साहित्य आलोचना के सरोकार
कहानी-समीक्षा : जीवन की व्यथा कथा
ओमसिंह अशफ़ाक
मासिक पत्रिका ‘हरिगंधा’ के अप्रैल 2009 (अंक- 179) में दो रचनाएँ ‘मास्टर-पीस’ कही जा सकती हैं।
एक है रोहतक के नरेश कुमार की कहानी ‘वो रात को लाहौर चले गये’ और दूसरी है एकांत श्रीवास्तव की स्मृति कथा ‘सांपों से भरी अंधेरी पगडंडिया’।
छः माह से ज्यादा गुजर गये जब नरेश ने एक दिन संकोच और उत्सुकता मिश्रित मूड में मुझे ये कहानी सुनायी थी। संकोच शायद इसलिए कि मैं रोहतक से कुरूक्षेत्र लौटने की जल्दी में था और उत्सुकता इसलिए कि वह अपनी पहली कहानी पर एक पूर्व परिचित कथाकार की राय जानना चाहते थे।
बहरहाल, छोटी-सी कहानी है- कहकर उसने पढ़ना शुरू कर दिया और चौथे पैरे तक आते-आते ताई भरतो ने 1947 की मारकाट (देश-विभाजन) का आँखों देखा हाल बयान करना शुरू किया।
जिसमें उनके गांव के 40 मुस्लिम परिवारों की भयानक त्रासदी का किस्सा का गूंथा हुआ था। इसमें अशरफ की आप बीती के माध्यम से जगबीती का प्रातिनिधिक विवरण चल रहा था और मेरी आँखों से खारा पानी बह रहा था।
और मैं एक युवा कथाकार के सामने इस तरह विचलित होने पर शर्मिन्दा तो था ही, 1947 में मारकाट की राजनीति शुरू करने वाले सियासतदानों के प्रति उपजे आक्रोश से भी सिर फटा जाता था।
यह सोचकर मेरा आक्रोश और ज्यादा बढ़ रहा था कि आज भी ऐसे अनेक असभ्य एवं बर्बर तथाकथित धार्मिक और राजनैतिक लोग एवं पार्टियाँ उसी तरह के हालात पैदा करने पर आमादा हैं?
छपी हुई कहानी ने मेरी फिर वही गत बनी दी हालांकि इस बार मैं अपने कमरे में अकेला ही था। बेशक यह लेखक की पहली कहानी है लेकिन इसकी धमक चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की अमर कहानी- ‘उसने कहा था’ की याद ताजा कर देती है।
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ताई भरतो बताती हैं कि किस तरह झूठी अफवाहों ने पीढ़ियों से साथ-साथ रहते आये पड़ोसियों के बीच नफ़रत और अविश्वास पैदा कर दिया था और उसके चलते अपराधिक तत्त्वों की बन आयी थी।
चारों तरफ मारकाट और लूटपाट का माहौल था। अनपढ़ ग्रामीण महिला के नाते ताई भरतो की अखबारों तक तो पहुँच नहीं थी, हाँ ताऊ सरजू उसे रेडियो पर सुनी गयी खबरें जरूर सुना दिया करता था।
देश के बंटवारे की खबर सुनकर ताई भरतों ने कहा था- “भाड़ में जाये रेडियो! पीढ़ियों से चला आ रहा हमारा साथ क्या रेडियो के कहने से टूट जायेगा?
अनपढ़ भरतो नहीं जानती थी कि इस रेडियो की आवाज के पीछे ब्रिटिश साम्राज्यवाद की साज़िश और देशी सांप्रदायिक ताकतों की कारस्तानियों की ताकत भी मौजूद है।
लेकिन सवाल ये है कि क्या आज भी हमारे शिक्षित मध्यवर्ग का बड़ा हिस्सा इन साज़िशों को पहचानता और मानता है? शायद नहीं। यदि पहचानता होता तो बाबरी मस्जिद का ध्वंस और और गोधरा-गुजरात कांड नहीं हो सकते थे।
खैर,अवांतर प्रसंग से बचकर कहानियों की चर्चा पर ही लौट आते हैं:
रात के दो बजे बैलगाड़ी पर जल्दी-जल्दी सामान रखने से पहले अशरफ ताऊ सरजू को कहता है- “सरजू भाई, अब हमारा यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं है।
कत्लेआम और बलात्कार की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। खुदा करे हमारी आज की रात खैरियत से निकल जाए।” इस अफ़रा-तफ़री में रज़िया की कविता वाली किताब और शायरा का कंगन भी घर में ही छूट जाता है।
रजिया की किताब तो मिल जाती है परंतु शायरा का कंगन और अन्य कीमती सामान तो अगली रात उनके पड़ोसी जिले सिंह और प्यारा दीवार फांद कर चुरा लेते हैं जो कि हाल ही में किसी मामले में जेल से छूटकर आये थे।
रजिया बार-बार पूछ रही थी “अम्मा हम अपना घर छोड़कर कहाँ जा रहे है? कितने दिन के लिए जा रहे हैं। क्या हम फिर कभी वापिस नहीं आयेंगे।”
कुछ पता नहीं बेटी, शायरा ने भारी मन से जवाब दिया। शायरा भरतो के गले से लिपटकर फफक पड़ी और कुछ संयत होकर बोली- “भरतो बहन ! हम तो आज रात को चले जायेंगे। पता नहीं फिर कभी मिलना हो न हो।
“तुम मेरे लोहे वाले संदूक को उठा लेना। संदूक में कुछ कपड़े हैं, तेरी बेटी के लिए बनायी पायजामी और सितारों वाला कुर्ता भी है। फूलों वाली रजाईयाँ भी उठा लेना।..
