से अपना शिकार बना लेती हैं। यह सर्वविदित सिद्धांत है कि भीटा काटे बगैर गड्ढा नहीं पटेगा।
मगर इतनी आसान सी बात मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों की खोपड़ी में क्यों नहीं नहीं बैठ सकती? क्योंकि वह खुद भी अमीरी का भीटा बनाकर उस पर चढ़कर ऐश करने के लिए लार टपकाता रहता है। जब तक वह इतिहास के भविष्य को देखने में सक्षम नहीं हो जाता, तब तक खुद को डि-क्लास नहीं करता उसकी बौद्धिकता आगे नहीं बढ़ती। तब तक वह सत्ता का अन्धभक्त बना रहता है या नीम-हकीमों के फर्जी नुस्खों को आजमाने में अपनी ऊर्जा बर्बाद करता रहता है।
जिन शोषक वर्गों के पास अमीरी का पहाड़ है, उन शोषक वर्गों ने ही गरीबी का गड्ढा बनाया है। वही मुट्ठी भर शोषक वर्ग के लोग बहुसंख्यक जनता के खिलाफ मँहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जमाखोरी, मिलावटखोरी, जुआखोरी, मुफ्तखोरी, नशाखोरी, पेपर लीक आदि बढ़ा कर लूट-पाट कर रहे हैं। तथा गरीबी की खाईं को और गहरा कर रहे हैं। शोषक वर्गों के पास इतनी क्षमता इसलिए है कि ये लोग उत्पादन के संसाधनों के मालिक हैं। यानी ये मुट्ठी भर लोग जल, जंगल, जमीन, कल-कारखाना, खान-खदान, यातायात के संसाधन, स्कूल, कालेज, अस्पताल, बैंक, बीमा आदि पर काबिज हैं। यही उनकी शक्ति है। इसी मालिकाने की शक्ति से नौजवानों तथाकथित काकरोचों के खिलाफ अन्याय अत्याचार करते रहते हैं।
मगर काकरोचों का डिजिटल प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली काकरोच जनता पार्टी उन शोषक वर्गों के मालिकाने को चुनौती नहीं देती। वह इसी व्यवस्था को बनाए रखते हुए कुछ कानूनों में बदलाव करके तथा कुछ नये कठोर कानून बना कर मौजूदा समस्याओं को दूर करना चाहती है। आम आदमी पार्टी भी इसी तरह का सब्जबाग दिखा कर सत्ता में आई थी। मगर मुफ़्त की रेवड़ी के अलावा जनता को कुछ नहीं दिया। भाजपा भी इसी तरह सत्ता में आई थी। कांग्रेस की नीति भी ऐसी ही रही है। सपा, बसपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियों की नीति वही है। इनकी रेवड़ी अलग-अलग नाम और अलग-अलग रंग की होती रही हैं। मगर इन सभी शोषक वर्ग की पार्टियों की बुनियादी नीति एक ही है- अमीरी के पहाड़ों की रक्षा करते हुए गरीबी की खाईं पाटने की लफ्फाजी करना। किसी भी पार्टी की सरकार हो सबने ममँहगाई बढ़ाया, सबने बेरोजगारी बढ़ाया, सबने पिछली सरकारों के मुकाबले भ्रष्टाचार भी बढ़ाया।
काकरोच जनता पार्टी के प्रमुख मुद्दे देख लीजिए – घोषणापत्र में पांच प्रमुख मांगें हैं –
“1- सेवानिवृत्ति के बाद मुख्य न्यायाधीशों को राज्यसभा भेजे जाने की प्रथा पर रोक लगाना।” हमारा सवाल– क्या इस रोक से रोजगार बढ़ जायेगा या मँहगाई घट जायेगी?
“2- सांसदों द्वारा दल-बदल पर 20 साल का प्रतिबंध लगाना”
हमारा सवाल– क्या इस तरह के कानून से गरीबों के पक्ष में कानून बनना शुरू हो जायेगा?
“3– संसद में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करना।”
हमारा सवाल– क्या इससे 99% शोषित उत्पीड़ित महिलाओं को आजादी मिल जायेगी?
“4– पक्षपातपूर्ण मीडिया और एंकरों के खिलाफ कार्रवाई करना।”
हमारा सवाल– क्या इस मांग से मीडिया निष्पक्ष हो जायेगी?
ये क्रान्तिकारी मांगें नहीं हैं। ये सब मामूली सुधारवादी माँगें हैं। ये नीम-हकीमों वाले नुस्खे हैं, जो भारत के मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के बुद्धिविलास के अलावा कुछ नहीं कर सकते हैं। इन नीमहकीम नुस्खों से न तो भीटा कटेगा ना गड्ढा पटेगा। न तो नये रोजगार का सृजन होगा ना ही बेरोजगारी दूर होगी, न मँहगाई दूर होगी। हां, अगर आन्दोलन आगे बढ़ा तो इससे एक काम हो सकता है – जो बेरोजगार युवा मौजूदा व्यवस्था से निराश होकर क्रान्ति की ओर बढ़ सकता था, वह कम से कम नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका टाइप का तख्तापलट कर के कम से कम दस साल तक शान्त हो जायेगा। यह शोषक वर्गों की व्यवस्था ज्यों की त्यों बनी रह जायेगी।
इस लिए संकट की इस घड़ी में नौजवानों को सत्ता के तख्तापलट और व्यवस्था के तख्तापलट का अन्तर समझना जरूरी हो जाता है। कुछ नौजवान कुछ कठोर कानून बना देने और उसे लागू कर देने को व्यवस्था का तख्तापलट समझ लेते हैं मगर यह व्यवस्था का तख्तापलट नहीं है। व्यवस्था का तख्तापलट का मतलब स व्यवस्था में जो मालिक बना हुआ है, उसके व्यक्तिगत मालिकाने को हटाकर उसकी जगह जनता का सामूहिक मालिकाना कायम कर दिया जाये। मगर काकरोच जनता पार्टी इस तरह के बदलाव के खिलाफ है। उनका मामला कुछ आगे बढ़ा तो श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल की तरह भारत में भी सत्ता का तख्तापलट हो सकता है। और व्यवस्था ज्यों की त्यों बनी रह जायेगी।
आन्दोलन इतनी तेज कैसे –
चीफ जस्टिस आफ इंडिया ने बेरोजगार युवाओं की तुलना काकरोच से करते हुए उन्हें बहुत ज्यादा टाइम तक आनलाइन रहने वाला, सोशल मीडिया पर गंदगी फैलाने वाला तथा आलसी बताया।
इतनी सी बात एक युवक को लग गयी। और बना दिया काकरोच जनता पार्टी। एक हफ्ते के अन्दर देखते-ही-देखते दो करोड़ से अधिक लोग इसके फालोवर हो गये।
जरा सोचिए, यू-ट्यूब अमेरिका का है, फेसबुक अमेरिका का, ट्विटर अमेरिका का, इंस्टाग्राम अमेरिका का, सोशल मीडिया का पूरा इण्टरनेट उसके कन्ट्रोल में है, तो उसकी इच्छा के बगैर दो करोड़ फालोवर बनाना मुश्किल ही नहीं असंभव है।
अमेरिकी साम्राज्यवाद का क्या हित है?
भारत के मँझोले पूँजीपति चाहते हैं कि भारत और चीन में दोस्ती हो क्यों कि इन छोटे और मँझोले पूँजीपतियों के छोटे-छोटे और मझोले कारखाने चीन से आयातित तकनीक और अर्धतैयार माल पर आधारित है। इसीलिए वे चीन के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने के लिए सरकार पर दबाव डालते हैं। काकरोच जनता पार्टी को आगे बढ़ाने में इनका भी अप्रत्यक्ष सहयोग है। अमेरिका चाहता है कि डालर साम्राज्यवाद का वर्चस्व बना रहे। इसीलिए वह नहीं चाहता कि भारत और चीन मिलकर कहीं ब्रिक्स करेंसी जारी करके डालर के वर्चस्व को तोड़ दें। कारण है कि अमेरिका नियंत्रित सोशल मीडिया ने काकरोच जनता पार्टी को आगे बढ़ाने में सहयोग किया।
काकरोच जनता पार्टी के जरिए अमेरिका ने मोदी सरकार को यह चेतावनी दे दिया कि जो श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में हुआ वहीं भारत में भी हो सकता है। इस तरह के दबाव से मोदी सरकार को अमेरिका से नये-नये असमान समझौते करने के लिए तथा चीन से दूरी बनाने के लिए बाध्य कर रहा है। अब खबर है कि भारत दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो ने कहा कि भारत-अमेरिका के रिश्तों की रफ्तार धीमी नहीं पड़ी है। दोनों देशों के बीच जल्द ट्रेड डील होगी। और इधर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है – अमेरिका भारत से व्यापार, रक्षा, टेक्नोलॉजी, AI, ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग तेजी से बढ़ा रहा है।
इन तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जिस तरह अन्ना हजारे के आन्दोलन से मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी और उनके नौजवान बच्चे गुमराह हुए थे, और तब से 14 साल बाद तक कोमा में रहे। यानी लगभग एक पीढ़ी बीतने बाद उनको होश आया कि वे अन्ना आन्दोलन के जरिए छले जा चुके हैं अब इस काकरोच जनता पार्टी के मूवमेंट से नयी पीढ़ी के नौजवान भी कम से कम 10 साल तक के लिए कोमा में चले जायेंगे। शोषक वर्गों का यह भी एक मकसद है। मगर जरूरी नहीं कि इतिहास की गति हमेशा उन शोषकों के अनुकूल रहे।
लेखक जनवादी किसान सभा से संबद्ध हैं।
