डॉ रीटा अरोड़ा की लघु कथा-घुटन

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

लघु कथा

घुटन

डॉ रीटा अरोड़ा

कमरे की खिड़की खुली थी, फिर भी नेहा को साँस घुटती-सी महसूस हो रही थी। मन में बहुत कुछ था, लेकिन कहने के लिए कोई अपना नहीं। तभी उसने माँ को फोन लगाया।

“माँ, क्या शादी के बाद अपनी पसंद से जीने का हक़ भी बदल जाता है?”

“क्या हुआ बेटा?”

“हर बात पर रोक-टोक, हर कदम पर सफ़ाई! क्या पहनूँ, किससे बात करूँ, कब बाहर जाऊँ… अपनी इच्छा बताऊँ तो घर का माहौल बिगड़ जाता है।”

“बेटा, तूने समझाने की कोशिश की?”

“कई बार, माँ! लेकिन मेरी बात सुनने से पहले ही मुझे गलत ठहरा दिया जाता है।”

माँ कुछ पल चुप रही।

“याद है, बचपन में स्वेटर पहनने को कहती थी, तो तू मुझसे लड़ती थी?”

“हाँ माँ, लेकिन आप मेरी नाराज़गी के पीछे की वजह समझती थीं।”

“और यहाँ?”

“यहाँ मेरी चुप्पी को सहमति समझा जाता है और बोलूँ तो बदतमीज़ी!”

“बेटा, हर घर के कुछ नियम होते हैं, पर रिश्तों में समझ भी ज़रूरी है।”

“माँ, जब हर बार मुझे ही बदलना पड़े, तो क्या उसे समझौता कहते हैं या घुटन?”

माँ कुछ कहती, उससे पहले सास की आवाज़ आई-

“बहू, फोन रखो! कितना समय लगेगा?”

नेहा ने धीमे से कहा, “माँ, फिर बात करती हूँ…”

उसने खिड़की बंद कर दी और कुछ पल दरवाज़े की ओर देखती रही।

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