“ये पच्चीस रूपये लो, देवी दुकानदार की उधार चुका देना।..ये एक जोड़ी पाज़ेब रामरती की बेटी की शादी में दे देना..और कहना कि मुझे माफ़ कर दे, जाते वक्त मिल न सकी..।”
इस वृतांत को सुनकर हर संवेदनशील इंसान का कलेजा चाक हो जाता है, फिर वे कौन लोग हैं जिन्हें ये बातें असर नहीं करतीं हैं। निश्चय ही उनकी संवेदना मर चुकी है और वे पशुवत जीवन जी रहे होते हैं। इसीलिए वे सांप्रदायिक दंगे भड़काते हैं और निर्दोष लोगों को कत्ल करते हैं।
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अगले दिन सरजू जब ईंधन की लकड़ी, रजिया की किताब, अशरफ के लिए दूध की बोतल आदि जरूरी सामान लेकर रोहतक टैंट में पहुँचा तो अशरफ़ का परिवार वहाँ नहीं था।
हवलदार ने बताया कि ‘वो रात को लाहौर चले गये।’ कैसी विडम्बना है कि जिस देश की आजादी के लिए शहीद अशफ़ाक उल्ला खान फांसी का फंदा चूम रहे थे। और लाखों परिवारों को दर-बदर और देश-बदर कर दिया गया।
कौन जाने अशरफ का परिवार सही सलामत लाहौर पहुँचा भी होगा या नहीं? और जो पाकिस्तान या हिन्दुस्तान पहुँच भी गये थे, वे क्या अपना घर गांव भूल पाये होंगे? कदापि नहीं।
जब लालकृष्ण आडवाणी और जनरल मुशर्रफ़ नहीं भूले तो आम लोग कैसे भूल सकेंगे।
शायद 1980 की बात है, मैं नारनौल में था। एक मुस्लिम बुजुर्ग एक हवेली के सामने सड़क पर बैठा रो रहा था। “क्या बात है बाबा, क्या कोई दर्द तकलीफ है? चलो, आपको हम आपके घर छोड़ आते हैं।”
“नहीं बेटा ऐसी कोई बात नहीं है।” बुजुर्ग ने संयत होकर कहा- “मैं पाकिश्तान से आया हूँ। ये हवेली मेरी ही थी। बस यूँ ही मन भर आया।”
सरहद के दोनों तरफ लाखों परिवार ऐसे जख्म, ऐसी पीड़ा लिए हुए मिल जायेंगे। लेकिन क्या किया जाये, समय के पहिये को पीछे लौटाया नही जा सकता है। हाँ, इतना जरूर किया जा सकता है कि हम सब मिलकर प्रयास करें कि ऐसी त्रासदी फिर घटित न हो सके।
जनता के भाईचारे में फिरकापरस्त और जातिवादी ताकतें सेंध न लगा पायें, इसके लिए सजग रहते हुए बुनियादी हकों के लिए एक सशक्त जनांदोलन का निर्माण जरूरी है।
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अब एकांत श्रीवास्तव की स्मृतिकथा पर बात कर ली जाए। वह विलक्षण कवि एवं समर्थ रचनाकार हैं। इसलिए स्मृतिकथा के बहाने बहुत कुछ कह दिया है।
एकांत श्रवास्तव की आपबीती पढ़कर मैक्सिम गोर्की का बचपन याद आ जाता है। गोर्की ने कहा था कि जब मेरे पेट में भूख कचोटती थी तो मुझे लगता था कि इस स्थिति में इंसान ‘पवित्र संपत्ति का नियम’ ही नहीं दुनिया का कोई भी कानून भंग कर सकता है।
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अपने पिता की अर्थी को कंधा देते हुए एकांत सोचते हैं- जीवनभर जिन्होंने हमारा बोझ उठाया था, हम उनका बोझ इस तरह उठा रहे हैं। पिताजी गांव लौटना चाहते थे और वे लौट आये थे इस तरह।
पिताजी के विभाग से मिले तेरह हजार रुपये तो कर्मकांड में ही साफ हो गये, हालांकि पिताजी ने अंतिम समय कहा भी था कि भावना में बहकर अधिक खर्च मत करना, परंतु रिश्तेदार और अन्य लोग कहाँ मानने वाले थे।
मध्य वर्गीय पिताओं की यह कैसी बेबसी है कि अपनी मृत्यु के खर्च की चिंता भी साथ लेकर जाना पड़ता है, जीते-जी तो आर्थिक संकट और चिंताएँ उन्हें चिता-समान जलाती ही रहती हैं।
अपनी बेटी सरोज की मृत्यु पर महाकवि निराला को भी कुछ ऐसी ही पीड़ा सताती रही थी जैसे एकांत के पिताजी को। तब निराला ने अपनी कविता ‘सरोज स्मृति’ में लिखा था:
कन्ये, मैं पिता अभागा था,
कुछ तेरे हित भी कर न सका!
इस पूंजीवादी व्यवस्था में मध्यवर्ग की ये हालत है, तो मजदूर वर्ग पर क्या बीतती होगी ये प्रेमचंद की ‘सद्गति’, ‘ठाकुर का कुआं’ और ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ को पढ़कर आसानी से समझा जा सकता है।
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एकांत श्रीवास्तव लिखते हैं- धूमधाम और भव्य ढंग से दुःख का यह समारोह मनाया गया। जो कहा, करते गये। ऐसे में विरोध करें भी तो कैसे?
इलाहाबाद में फूल विसर्जित करने जाना पड़ा, वहाँ लालची पंडों का निर्मम और क्रुर कर्मकांड था,यह भी सहा।
पंडे ने कहा बोलो- “हे पिता अब तुम बैकुंठ में वास करो और हमें मुक्त करो-यह वाक्य हृदय को तीर की तरह बींध गया।
क्या हम सचमुच इस तरह अपने पिता से मुक्त होना चाहते थे?”
हमारे मन में एकांत श्रीवास्तव के साथ पूर्ण सहानुभूति और उनके स्वर्गीय पिता के प्रति पूरा सम्मान है। परंतु उनकी स्मृतिकथा का उपरोक्त पक्ष हमें अधिक बेचैन करता है।
इस कर्मकांड और आडम्बर से पिंड छुड़ाने का आख्यान तो बहुत सालों पहले स्वामी दयानंद ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में दे चुके हैं।
फिर एकांत तो प्रगतिशील नजरिये के रचनाकर हैं। उन्हें इस ढोंगबाजी का शिकार नहीं बनना चाहिए था। कम-से-कम इस प्रकार के शोषण को तो टाला जा सकता था।
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मृत्युभोज और शोक समारोह संपन्न हुआ। मेहमान और रिश्तेदार एक-एक कर चले गये। हमारे हाथ खाली थे। किसी ने आर्थिक स्थिति बारे पूछा तक नहीं।
अब लेनदार एक-एक कर आने लगे। बैंक से पिता द्वारा लिया गया 24 हजार रुपये का कर्ज अब चौरासी हजार हो गया था। हर तरफ अधेरा। बाड़ी में पिताजी की समाधि है मां सुबह-शाम वहाँ दिया जलाती हैं।
परंतु एकांत की अम्मा (दादी) से परिचय करके पता चलता है कि दुःखों और जिम्मेदारियों से भरा जीवन किस प्रकार इंसान को पका डालता है।
लंबा वैधव्यपूर्ण जीवन और मां के सामने एकमात्र पुत्र की मृत्यु पाठक के मन में सिहरन पैदा कर जाती है।
लेकिन उस पीढ़ी की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि अपने जर्जर शरीर को लेकर बुढ़िया पोते-पोतियों और विधवा पुत्रवधू के परिवार की सरपरस्ती के लिए फिर तनकर खड़ी हो जाती है:
“अब कैसे कटेगा बेटा, घर कैसे चलेगा? बोलो तो किरयाने की दुकान फिर से खोल लूं।”
“नहीं अम्मा तुम चिंता मत करो, सब ठीक हो जायेगा।”
लगता है कि गोर्की की नानी भारत आकर एकांत की दादी बन गयी है।
लेकिन यह भी हमारे समय की कड़वी सच्चाई है कि एम.ए. प्रथम श्रेणी और पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त श्रेष्ठ कवि के परिवार को रोटी के लाले पड़ जाते हैं।
यहाँ तक कि श्रेष्ठ-कवि की ख्याति अखबार में छोटी-मोटी मज़दूरी मिल जाने के रास्ते में अड़चन बन जाती है।
