कविता
वहां आवाज उठाना लाजिम है
मुनेश त्यागी
जहां बेटियां पेट में मरती हों
जहां दुल्हन दहेज में जलती हो
जहां मौत जान से सस्ती हो
जहां नफरत दिलों में बसती हो
वहां आवाज उठाना वाजिब है
वहां आवाज उठाना लाजिम है।
जहां इंसाफ रूपयों में बिकता हो
जहां दूल्हा टकों में बिकता हो
जहां मजदूर मिलों में पिलता हो
जहां अन्याय दिलों में मिलता हो
वहां आवाज उठाना वाजिब है
वहां आवाज उठाना लाजिम है।
जहां जुल्मों सितम का शासन हो
जहां घोर बदमनी का आलम हो
जहां कालाबाजारी का राशन हो
जहां कानून विरोधी शासन हो
वहां आवाज उठाना वाजिब है
वहां आवाज उठाना लाजिम है।
जहां के नेता दलाली खाते हों
जहां अपराधी मौज उड़ाते हों
जहां अधिकारी ऐश में रहते हों
जहां लोग जुल्म को सहते हों
वहां आवाज उठाना वाजिब है
वहां आवाज उठाना लाजिम है।
