कुछ कह रही है जलियांवाला बाग़ की ताज़ा हवा

13 अप्रैल ख़ूनी दिवस पर विशेष

कुछ कह रही है जलियांवाला बाग़ की ताज़ा हवा

 अमोलक सिंह

13 अप्रैल 1919 का दिन इतिहास के पन्नों पर “ख़ूनी बैसाखी” के रूप में दर्ज हो गया। जलियांवाला बाग हत्याकांड में इकट्ठे निहत्थे और बेगुनाह लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाकर बाग़ और उसके भीतर के कुएं को लाशों से भर दिया गया।

जलियांवाला बाग़ इतिहास का ऐसा प्रेरणादायक अध्याय बन गया कि यहां से गदर आंदोलन, बब्बर अकाली, नौजवान भारत सभा, उधम सिंह और समय-समय पर उठने वाली क्रांतिकारी जन-लहरों तथा उनके नायकों के लिए यह स्थान एक प्रकाश स्तंभ बन गया। यह आज भी साम्राज्यवाद और उसके सहयोगियों के खिलाफ संघर्ष की प्रेरणा देने वाली ऐतिहासिक विरासत है।

बीते वर्षों में इस ऐतिहासिक राष्ट्रीय धरोहर का स्वरूप बिगाड़कर इसे एक सैरगाह में बदलने की योजनाएं बनाई गईं। पंजाब ने इसका विरोध किया। अमृतसर शहर में जोरदार मार्च हुए। बाग़ के मुख्य द्वार पर धरने और प्रदर्शन हुए। जनता की आवाज़ के कारण फिलहाल यह प्रक्रिया रोक दी गई। बाग़ में प्रवेश के लिए टिकट खिड़कियों पर मशीनें लगाने का काम भी जन दबाव के चलते रुकवाना पड़ा। जागरूक लोगों ने उस समय भी चेताया था कि यह केवल अल्पविराम है, पूर्ण विराम नहीं—लगातार सतर्क रहने की जरूरत है। आज वे शब्द फिर सच साबित हो रहे हैं।

क्या आप इन दिनों जलियांवाला बाग गए हैं? अगर नहीं, तो अवश्य जाने की कोशिश करें। आपके प्रिय शहीद आपको बुला रहे हैं। उनकी आवाज़ सुनें। खून से सने इतिहास को अपनी गोद में संभाले बैठा यह बाग़ आज आपसे अपना दर्द साझा करना चाहता है।

उसे शिकायत है कि आप उसे कुछ हद तक भूल चुके हैं। कुछ लोग केवल औपचारिक रूप से आते हैं, और कुछ पास आकर भी बिना भीतर गए लौट जाते हैं।

बारह वर्ष का एक किशोर भगत सिंह तो जलियांवाला बाग की खून से भीगी मिट्टी को शीशी में भरकर श्रद्धा से माथे से लगाकर ले जाता है, और आप अमृतसर की पापड़-बड़ियां लेकर घर लौट आते हैं! क्या आपको जलियांवाला बाग का इतिहास भूल गया है?

एक बार फिर जलियांवाला बाग आपको पुकार रहा है। वहां जाकर देखें—कुएं की गूंजती आवाज़ आपको चैन से सोने नहीं देगी। बाग़ की दीवारें, वह संकरी गली, मशीनगनों से गोलियां चलाने का स्थान, लाशों से भरा कुआं, दीवारों पर गोलियों के निशान, आर्ट गैलरियां, ऐतिहासिक दस्तावेज़—सब आपको सोचने पर मजबूर कर देंगे कि आखिर कौन है जो इस विरासत से छेड़छाड़ कर रहा है? इसकी मौलिकता किसे खटक रही है?

जलियांवाला बाग की गैलरी में पहले शहीदों के परिवारों द्वारा दी गई तस्वीरें लगी थीं—वे अब कहां हैं? शहीदों के कपड़ों की जेबों से मिले सिक्के, जो एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में प्रदर्शित थे, आज गायब हैं—यह गंभीर सवाल खड़े करता है।

13 अप्रैल 1919 को हिंदू, सिख और बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने मिलकर शहादत दी थी। यह हमारे स्वतंत्रता संग्राम की साझा और अमूल्य विरासत है, जो हमें एकता का संदेश देती है।

ख़ूनी कांड के एक प्रमुख दोषी माइकल ओ’ड्वायर के खिलाफ अदालत में मजबूती से खड़े होने वाले वकील चेतुर शंकरन नायर की तस्वीर और नाम-पट्टिका का गैलरी से गायब होना बेहद दुखद है।

जनहितैषी संस्थाओं और इतिहास के संरक्षकों को चाहिए कि वे सरकार से मिलकर इन ऐतिहासिक वस्तुओं को फिर से सुरक्षित और प्रदर्शित कराने की मांग करें। यह भी मांग उठनी चाहिए कि जलियांवाला बाग जैसी राष्ट्रीय स्मारक को किसी भी निजी कंपनी के अधीन न किया जाए और इसके वास्तविक इतिहास को संरक्षित रखा जाए।

लाइट एंड साउंड कार्यक्रम की स्क्रिप्ट देश के प्रतिष्ठित इतिहासकारों और विशेषज्ञों द्वारा तैयार की जानी चाहिए, ताकि सच्चा इतिहास सामने आए।

आज जो घटनाएं सामने आ रही हैं—जैसे काकोरी कांड के शहीदों की प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाना या प्रदर्शन के दौरान भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की तस्वीरें हटाना—ये सब संकेत हैं कि कहीं न कहीं क्रांतिकारी प्रतीकों को लोगों की नजरों से दूर करने की कोशिश हो रही है।

जलियांवाला बाग की विरासत धीरे-धीरे सैरगाह में बदलने का खतरा वास्तविक होता जा रहा है। शहीदों की सोच को सतही प्रतीकों में बदलना और इस पवित्र स्थल की भावना को कमजोर करना आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास को विकृत करने जैसा है।

आज जब देश में बड़े कॉरपोरेट घरानों का प्रभाव बढ़ रहा है, तब जलियांवाला बाग का इतिहास सच्ची देशभक्ति की मशाल बनकर सामने आता है। इस चेतना के स्रोत को कमजोर करने की कोशिशों को समझना समय की मांग है।

कुछ ऐसा ही संदेश दे रही है जलियांवाला बाग की ताज़ा हवा।

अनुवाद : गुरमीत अंबाला

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *