जंतर-मंतर पर आंदोलन अब व्यापक हो चला है। अब वह सारे बंधन तोड़कर आगे बढ़ निकल चुका है। लेकिन सरकारी चालें अभी भी चली जा रही हैं। कभी लगता है कि मामला सुलझ रहा है तो सरकार ऐसी चाल चलती है कि शंकाएं उभर आती हैं। जब यह पोस्ट प्रकाशित की जा रही है तब सूचना आ रही है कि शनिवार सुबह ही पुलिस ने सीजेपी के कनवीनर अभिजीत दीपके को पुलिस ले गई है, उसे में हिरासत में ले लिया है। आज दोपहर बाद सीजेपी के प्रतिनिधिमंडल से केंद्र के मंत्रियों की दूसरे चरण की बात भी होनी है। यह पोस्ट वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार की फेसबुक वॉल से आभार के साथ ली गई है। इसके अलावा हम दो और वरिष्ठ पत्रकारों की पोस्ट प्रतिबिम्ब मीडिया पर शेयर करेंगे ताकि आंदोलन और जंतर-मंतर पर आंदोलनकारियों तथा सरकार के ‘नुमाइंदों’ द्वारा कही जा रही बातों को समझ सकें। इस पोस्ट के बारे में अंबरीश जी ने जो लिया है उसे देते हुए रमाशंकर सिंह की पोस्ट यहां दी जा रही है। संपादक
क्या हो रहा है जंतर-मंतर पर बता रहें हैं रमा शंकर सिंह. पढ़ना चाहिए इस रपट को. क्योंकि पढ़ना तो कम हो ही गया है लिखना भी खासकर जो रपट अखबार में लिखी जानी चाहिए थी वह सोशल मीडिया पर है. अंबरीश कुमार
यह प्रतिरोध का मेला है!
रमा शंकर सिंह
रात 11.42 बजे का समय है , अर्ध रात्रि पर डेरा लौट रहा हूँ । पसीने से तरबतर। कुर्ता पायजामा निचुड रहे हैं पसीने में । गर्मी से ज़्यादा उमस लेकिन कुल दस हज़ार की भीड़ के लायक़ छोटी सी जगह पर अगर 70-80 हज़ार लोग अट कर फैल जायें तो कल्पना करिये कि कैसी उमस होगी ? मैं भीड़ के आकलन के मामले में ग़लत नहीं निकलता । जनपथ , गुरुद्वारा बंगला साहिब , बाबा खड़क सिंह मार्ग , सैंट्रल पार्क क्नॉट प्लेस और संसद मार्ग के बाहर तक लोगों को जहॉं जगह मिली वहीं बैठकर सैंकड़ों समूह अपने अपने ढंग से विरोध व्यक्त कर रहे हैं । कल शनिवार रविवार को दो लाख तक की संख्या पार होगी । कोई सरकार ऐसी और इतनी भीड़ पर लाठी या गोली चलाने की मूर्खता नहीं कर सकती । सिर्फ़ सम्वाद की ही सम्भावना है टकराने की नहीं ।


जितने लोग इस समय जा रहे हैं उससे ज़्यादा आ रहे हैं । देर रात तक एक लाख से ज़्यादा भीड़ आने का अनुमान है । दूर से और पास से भी । हर दस युवक पर दो युवतियों का अनुपात है । मैंने दो चार लड़कियों से पूछा इतनी भीड़ में अनसेफ तो नहीं लग रहा ? नॉट एट आल अंकल ! एक ने कहा कि मैं तो रोज़ आ रही हूँ ! तीसरी ने कहा कि परिवार को मैंने अभी नहीं बताया कि आधे दिन का दफ़्तर मैं स्किप कर आ रही हूँ । नवविवाहिता से मैंने पूछा कि आपकी शादी कब हुई ? लाल चूड़ियाँ दिखाते हुये उसने कहा 11 जुलाई को । विवाह हुआ और 12 दिन नवदम्पत्ति विरोध में ख़ुशी से शामिल हो रहे थे। अधेड़ उम्र की मातायें भी बच्चों के साथ दिखीं । पूरे परिवार भी अपना गोल बनाये एक दूसरे पर पंखा झल रहे थे , कुछ खा पी रहे थे एकाध थक कर सो भी रहा था । कुछ ऐसे भी वालंटियर थे जो किसी भी अनजान के चेहरे पर पसीना देख कर पंखा झलने लगते थे जैसे मेरे पास एक सरदार युवक आकर पंखे से हवा करने लगा । मेरी और साथी अरुण श्रीवास्तव की उम्र का कोई नहीं दिख रहा था तो हमें लाइन तोड़कर कार्यकर्ताओ ने प्रवेश दिया और बाहर भी विशेष रूप से निकाला । लम्बी लम्बी लाइने लगीं हैं प्रवेश द्वार पर और निकास के लिये भी ।

पीने के पानी की बोतलों का वितरण चल रहा है । जो चाहे सो बोतल ले ।खाना भी लगातार लोग ला रहे हैं मुख्यतः बर्गर पुलाव सैंडविच पित्जा आदि । प्लास्टिक व खजूर के पंखे बँट रहे हैं । सैंकड़ों ग्रुप विरोध के अपने नारे , पोस्टर्स , गाने व भाषणों से ध्यान आकर्षित कर रहे हैं । ऐसा प्रतिरोध का मेला मैंनें आजतक नहीं देखा 1975 में भी नहीं । हॉं कुछ कुछ किसान आंदोलन में लेकिन यहाँ तो सारे ही युवजन थे , कुछ बच्चे और मातायें भी । हम दो बूढ़े जवान दर्शक भी ।
मैंने बताया जो वहॉं विरोध स्थल पर अच्छा लगा था । हर जगह या किसी भी ऐसे भीड़ भाड़ वाली जगह में सब सही ही हो यह कैसे हो सकता है ?

इस विरोध प्रदर्शन में धर्म जाति लिंग ऊँच नीच गरीब अमीर का कोई फ़र्क़ मुझे नहीं दिखा । हॉं यह मुख्यतः शहरी मध्य वर्ग या गाँवों से आये विद्यार्थियों का दिखता है । यह भी अच्छी बात है कि समलक्ष्य के लिये यह भीड़ फ़ालतू बेकार और निरर्थक हो चुकी विषमताओं को इस स्थान पर भुला रहा है । वैसे यह शहरीकरण का अनिवार्य उपउत्पाद है । जाति नाम की चीज़ अगले पचास साठ बरसों में अपना दम तोड़ देगी जो यहॉं भी दिख रही है ।

यह भी सही है कि आसपास से गैर विद्यार्थी भी इसमें जोशो-ख़रोश के साथ शामिल हो रहे हैं पर बाहर आम तौर दिखती लफंगई अनुशासनहीनता नहीं कर पा रहे पर नारों में वैसा समबोध नहीं दिखता जो कि राजनीतिक रंग के युवा संगठनों में होता है । शुरु में जितनी भी रपट आयीं थीं उनसे मुझे वामपंथी और अम्बेडकरवादियों की अधिकता व नियंत्रण स्पष्ट दिख रहा था लेकिन वह अब मुख्यमंच तक ही दिखता है जहॉं अधिकतम दो तीन हजार की भीड़ ही बैठकर सुन रही होती है । भीड़ का सबसे बड़ा अंश तो इस मुख्य मंच के बाहर छोटे छोटे सैंकड़ों समूह हैं जहॉं सरकार विरोधी मंतव्य तो जाहिर होता है पर कभी-कभी मर्यादा भंग भी दिखता है । सबसे बढ़िया बात है कि लोग निर्भय हैं और लगातार आ जा रहे हैं । पुलिस के लाठी चार्ज का उल्टा ही असर हुआ और भारी तादाद में युवा इसमें शामिल हो रहे हैं।
यह भी निर्विवाद है कि अधिकांश प्रदर्शनकारी खाते पीते घरों से लेकिन अपनी वर्तमान स्थिति से असंतुष्ट युवा थे । हमेशा की तरह सिख युवक वालंटियर सेवक के रूप में मेहनत करते दिखे । अधेड़ औरतें कम हैं लगभग सभी नई उम्र की हैं और साहसी हैं। नमाज़ी टोपी से पहचाने जाने वाले मुसलमान भी पुलाव ( वेज बिरयानी ) बांटते दिखते हैं । बाह्यरूप से हिंदुओं का बँटवारा नहीं दिखता जो दिल्ली में सिर्फ़ हिंदू मुसलमान नैरेटिव के रूप मैं बस्तियों कॉलोनियों में जरूर विद्यमान है । जहॉं जंतर मंतर पर सरकार विरोधी प्रदर्शन है वहीं शहर में भाजपा कार्यकर्ताओं ने अपना मोर्चा गली गली में सम्भाल रखा है – देशद्रोही चीनी पाकिस्तानी एजेंट का उनका अभियान अविरल चल रहा है, वहीं उनकी जान भी है और चुनाव जीतने का अभी तक बड़ा हथियार ।
जैसे ही सरकार से समझौता होगा – आंदोलन खत्म हो जायेगा । होना ही चाहिये । पहले से ही काँग्रेस समर्थक पत्रकारों यूट्यूबरों प्रवक्ताओं ने सोनम वांगचुक के खिलाफ अपना ग़ुस्सा व्यक्त करना शुरु कर दिया है । कुछ
दिनों में अभिजीत दीपके भी गाली गलौज के निशाने पर आने ही वाले हैं । काँग्रेस ने राहुल के विदेश से लौटते ही , देर से सही इस आंदोलन में यह सिद्ध करने के लिये वे ही सबसे आगे हैं अपना अभियान चालू कर दिया है । संतोष व मजे की बात है कि कांग्रेस समेत सभी दलों नें अपने हमले को संसद भवन के भीतर ही सीमित बना रखा है जो कि आंदोलन को एक साख भी देता है । पूरे जंतर मंतर पर मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखा जो कांग्रेस से जोड़कर अपनी पहचान वहॉं स्थापित कर रहा हो । वामपंथी खुले आम हैं ।
वैचारिक समाजवादी वैसे तो बचे ही नहीं हैं पर जो भी इक्के दुक्के हैं वे इस लायक भी नहीं कि ऐसे आंदोलनों में चार दिन तक लगातार शामिल हो सकें । गाल बजाने , स्वंय को वरिष्ठतम और श्रेष्ठतम घोषित करने और अपने ही संगठन को नष्ट करने में वे एक क्षण भी नहीं लगाते ।काँग्रेस अनुपस्थित है और अन्य विपक्षी भी । जो चित्र सोशल मीडिया पर दिखते हैं वे प्रतीकात्मक हैं । सपा कर सकती थी लेकिन तभी तक जब तक अखिलेश या यादव परिवार का कोई वहॉं मौजूद रहे । बसपा भाजपा की सहचरी बन चुकी है इसलिये वे आत्महत्या के लिये अभिशप्त ।
जारी
