आज का समय और कविता की ताकत-1

कुछ निजी प्रसंग-1

आज का समय और कविता की ताकत-1

ओमसिंह अशफ़ाक

 

पहली घटना सन् 2002 के अंत की है।

रोहतक विश्वविद्यालय परिसर में हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति और ‘सर्च’ रोहतक ने तीन दिवसीय नाट्य उत्सव आयोजित किया था। उसमें अंतिम दिन शाम को राज्य स्तरीय कवि सम्मेलन भी आयोजित किया गया था। जिसमें अन्य जिलों के अलावा कुरुक्षेत्र, कैथल, पानीपत, गुड़गांव और दिल्ली से भी जनवादी कवि, लेखक,आलोचक आमंत्रित किए गए थे।

कुरुक्षेत्र और पानीपत से करीब 8-9 लेखक थे,जिनमें प्रो.के.के.ऋषि, प्रो. ओ.पी. ग्रेवाल, तारा पांचाल, करुणेश, जयपाल, पानीपत से प्रो.राणा गन्नौरी और प्रो.कुमार पानीपती थे। नामों की कुछ भूल-चूक भी हो सकती है। उसके लिए संबंधित लेखक कृपया माफ़ी फरमाएं।

मैंने तभी कुछ समय पहले ‘बोल-बम, बोल-बम’ कबिता लिखी थी जोकि तब तक कहीं छपी नहीं थी। बाद में यह कविता मेरे भूकम्प में बच्चे’ संग्रह में (अक्तूबर 2003 में) संकलित हुई।

खैर कवि सम्मेलन पूरे शबाब पर था और जनवादी माहौल था, तभी मेरा नाम कविता पढ़ने के लिए पुकारा गया। मैंने भी पानी पी-पीकर पूरे जोश में मंच से कबिता पढ़ी और श्रोताओं ने अपनी तालियों की गड़गड़ाहट और हंसी के फुहारों से कई-कई बार कविता की प्रशंसा में अपनी स्वीकृति दर्ज कराई।

कार्यक्रम की समाप्ति पर वरिष्ठ कवि विनोद कुमार शुक्ल ने कम्पलीमेंट दिया कि आज आपने मुशायरा लूट लिया, बधाई। लेकिन जिस प्रतिक्रिया का मैं जिक्र करना चाहता हूं, वह दूसरी तरह की है-

हुआ यह था कि मैं इधर मंच से कविता पढ़ रहा था और उधर तारा पांचाल और एक-दो लेखक साथी पण्डाल से बाहर कुछ दूर जाकर धुम्रपान करने लगे थे। उन्हें अंधेरे में कुछ और दूर खड़े दो-तीन लोगों की बातचीत सुनाई पड़ी।

उनमें से एक कह रहा था कि अगर “मैं आई.पी.एस. होता तो इस कवि को अभी गोली मार देता।”

गत 24 साल में तो ‘संघ’ की नफ़रती विचारधारा से संपृक्त कितने ही युवक ‘आईपीएस’ बन चुके होंगे? इसलिए लोकतंत्र पर खतरे की गंभीरता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। और यह खतरा कोई काल्पनिक या कृत्रिम चीज नहीं है।

कुरुक्षेत्र की वापसी यात्रा में रास्ते में जब तारा पांचाल ने यह खतरनाक प्रतिक्रिया सार्वजनिक की तो एक बार तो सब सन्न रह गये। पर अगले हो क्षण सबकी हंसी फूट पड़ी। सब ने अपने-अपने नजरिए से उस फासिस्ट प्रतिक्रिया को व्याख्या की। और कुछ देर बाद बातचीत अन्य प्रसंग पर पहुंच गई। मुझे आज दूसरी बार कविता की ‘प्रचंड ताकत’ का अहसास हुआ था।

कविता जैसी अहिंसक चीज भी किसी को कितने गंभीर घाव दे सकती है। मैंने निजी जीवन में ऐसा पहली बार देखा था। पहला वाकिया सबसे बाद में बताऊंगा। पाठकों की जानकारी हेतु उक्त कविता के कुछ अंश यहां उद्धृत किए जा रहे हैं। ताकि अधिनायकवाद, भ्रष्टाचार, आपसी सिरफुटौव्वल और फर्ज़ी देशभक्ति का कुछ आंकलन किया जा सके।

कविता:

बोल बम, बोल बम

1

जिसका आज राज है,उन्हीं का सुराज है।

शिक्षा भी उनकी है,स्कूल भी उनका।

शाखा भी उनकी है,फूल भी उनका।

शास्तर भी उनका है,शस्तर भी उनका।

गुजरात भी उनका है,बस्तर भी उनका।

गलबा भी उनका है,मलबा भी उनका है।

तेरा क्या है फटकचंद!बोल बम बोल बम।।

2

अयोध्या भी उनकी है,राम भी उनका।

मथुरा भी उनको है,श्याम भी उनका।

आस्था भी उनकी है,कत्लेआम भी उनका।

हिमालय भी उनका है,हिन्दी भी उनकी।

माथा भी उनका है,बिन्दी भी उनकी।

थान भी उनका है,चिन्दी भी उनकी।

तेरा क्या है फटकबंद!बोलबम बोल बम।।

3

गंगा भी उनकी है,मंदिर भी उनका।

सरस्वती उनकी है,समन्दर भी उनका।

द्वारका उनकी है,द्वारपाल भी उनका।

प्रधानमंत्री उनका है,राज्यपाल भी उनका।

गोडसे भी उनका था,अब गांधी भी उनका है।

नकदी भी उनकी है,चांदी भी उनकी है।

शहीद भी उनके हैं ताबूत भी उनका।

जांच भी उनकी है,सबूत भी उनका।

तेरा क्या है फटकचंद !बोल-बम, बोल-बम।

4

लोकतंत्र भी उनका है,तानाशाही भी उनकी।

पाखंड भी उनका है,सफाई भी उनकी।

छल-छदम उनका है,ढिठाई भी उनकी।

सरकार उनकी है,तन्तर भी उनका।

पिशाच उनके हैं,मन्तर भी उनका।

मंत्री उनका है,विनिवेश उनका।

विध्वंस उनका है,फिर भी देश उनका।

तेरा क्या है फटकचंद!बोल बम, बोल-बम।।

5

उन्हीं की मर्यादा है,उन्हीं का उल्लंघन है।

उन्हीं की सीता है,उन्हीं का रघुनंदन है।

उन्हीं के बन हैं,उन्हीं के बनवासी।

उन्हीं का वृंदावन,उन्हीं की काशी।

उन्हीं की अग्नि है,उन्हीं का कलाम है।

उन्हीं का पोखरण है,उन्हीं का रतलाम है।

उन्हीं की रेल है,उन्हीं का जोन है।

उन्हीं का उत्पात है,उन्हीं का मौन है।

बार-बार बोलता है। तू तीसरा कौन है?

तेरा क्या है फटकचंद ! बोल-बम, बोल-बम ।।

(जुलाई-अगस्त 2002)

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