“कई बार ऐसा होता है कि हाथ मुंह धोकर बैठे हैं. मगर शक्कर और चाय की पत्ती नहीं है।”
निराला ने ऐसी ही परिस्थितियों से जूझकर लिखा होगा-
दुःख ही जीवन की कथा रही।
क्या कहूँ आज जो नहीं कही।।
आज भी देश का एक बड़ा कवि गरियाबंद के राजकीय कॉलेज में घर से 50 कि.मी. दूर चालीस रुपये रोज की नौकरी करने पर मजबूर होता है।
आधा रास्ता साइकिल पर और आधा सफर बस में बीस रुपये खर्च करके आता-जाता है और बाकी बीस रूपये से सब्जी, चावल,तेल खरीदकर घर का चूल्हा जलवाता है।
यही है नई आर्थिक नीतियों और उदारीकरण, निजीकरण, विश्वीकरण की भारत को देन। तो फिर हम दिन-रात कौन-सी आर्थिक प्रगति, प्रति व्यक्ति आय में सतत बढ़ोतरी की चर्चा सुनते रहते हैं?
तो फिर 20 रूपये रोज में गुजारा करने वाले 84 करोड़ नागरिक किस देश के हैं? इन सवालों का जवाब भी इसी स्मृतिकथा से मिल जाता है।
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और अंततः मां के नाम 1100 रुपये प्रतिमाह की पेंशन और छोटे भाई की अनुकंपा के आधार पर क्लर्क की नौकरी लग तो जाती है, लेकिन मध्यप्रदेश और यू.पी. की सीमा पर जाकर किसी दफ्तर में ड्यूटी मिलती है।
और एकान्त को पी.एच.डी. की उपाधि को छुपाकर स्कूल टीचर बनने हेतु बी.एड. में दाखिला लेना पड़ता है। ये कोई काल्पनिक किस्सा नहीं, एक श्रेष्ठ कवि की आपबीती है।
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लेकिन अशरफ, एकांत श्रीवास्तव और निराला के दुःख और व्यथा कुदरती नहीं हैं। ये सब इसी पूंजीवादी व्यवस्था के दिए हुए दुःख हैं।
और जिस दिन दुःखी जनता इस सच्चाई को समझ जायेगी, उस दिन वह इस अन्यायकारी व्यवस्था को उखाड़कर न्याय, समता और बंधुत्व पर आधारित समाजवादी व्यवस्था की स्थापना कर लेगी ताकि दुःखों का अंत हो सके।
अब सवाल ये उठता है कि इन दो कथाओं में ऐसी विलक्षण चीज क्या है जो हमारी भावनाओं एवं मनोभावों को झकझोर डालती है।
मेरी राय में उनकी यथार्थपरकता और आत्मकथ्यात्मकता इन रचनाओं की विश्वसनीयता को इतना पुख्ता बना देती हैं कि पाठक इनमें वर्णित घटनाक्रम को एकदम वास्तविक एवं ‘आँखों देखा सच’ स्वीकारता है।
और उसी के अनुरूप एवं समानुपातिक रूप में पाठक का मन अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।
इसलिए अशरफ़ और एकांत श्रीवास्तव के परिवार के कष्ट एवं विपत्ति और विवशता पाठक को अपने निकट संबंधी एवं प्रिय की तकलीफ महसूस होती हैं।
और वह इस तकलीफ को दूर करने अर्थात् अन्याय का प्रतिकार करने के लिए व्यग्र हो उठता है।
मुझे अक्सर लगता है कि दुनिया का श्रेष्ठ साहित्य यही काम करता है। वह हमारी सकारात्मक, कल्याणकारी और न्यायवादी भावनाओं को उभारकर बेहतर समाज बनाने के लिए संघर्ष के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है।
और हमारे अंतर्मन को मांज-रगड़कर उस पर जमी निजी-स्वार्थों एवं क्षुद्रताओं की कालिख को धो डालता है।
ऐसे चमका देता है जेसे कोई सुघड़ गृहिणी खाने के बाद रसोई के बर्तन चमकाकर तरतीब से सजा देती है।
(2014में)
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